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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 16/107-111 प्रातःकाल महाप्रभुके श्रीचरणोंमें शरण-ग्रहण और महाप्रभुकी कृपा :- प्राते आसि' प्रभुपदे लइल शरण। प्रभु कृपा कैल, ताँर खण्डिल बन्धन ॥ 107 ॥ अनुवाद—प्रातःकालमें उन्होंने आकर महाप्रभुके चरणकमलोंकी शरण ग्रहण की और महाप्रभुने उनपर कृपा की, जिससे उनके सारे बन्धन कट गये ॥ 107 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'बन्धन'—पण्डिताभिमानरूपी मायाका बन्धन ॥ 107 ॥ इति अमृतप्रवाह-भाष्ये षोड़श परिच्छेदे। सोलहवें अध्यायका अमृतप्रवाह-भाष्य पूर्ण हुआ। दिग्विजयीकी सुकृति :- भाग्यवन्त दिग्विजयी सफल-जीवन। विद्या-बले पाइल महाप्रभुर चरण ॥ 108 ॥ अनुवाद—भाग्यवान् दिग्विजयीका जीवन सफल हो गया। विद्याके बलपर उसने महाप्रभुके श्रीचरणकमलोंको प्राप्त किया ॥ 108 ॥ ए सब लीला वर्णियाछेन वृन्दावनदास। ये किछु करिल इहाँ, विशेष प्रकाश ॥ 109 ॥ अनुवाद—इन सब लीलाओंका श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने श्रीचैतन्यभागवतमें वर्णन किया है। जो कुछ विशेष लीला थी, उसका मैंने यहाँ वर्णन किया है ॥ 109 ॥ चैतन्य-गोसाञिर लीला—अमृतेर धार। सर्वेन्द्रिय-तृप्ति हय श्रवणे याहार ॥ 110 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाएँ अमृतकी धाराओंके समान हैं, जिनका श्रवण करनेसे सभी इन्द्रियाँ तृप्त हो जाती हैं ॥ 110 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 111 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे कैशोरीलीला-सूत्र-वर्णनं नाम षोड़श-परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है ॥ 111 ॥ श्रीचैतन्यचरितामृत आदिखण्डका कैशोरीलीला-सूत्र-वर्णन नामक सोलहवाँ-अध्याय पूर्ण।

सतरहवाँ अध्याय

चित्र 10

सत्रहवाँ अध्याय **सतरहवें अध्यायका कथासार-**सतरहवें अध्यायमें महाप्रभुकी सोलह वर्षकी आयुसे लेकर संन्यास ग्रहण करने तककी समस्त लीलाओंका सूत्र रूपमें यहाँ वर्णन किया है, क्योंकि व्यासावतार श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने श्रीचैतन्यभागवतमें इन सब लीलाओंका विशेष रूपसे वर्णन किया है। तब भी जहाँ-जहाँ वृन्दावनदास ठाकुरने जिन अंशोंको छोड़ा है, उनका कुछ विशेष वर्णन इस अध्यायमें देखा जाता है। आम-महोत्सव लीला और काजीके साथ महाप्रभुका वार्त्तालाप विशेषरूपसे कहा गया है। बादमें यह दिखलाया है कि यशोदानन्दने शचीनन्दन होकर चार प्रकारके भक्तभावोंका आस्वादन किया। राधाके प्रेमरसके माधुर्यका आस्वादन करते हुए राधाभावको अङ्गीकार करके एकान्त रूपसे गोपीभावको स्वीकार किया। जितने प्रकारके भक्तभाव हैं, उनमें गोपीभाव श्रेष्ठ है, क्योंकि गोपीभावमें व्रजेन्द्रनन्दनके अतिरिक्त अन्य किसी भी भजनीयतत्त्वका प्रकाश नहीं है। श्रीकृष्ण कौतुकवश चतुर्भुज रूप धारणकर जब गोपियोंके सामने आये, तो वे उन्हें केवल नमस्कार करके वहाँसे चली गयीं। साधारण गोपीभावमें मात्र श्रीकृष्णमूर्तिके अतिरिक्त