श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 16/107-111 प्रातःकाल महाप्रभुके श्रीचरणोंमें शरण-ग्रहण और महाप्रभुकी कृपा :- प्राते आसि' प्रभुपदे लइल शरण। प्रभु कृपा कैल, ताँर खण्डिल बन्धन ॥ 107 ॥ अनुवाद—प्रातःकालमें उन्होंने आकर महाप्रभुके चरणकमलोंकी शरण ग्रहण की और महाप्रभुने उनपर कृपा की, जिससे उनके सारे बन्धन कट गये ॥ 107 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'बन्धन'—पण्डिताभिमानरूपी मायाका बन्धन ॥ 107 ॥ इति अमृतप्रवाह-भाष्ये षोड़श परिच्छेदे। सोलहवें अध्यायका अमृतप्रवाह-भाष्य पूर्ण हुआ। दिग्विजयीकी सुकृति :- भाग्यवन्त दिग्विजयी सफल-जीवन। विद्या-बले पाइल महाप्रभुर चरण ॥ 108 ॥ अनुवाद—भाग्यवान् दिग्विजयीका जीवन सफल हो गया। विद्याके बलपर उसने महाप्रभुके श्रीचरणकमलोंको प्राप्त किया ॥ 108 ॥ ए सब लीला वर्णियाछेन वृन्दावनदास। ये किछु करिल इहाँ, विशेष प्रकाश ॥ 109 ॥ अनुवाद—इन सब लीलाओंका श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने श्रीचैतन्यभागवतमें वर्णन किया है। जो कुछ विशेष लीला थी, उसका मैंने यहाँ वर्णन किया है ॥ 109 ॥ चैतन्य-गोसाञिर लीला—अमृतेर धार। सर्वेन्द्रिय-तृप्ति हय श्रवणे याहार ॥ 110 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाएँ अमृतकी धाराओंके समान हैं, जिनका श्रवण करनेसे सभी इन्द्रियाँ तृप्त हो जाती हैं ॥ 110 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 111 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे कैशोरीलीला-सूत्र-वर्णनं नाम षोड़श-परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है ॥ 111 ॥ श्रीचैतन्यचरितामृत आदिखण्डका कैशोरीलीला-सूत्र-वर्णन नामक सोलहवाँ-अध्याय पूर्ण।