भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 755

सत्रहवाँ अध्याय **सतरहवें अध्यायका कथासार-**सतरहवें अध्यायमें महाप्रभुकी सोलह वर्षकी आयुसे लेकर संन्यास ग्रहण करने तककी समस्त लीलाओंका सूत्र रूपमें यहाँ वर्णन किया है, क्योंकि व्यासावतार श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने श्रीचैतन्यभागवतमें इन सब लीलाओंका विशेष रूपसे वर्णन किया है। तब भी जहाँ-जहाँ वृन्दावनदास ठाकुरने जिन अंशोंको छोड़ा है, उनका कुछ विशेष वर्णन इस अध्यायमें देखा जाता है। आम-महोत्सव लीला और काजीके साथ महाप्रभुका वार्त्तालाप विशेषरूपसे कहा गया है। बादमें यह दिखलाया है कि यशोदानन्दने शचीनन्दन होकर चार प्रकारके भक्तभावोंका आस्वादन किया। राधाके प्रेमरसके माधुर्यका आस्वादन करते हुए राधाभावको अङ्गीकार करके एकान्त रूपसे गोपीभावको स्वीकार किया। जितने प्रकारके भक्तभाव हैं, उनमें गोपीभाव श्रेष्ठ है, क्योंकि गोपीभावमें व्रजेन्द्रनन्दनके अतिरिक्त अन्य किसी भी भजनीयतत्त्वका प्रकाश नहीं है। श्रीकृष्ण कौतुकवश चतुर्भुज रूप धारणकर जब गोपियोंके सामने आये, तो वे उन्हें केवल नमस्कार करके वहाँसे चली गयीं। साधारण गोपीभावमें मात्र श्रीकृष्णमूर्तिके अतिरिक्त अन्य सभी मूर्तियोंका परित्याग है, किन्तु गोपी-शिरोमणि श्रीमती राधिकाका भाव सर्वोच्च है। राधाजीको देखकर श्रीकृष्ण अपने चतुर्भुज रूपको नहीं रख पाये। व्रजेश्वर नन्द इस (गौर) लीलामें पिता जगन्नाथ हैं और व्रजेश्वरी यशोदा शचीमाता हैं। चैतन्य गोसाञि साक्षात् नन्दनन्दन हैं अर्थात् नन्दनन्दनके प्रकाश अथवा विलास नहीं हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभुके वात्सल्य, दास्य और सख्य-ये तीन भाव हैं। श्रीअद्वैतप्रभुके सख्य और दास्य-ये दो भाव हैं। अन्य सभी अपने-अपने पूर्वाधिकारके अनुसार महाप्रभुकी सेवा करते हैं। एक ही तत्त्व-वंशीवदन, गोप-विलासी, श्यामरूप श्रीकृष्ण कभी ब्राह्मण और कभी संन्यासी वेशमें गौररूपमें श्रीकृष्णचैतन्य हैं। अब विरोधका स्थान यह है कि श्रीकृष्ण ही अब गोपी हुए हैं। यह अवश्य ही अचिन्तनीय है, परन्तु श्रीकृष्णकी अचिन्त्यशक्तिके द्वारा यह भी सम्भव है। इस विषयमें तर्क करना व्यर्थ है, क्योंकि अचिन्त्यभावके विषयमें तर्क करना नितान्त मूर्खताका कार्य है। जिस प्रकार श्रीव्यासदेवने भागवतमें लिखा है, उसी प्रकार इस अध्यायके अन्तमें श्रीकृष्णदास गोस्वामीने आदिलीलाके सतरह अध्यायोंका अनुवाद पृथक्-पृथक् संक्षेपमें लिखा है। (अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीगौरकृपासे अपवित्र व्यक्तिकी भी पवित्रता :- वन्दे स्वैराद्भुतेहं तं चैतन्यं यत्प्रसादतः । यवनाः सुमनायन्ते कृष्णनामप्रजल्पकाः ॥ १ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ १ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिनकी कृपासे यवन लोग भी सद्-चरित्र होकर श्रीकृष्णनामका जप करने लगे, उन स्वच्छन्द रूपसे अद्भुत चेष्टा करनेवाले श्रीचैतन्यदेवकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥ अनुभाष्य-यत् (यस्य चैतन्यदेवस्य) प्रसादतः (अनुकम्पया) यवनाः (म्लेच्छाः) कृष्णनामप्रजल्पकाः (नामोच्चारणनिष्ठापराः सन्तः) सुमनायन्ते (सुमनसः इव आचरन्ति) तं स्वैराद्भुतेहं (स्वैरा स्वतन्त्रा अद्भुता अलौकिकी ईहा 'चेष्टा' यस्य तं स्मार्त्त-विधि-लङ्घनसमर्थं) चैतन्यम् अहं वन्दे। श्लोक भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है। उनकी अद्भुत (अलौकिक) चेष्टा अर्थात् वे यवनोंको भी श्रीकृष्णनाम प्रदानकर स्मार्त्त-विधिका उल्लङ्घन करनेमें समर्थ हैं॥ १ ॥