अन्य सभी मूर्तियोंका परित्याग है, किन्तु गोपी-शिरोमणि श्रीमती राधिकाका भाव सर्वोच्च है। राधाजीको देखकर श्रीकृष्ण अपने चतुर्भुज रूपको नहीं रख पाये। व्रजेश्वर नन्द इस (गौर) लीलामें पिता जगन्नाथ हैं और व्रजेश्वरी यशोदा शचीमाता हैं। चैतन्य गोसाञि साक्षात् नन्दनन्दन हैं अर्थात् नन्दनन्दनके प्रकाश अथवा विलास नहीं हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभुके वात्सल्य, दास्य और सख्य-ये तीन भाव हैं। श्रीअद्वैतप्रभुके सख्य और दास्य-ये दो भाव हैं। अन्य सभी अपने-अपने पूर्वाधिकारके अनुसार महाप्रभुकी सेवा करते हैं। एक ही तत्त्व-वंशीवदन, गोप-विलासी, श्यामरूप श्रीकृष्ण कभी ब्राह्मण और कभी संन्यासी वेशमें गौररूपमें श्रीकृष्णचैतन्य हैं। अब विरोधका स्थान यह है कि श्रीकृष्ण ही अब गोपी हुए हैं। यह अवश्य ही अचिन्तनीय है, परन्तु श्रीकृष्णकी अचिन्त्यशक्तिके द्वारा यह भी सम्भव है। इस विषयमें तर्क करना व्यर्थ है, क्योंकि अचिन्त्यभावके विषयमें तर्क करना नितान्त मूर्खताका कार्य है। जिस प्रकार श्रीव्यासदेवने भागवतमें लिखा है, उसी प्रकार इस अध्यायके अन्तमें श्रीकृष्णदास गोस्वामीने आदिलीलाके सतरह अध्यायोंका अनुवाद पृथक्-पृथक् संक्षेपमें लिखा है। (अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीगौरकृपासे अपवित्र व्यक्तिकी भी पवित्रता :- वन्दे स्वैराद्भुतेहं तं चैतन्यं यत्प्रसादतः । यवनाः सुमनायन्ते कृष्णनामप्रजल्पकाः ॥ १ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ १ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिनकी कृपासे यवन लोग भी सद्-चरित्र होकर श्रीकृष्णनामका जप करने लगे, उन स्वच्छन्द रूपसे अद्भुत चेष्टा करनेवाले श्रीचैतन्यदेवकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥ अनुभाष्य-यत् (यस्य चैतन्यदेवस्य) प्रसादतः (अनुकम्पया) यवनाः (म्लेच्छाः) कृष्णनामप्रजल्पकाः (नामोच्चारणनिष्ठापराः सन्तः) सुमनायन्ते (सुमनसः इव आचरन्ति) तं स्वैराद्भुतेहं (स्वैरा स्वतन्त्रा अद्भुता अलौकिकी ईहा 'चेष्टा' यस्य तं स्मार्त्त-विधि-लङ्घनसमर्थं) चैतन्यम् अहं वन्दे। श्लोक भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है। उनकी अद्भुत (अलौकिक) चेष्टा अर्थात् वे यवनोंको भी श्रीकृष्णनाम प्रदानकर स्मार्त्त-विधिका उल्लङ्घन करनेमें समर्थ हैं॥ १ ॥

[ 17/2-7 जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ २ ॥ अनुवाद—महाप्रभु श्रीचैतन्यदेवकी जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो। श्रीगौर-भक्तवृन्दकी जय हो॥२॥ कैशोर-लीलार सूत्र करिल गणन। यौवन-लीलार सूत्र करि अनुक्रम॥३॥ अनुवाद—पूर्व अध्यायमें मैंने कैशोर-लीलाका सूत्ररूपमें वर्णन किया। अब क्रमशः यौवनलीलाका सूत्ररूपमें वर्णन करूँगा॥३॥ यौवनमें अनेक लीला-विलास :- विद्या-सौन्दर्य-सद्वेश-सम्भोग-नृत्य-कीर्त्तनैः। प्रेमनाम-प्रदानैश्च गौरो दीव्यति यौवने ॥ ४॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—विद्या, सौन्दर्य, सद्-वेश, सम्भोग, नृत्य, कीर्त्तन, प्रेम और नाम-दानके द्वारा श्रीगौरचन्द्र यौवनकालमें शोभाको प्राप्त हुए॥४॥ अनुभाष्य—गौरः यौवने (पञ्चदशवर्षातिक्रान्ते यौवन-प्राकट्ये) विद्या-सौन्दर्य-सद्वेश-सम्भोग-नृत्यकीर्त्तनैः (परमार्थज्ञानलावण्य- साधुवेशवसनमाल्यचन्दनादिसम्भोगनृत्यकीर्त्तनादिभीः एतैः) प्रेमनाम- प्रदानैः (प्रेम्णा सह कृष्णनाम-वितरणैः) दीव्यति (क्रीड़ति)। श्लोक भावानुवाद—पन्द्रह वर्षकी आयुके बाद यौवनके प्रकट होनेपर श्रीगौरचन्द्रने विद्या (परमार्थ-ज्ञान), सौन्दर्य (लावण्य), सद्-वेश (साधुवेश, वस्त्र, माला, चन्दनादि), सम्भोग, नृत्यकीर्त्तनादि और प्रेमके साथ श्रीकृष्णनामके वितरणकी क्रीड़ा की॥४॥ यौवन लीला :- यौवन-प्रवेशे अङ्गेर अङ्ग विभूषण। दिव्य वस्त्र, दिव्य वेश, माल्य-चन्दन ॥ ५ ॥ अनुवाद—यौवनकालमें प्रवेश करनेपर महाप्रभुके अङ्ग ही उनके अङ्गोंके आभूषण हो गये अर्थात् प्रत्येक अङ्गका गठन इतना सुन्दर था कि वह सम्पूर्ण देहका आभूषण प्रतीत होता था। वे दिव्य वस्त्र, दिव्य वेशभूषा और माला-चन्दनादिसे सुशोभित रहते थे॥५॥ विद्यार औद्धत्ये काहाँ ना करे गणन। सकल पण्डित जिनि' करे अध्यापन ॥ ६ ॥ अनुवाद—अपनी विद्याके अभिमानसे वे किसीको कुछ नहीं समझते थे। सभी पण्डितोंको अपने ज्ञानके द्वारा परास्तकर वे स्वयं पढ़ाने लगे॥६॥ वायुव्याधि-छले कैल प्रेम परकाश। भक्तगण लञा कैल विविध विलास ॥ ७ ॥ अनुवाद—वायु-रोगके छलसे उन्होंने प्रेमका प्रकाश किया। तब भक्तोंको लेकर नाना प्रकारकी लीलाओंका आस्वादन किया॥७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अध्ययन और अध्यापन समाप्त करके शुद्धभक्तिका प्रचार करनेके लिये श्रीगौरचन्द्रने कुछ दिन वायु-रोगके छलसे छात्रोंको सर्वत्र श्रीकृष्णनामकी व्याख्या की, सभी व्याकरणके सूत्रोंका श्रीकृष्णसे सम्बन्ध दिखलाया और उनको पढ़ानेके कार्यसे छुटकारा पानेकी चेष्टा करने लगे॥७॥ अनुभाष्य—चैःभाः आदिखण्ड, बारहवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥७॥ अमृताणुकणिका—एक दिन महाप्रभु वायु रोगके छलसे प्रेम-भक्तिके समस्त विकारोंको प्रकट करने लगे। वे अकस्मात् अलौकिक शब्द बोलने लगते, कभी भूमिपर लोट-पोट करने लगते, कभी हँसते और घरमें तोड़-फोड़ करने लगते। कभी हुँकार करते, कभी ताल ठोकते और जिसे सामने देखते उसे मारने लगते। थोड़ी देर बाद वे निश्चल हो जाते और उन्हें ऐसी मूर्च्छा होती, जिसे देखकर लोग भयभीत हो जाते। सभी लोग अनेक प्रकारके खाद्य तेल उनके सिरमें 220 | श्रीचैतन्यचरितामृत

17/7-10 ] लगाकर उनका उपचार करनेकी चेष्टा करने लगे। परन्तु महाप्रभुके समस्त अङ्ग काँपने लगे और उनका शरीर तीव्रतासे झूमने लगा तथा उनकी हुँकार सुनकर सभी भयभीत हो गये। महाप्रभु कहने लगे,–“मैं ही सभी लोकोंका ईश्वर हूँ, मैंने ही विश्वको धारण कर रखा है, इसलिये मेरा नाम विश्वम्भर है। मैं वही हूँ, परन्तु मुझे कोई नहीं पहचानता।” ऐसा कहकर महाप्रभु दौड़कर लोगोंको पकड़ने लगे। उनके व्यवहारको देखकर किसीने कहा कि इनमें कोई दानव आ गया है, किसीने कहा कि यह किसी डाकिनीका काम है और कोई कहने लगे कि ये निरन्तर बोल रहे हैं, इसलिये निश्चित ही इन्हें वायु-विकार हो गया है। फिर एक बड़े लकड़ीके पात्रमें गलेतक तेल भरके उनको बैठाया। महाप्रभु तेलमें बैठकर खिलखिलाकर हँसने लगे, मानो वास्तवमें वायु अपना प्रभाव दिखा रही है। इस प्रकार कुछ देर लीला करनेके पश्चात् महाप्रभु अपनी स्वाभाविक स्थितिमें आ गये। सभी भक्त आनन्दसे 'हरि' 'हरि' ध्वनि करने लगे। परन्तु विष्णुकी मायासे मोहित होकर कोई उनके तत्त्वको नहीं समझ पाया॥7॥ गयामें ईश्वरपुरीके साथ मिलन और दीक्षाभिनय :– तबे त' करिला प्रभु गयाते गमन। ईश्वरपुरीर सङ्गे तथाइ मिलन॥8॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने गयाके लिये गमन किया और वहाँ उनका श्रीईश्वरपुरीसे मिलन हुआ॥8॥ अनुभाष्य—चैःभाः आदिखण्ड सत्रहवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥8॥ दीक्षा-अनन्तरे हैल प्रेमेर प्रकाश। देशे आगमन पुनः, प्रेमेर विलास॥9॥ अनुवाद—दीक्षाके बाद महाप्रभुने प्रेमका प्रकाश किया और पुनः नवद्वीप आकर प्रेमपूर्वक लीला-विलास किया॥9॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'परलोकगत पिताका गयामें श्राद्ध करूँगा'—इस भावसे महाप्रभुने अनेक छात्रोंके साथ गयाकी यात्रा की। मार्गमें उन्हें ज्वर आ गया और ब्राह्मणके चरणोदकका पान करके वे उस रोगसे मुक्त हुए। इस लीलाके द्वारा उन्होंने संसारी लोगोंको ब्राह्मणोंको सम्मान देनेका कर्त्तव्यका प्रदर्शन किया। गया पहुँचकर उन्होंने श्रीईश्वरपुरीसे श्रीकृष्णमन्त्रकी दीक्षा ग्रहण की। उस मन्त्रको ग्रहण करते ही महाप्रभुमें प्रेमका प्रकाश होने लगा। गयामें कार्य समाप्त करके श्रीनवद्वीप धाममें आकर प्रेमका प्रचार करने लगे॥9॥ अनुभाष्य—चैःभाः आदिखण्ड सत्रहवाँ अध्याय और मध्य पहला अध्याय द्रष्टव्य है॥9॥ दीक्षाके उपरान्त नवद्वीप-लीला, श्रीअद्वैतका विश्वरूप-दर्शन :– शचीके प्रेमदान, तबे अद्वैत-मिलन। अद्वैत पाइल विश्वरूप-दरशन॥10॥ अनुवाद—महाप्रभुने शचीमाताको प्रेमका दान किया। तब महाप्रभुका श्रीअद्वैताचार्यसे मिलन हुआ और बादमें महाप्रभुने उन्हें अपने विश्वरूपका दर्शन करवाया॥10॥ अमृतप्रवाह भाष्य—एक दिन महाप्रभुने श्रीवासके घरमें विष्णु-सिंहासनपर बैठकर कहा कि मेरी माताने श्रीअद्वैताचार्यके चरणोंमें वैष्णवापराध किया है। वह अपराध क्षमा न होनेतक उनको प्रेमभक्ति प्राप्त नहीं होगी। भक्त लोग यह सुनकर श्रीअद्वैताचार्यको वहाँ बुला लाये और श्रीअद्वैताचार्य (शचीमाताके माहात्म्यका कीर्त्तन करते-करते) प्रेममें आविष्ट हो गये। शचीदेवीने उस अवसरका लाभ उठाते हुए उनके चरणोंकी धूलि लेकर उस अपराधसे मुक्ति पायी। तब, “प्रसन्न हइया प्रभु बोले जननीरे। एखन से विष्णुभक्ति हइल तोमारे॥ अद्वैतेरे स्थाने अपराध नाहि आर।” “तब प्रसन्न होकर महाप्रभुसे मातासे कहा कि अब सत्रहवाँ अध्याय | 221

[ 17/10-15 आपका श्रीअद्वैत प्रभुके प्रति कोई अपराध नहीं रहा है, इसलिये अब आपको विष्णुभक्ति प्राप्त होगी।” एक दिन प्रेममें आविष्ट होकर श्रीअद्वैताचार्यने श्रीवास-अङ्गनमें महाप्रभुसे कहा—‘पहले आपने अर्जुनको जो विश्वरूप दिखलाया था, वह रूप मुझे भी दिखलाइये।’ तब महाप्रभुने दया करके उन्हें भी अपना विश्वरूप दिखलाया॥10॥ अनुभाष्य—‘शचीमाताको प्रेमदान’—चैःभाः मध्यखण्ड बाइसवाँ अध्याय और ‘श्रीअद्वैत-मिलन’—चैःभाः मध्यखण्ड छठा अध्याय; ‘श्रीअद्वैतका विश्वरूप दर्शन’—चैःभाः मध्यखण्ड चौबीसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥10॥ प्रभुर अभिषेक तबे करिल श्रीवास। खाटे बसि' प्रभु कैल ऐश्वर्य-प्रकाश॥11॥ अनुवाद—तब श्रीवासने महाप्रभुका अभिषेक किया और महाप्रभुने सिंहासनपर बैठकर अपना ऐश्वर्य प्रकाश किया॥11॥ अमृतप्रवाह भाष्य—एकदिन श्रीवासके घरमें सब भक्तोंने मिलकर महाप्रभुका अभिषेक किया। महाप्रभुने विष्णु-सिंहासनके ऊपर बैठकर अपने राजराजेश्वर-ऐश्वर्यका प्रकाश किया। अनेक भक्तोंने उस समय कीर्तन किया। इधर श्रीअद्वैतादि भक्त महाप्रभुकी षोड़श उपचारसे पूजा करने लगे। तब जिसकी जैसी अभिलाषा थी, महाप्रभु वैसा वर उसे प्रदान करने लगे॥11॥ अनुभाष्य—‘श्रीवास पण्डितके घरमें विष्णु-सिंहासनपर विराजमान महाप्रभु द्वारा ‘सातप्रहरिया’ भाव’—चैःभाः मध्यखण्ड नौवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥11॥ श्रीनित्यानन्दके साथ मिलन :— तबे नित्यानन्द-स्वरूपेर आगमन। प्रभुके मिलिया पाइला षड्भुज-दर्शन॥12॥ अनुवाद—तत्पश्चात् श्रीनित्यानन्द प्रभु नवद्वीप आये और महाप्रभुसे उनका मिलन हुआ। महाप्रभुने उन्हें अपने षड्भुज रूपके दर्शन करवाये॥12॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीनित्यानन्द प्रभुने वीरभूम जिलाके ‘एकचक्रा’ ग्राममें पद्मावतीके गर्भसे हड़ाई पण्डितके पुत्ररूपमें जन्म ग्रहण किया। श्रीनित्यानन्द प्रभु जब थोड़े बड़े हुए, तो एक संन्यासीने आकर हड़ाई पण्डितसे उनको माँग लिया। तब उस संन्यासीके साथ श्रीनित्यानन्द प्रभुने अनेक देशोंका भ्रमण करते-करते मथुरामण्डलमें आकर बहुत समय तक वास किया। महाप्रभुके आकर्षण करनेपर श्रीनित्यानन्द प्रभु श्रीनवद्वीपमें आकर नन्दन-आचार्यके घरमें आकर ठहरे। महाप्रभु भक्तोंको साथ लेकर वहाँ गये और श्रीनित्यानन्द प्रभुको अपने साथ अपने स्थानपर ले आये॥12॥ अनुभाष्य—‘नित्यानन्दमिलन’—चैःभाः मध्यखण्ड, तीसरा अध्याय और श्रीवासगृहमें श्रीव्यास-पूजाके उपलक्ष्यमें ‘श्रीनित्यानन्द प्रभुको महाप्रभुके द्वारा षड्भुजरूपका (शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म, श्रीहल और मूशल धारण किये हुए रूपका) दर्शन’—चैःभाः मध्यखण्ड, पाँचवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥12॥ निताइको महाप्रभुका षड्भुज, चतुर्भुज और द्विभुज रूप-प्रदर्शन :— प्रथमे षड्भुज ताँरे देखाइल ईश्वर। शङ्खचक्रगदापद्म-शार्ङ्ग-वेणुधर॥13॥ पाछे चतुर्भुज हैला, तिन अङ्ग वक्र। दुइ हस्ते वेणु बाजाय, दुइ हस्ते शङ्ख-चक्र॥14॥ तबे त' द्विभुज केवल वंशीवदन। श्याम-अङ्ग पीतवस्त्र व्रजेन्द्रनन्दन॥15॥ अनुवाद—पहले महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म, शार्ङ्ग और वेणुधारी षड्भुज रूप दिखलाया। बादमें वे त्रिभङ्ग ललित मुद्रामें चतुर्भुज रूप हो गये और वे दो हाथोंमें वंशी बजा रहे थे तथा उन्होंने अन्य दो हाथोंमें शङ्ख-चक्र धारण किये हुए थे। तब वे केवल वंशी बजाते हुए द्विभुज श्याम वर्णके पीतवस्त्रधारी व्रजेन्द्रनन्दन हो गये॥13-15॥ 222 | श्रीचैतन्यचरितामृत

17/13-18 ] अमृतप्रवाह भाष्य—एकदिन महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुको शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म, शार्ङ्ग और वेणुधारी षड्भुज रूप दिखाया, बादमें दो हाथोंमें शङ्ख, चक्र और दो हाथोंमें वंशी धारण किये हुए चतुर्भुज रूप दिखलाया। अन्तमें उन्होंने केवल वंशीधारी श्रीकृष्ण रूप दिखलाया—(चैःभाः, मध्य) ॥ 13-15 ॥ श्रीगौर ही श्रीनित्यानन्द-बलराम :- तबे नित्यानन्द-गोसाञिर व्यास-पूजन। नित्यानन्दावेशे कैल मूषल-धारण॥16॥ अनुवाद—तब श्रीनित्यानन्द प्रभुने महाप्रभुकी व्यासपूजाकी और महाप्रभुने श्रीनित्यानन्द प्रभुके आवेशमें मूसलको धारण किया॥16॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुके आदेशसे श्रीनित्यानन्द प्रभुने पूर्णिमाकी रात्रिमें व्यासपूजाके लिये श्रीवासके द्वारा पूजाकी सामग्री एकत्रित करवायी। सङ्कीर्तन करते-करते श्रीनित्यानन्द प्रभुने पुष्पमाला महाप्रभुके गलेमें अर्पण की। उस समय श्रीनित्यानन्द प्रभुने षड्भुज रूपके दर्शन किये। तब व्यासपूजाका और कार्य नहीं हो सका। श्रीबलरामके आवेशमें व्यासपूजाकी पूर्वरात्रिमें श्रीवासके गृहमें सङ्कीर्तनके समय महाप्रभुने विष्णु-सिंहासनके ऊपर बैठकर श्रीनित्यानन्द प्रभुसे हल-मूसल माँगा था। तब श्रीनित्यानन्द प्रभुने अपने हाथ महाप्रभुके हाथोंमें दे दिये और उस समय भक्तोंने हल और मूसलके प्रत्यक्ष दर्शन किये थे॥16॥ शचीका स्वप्न दर्शन और जगाइ-मधाइका उद्धार :- तबे शची देखिल, रामकृष्ण-दुइ भाइ। तबे निस्तारिल प्रभु जागाइ-माधाइ॥17॥ अनुवाद—इसके बाद शचीमाताने (श्रीनित्यानन्द प्रभु और महाप्रभुमें) श्रीबलराम-श्रीकृष्णके दर्शन किये। बादमें महाप्रभुने जगाइ और माधाइका उद्धार किया॥17॥ अमृतप्रवाह भाष्य—एकबार शचीदेवीने स्वप्नमें देखा कि उनके गृहमें स्थित कृष्ण-बलराम गौराङ्ग-नित्यानन्दके साथ नैवेद्यके लिये झगड़ रहे हैं। अगले दिन महाप्रभुकी इच्छासे शचीदेवीने श्रीनित्यानन्द प्रभुको उनके घर भोजनके लिये आमन्त्रित किया। विश्वम्भर और श्रीनित्यानन्द प्रभु जब भोजन कर रहे थे, उस समय शचीदेवीने साक्षात् श्रीकृष्ण और श्रीबलरामको भोजन करते हुए देखा, जिसे देखकर वे प्रेमके कारण मूर्च्छित हो गयीं। जगाइ और माधाइका जन्म नवद्वीपमें हुआ था, परन्तु वे बहुत पापोंमें रत थे। महाप्रभुकी आज्ञासे श्रीनित्यानन्द प्रभु और हरिदास ठाकुर जब घर-घर नाम प्रचारके लिये जाने लगे, तब एकदिन जगाइ और माधाइ, दोनों मदिरापान करके नशेमें इनपर क्रोधित हो गये। उन्होंने उन्मत्त होकर श्रीनित्यानन्द प्रभु और हरिदास ठाकुरको डाँटा और धमकाया, तब ये दोनों वहाँसे भाग निकले। एक और दिन माधाइने श्रीनित्यानन्द प्रभुके मस्तकपर टूटे हुए मिट्टीके बर्तनसे प्रहार किया, जिसे देखकर जगाइको कुछ दुःख हुआ। महाप्रभुने जब यह वृत्तान्त सुना, तब वे अपने शिष्योंके साथ वहाँ आये और जगाइ और माधाइको दण्ड देनेके लिये उद्यत हुए। करुणामय गौराङ्ग महाप्रभुने जगाइके अच्छे व्यवहारके विषयमें सुनकर उसे प्रेमालिङ्गन दिया। भगवद्दर्शन और स्पर्शसे उन दोनों पापियोंका चित्त परिवर्तित हो गया और महाप्रभुने उन्हें हरिनाम देकर उनका उद्धार किया॥17॥ महाप्रभुका 'सातप्रहरिया' भाव :- तबे सप्तप्रहर छिला प्रभु भावावेशे। यथा तथा भक्तगण देखिल विशेषे॥18॥ अनुवाद—तब महाप्रभु सात प्रहरतक भावावेशमें रहे और भक्तोंने उनकी विशेष लीलाओंके दर्शन किये॥18॥ अमृतप्रवाह भाष्य—एकदिन श्रीवासके घरमें महाप्रभु विष्णु-सिंहासनपर बैठे थे, तब भक्तोंने 'सहस्रशीर्षपुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्' आदि पुरुष-सूक्त पाठकर गङ्गाजलसे सतरहवाँ अध्याय | 223

[ 17/18-22 उनका अभिषेक किया और विविधोपचारोंसे उनकी पूजा की तथा अनेक प्रकारके खाद्य-द्रव्य उन्हें भोजनके लिये निवेदित किये। महाप्रभु उस समय भक्तोंके द्वारा दी गयी सारी खाद्य-सामग्री खाने लगे। उस दिन महाप्रभु सात प्रहरतक उस भावके आवेशमें रहे और उन्होंने सब अवतारोंके भावोंको दिखलाया। उन्होंने भक्तोंके पूर्व गुह्य समस्त सम्वादोंको व्यक्त करके सबके सन्देहको दूर करके सबको वरदान दिये। इस भावको कोई-कोई 'सातप्रहरिया भाव' और कोई-कोई 'महाप्रकाश' भी कहते हैं॥18॥ अनुभाष्य—श्रीवास पण्डितके घरमें जब महाप्रभु सातप्रहरिया-भावमें थे, तब उस समय उनके अभिषेकके लिये जल लानेवाली 'दुःखी'-नामक एक भाग्यवती स्त्रीको प्रभुने 'सुखी' नाम प्रदान किया। खोलाबेचा (केलेके तने आदि बेचने वाले) श्रीधरको महाप्रकाश-दर्शन, मुरारि गुप्तको श्रीराम रूपके दर्शन, श्रीहरिदास ठाकुरके प्रति कृपा, श्रीअद्वैताचार्यको गीताका सत्यपाठ-कथन और मुकुन्दके प्रति कृपा आदिके लिये चैःभाः मध्यखण्ड, नौवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥18॥ मुरारिके घरमें वराहका आवेश :- वराह-आवेशे हैला मुरारि-भवने। ताँर स्कन्धे चड़ि' प्रभु नाचिला अङ्गने॥19॥ अनुवाद—एकदिन महाप्रभु वराह-आवेशमें मुरारि गुप्तके घरमें आये। (किसी और दिन) महाप्रभु मुरारि गुप्तके कन्धेपर चढ़कर आङ्गनमें नाचने लगे॥19॥ अमृतप्रवाह भाष्य—एकदिन महाप्रभुने 'शूकर!' 'शूकर!' कहकर चिल्लाते हुए स्वयं वराहरूप धारण करके मुरारि गुप्तके घरमें प्रवेश किया। उन्होंने जलसे भरे एक पात्र (सुराही) को पृथ्वीको उठानेकी भाँति अपने दाँतोंसे उठाकर जलपान किया। किसी और दिन महाप्रभुने मुरारि गुप्तके कन्धेपर चढ़कर बहुत नृत्य किया॥19॥ अनुभाष्य—'मुरारि गुप्तके घरमें महाप्रभुका वराहावेश'-चैःभाः मध्यखण्ड, तीसरा अध्याय द्रष्टव्य है।॥19॥ शुक्लाम्बरको माधुकरी-भिक्षासे प्राप्त चावलका भोजन :- तबे शुक्लाम्ररेर कैल तण्डुल भक्षण। 'हरेर्नाम' श्लोकेर कैल अर्थ विवरण॥20॥ अनुवाद—महाप्रभुने शुक्लाम्रर ब्रह्मचारीके भिक्षाके चावल छीनकर खाये। बादमें उन्होंने 'हरेर्नाम' श्लोककी व्याख्या की॥20॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'शुक्लाम्बर ब्रह्मचारी'-ये गङ्गाके तटपर नवद्वीपमें रहते थे। एक समय जब महाप्रभु नृत्य कर रहे थे, तब ये भिक्षा करके लाये चावलकी झोलीके साथ वहाँ पहुँचे। भक्तवात्सल्यके कारण महाप्रभुने उनके हाथसे वह झोली ले [छीन] ली और सारे चावल महाप्रेमके साथ खाने लगे॥20॥ अनुभाष्य—'महाप्रभुके द्वारा शुक्लाम्ररके भिक्षासे प्राप्त चावलका खाना'-चैःभाः मध्यखण्ड, सोलहवाँ अध्याय द्रष्टव्य है।॥20॥ हरिनामके बिना जीवकी गति नहीं :- बृहन्नारदीय पुराण (38/126)— हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्। कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा॥21॥ अनुवाद—कलियुगमें हरिनाम ही, हरिनाम ही, हरिनाम ही एकमात्र साधन है, इसके अतिरिक्त अन्य कोई गति नहीं है, नहीं है, नहीं है॥21॥ अनुभाष्य—चैःचः आदिलीला, 7/76 संख्या द्रष्टव्य है॥21॥ 'हरेर्नाम'-श्लोककी व्याख्या :- कलिकाले नामरूपे कृष्ण-अवतार। नाम हैते हय सर्वजगत्-निस्तार॥22॥ 224 | श्रीचैतन्यचरितामृत

17/22-30 ] अनुवाद-कलिकालमें नामरूपमें श्रीकृष्णका अवतार हुआ है। इस नामसे समस्त जगत्का उद्धार हो सकता है॥ 22 ॥ दार्ढ्य लागि' 'हरेर्नाम'-उक्ति तिनबार। जड़लोक बुझाइते पुनः 'एव'-कार ॥ 23 ॥ अनुवाद-तीन बार 'हरेर्नाम' का प्रयोग इस सिद्धान्तमें दृढ़ता दिखानेके लिये है। [तो भी यदि किसीका इसमें विश्वास नहीं हो, तो ऐसे] जड़बुद्धि व्यक्तिके लिये एव-कार (ही) का प्रयोग किया गया है॥ 23 ॥ 'केवल'-शब्दे पुनरपि निश्चय-करण। ज्ञान-योग-तप आदि कर्म-निवारण ॥ 24 ॥ अनुवाद-इस सिद्धान्तको पुनः सुनिश्चित करनेके लिये और ज्ञान-योग-तपादि कर्मोंकी अनुपयोगिता दिखानेके लिये 'केवल' शब्दका प्रयोग किया गया है॥ 24 ॥ अन्यथा ये माने, तार नाहिक निस्तार। नाहि, नाहि, नाहि, -तिन उक्त 'एव'-कार ॥ 25 ॥ अनुवाद-इस सिद्धान्तका जो अन्य अर्थ मानता है, उसका कभी भी उद्धार नहीं हो सकता, यह दर्शानेके लिये 'नहीं' शब्द तीन बार कहकर 'एव'-कार अर्थात् 'ही' भी कहा गया है॥ 25 ॥ नाम ग्रहण करनेकी प्रणाली :- तृण हैते नीच हञा सदा लबे नाम। आपनि निरभिमानी, अन्ये दिबे मान ॥ 26 ॥ अनुवाद-स्वयंको तृणसे भी नीच मानकर, स्वयं निरभिमानी होकर अन्योंको मान देते हुए सदा श्रीकृष्णका नाम लेना चाहिये ॥ 26 ॥ तरुसम सहिष्णुता वैष्णव करिबे। भर्त्सना-ताड़ने काके किछु ना बलिबे ॥ 27 ॥ काटिलेइ तरु येन किछु ना बलय। शुकाइया मरे, तबु जल ना मागय ॥ 28 ॥ एइमत वैष्णव कारे किछु ना मागिबे। अयाचित-वृत्ति, किम्बा शाक-फल खाइबे ॥ 29 ॥ अनुवाद-वैष्णवोंको वृक्षके समान सहनशील होना चाहिये। किसीके द्वारा भर्त्सना अथवा ताड़ना किये जानेपर भी प्रतिकारमें कुछ नहीं बोलना चाहिये। वृक्ष जैसे काटे जानेपर भी कुछ नहीं बोलता और सूखकर मरनेपर भी किसीसे जल नहीं माँगता, वैसे ही वैष्णवको किसीसे कुछ नहीं माँगना चाहिये। अयाचक-वृत्ति (किसीसे भिक्षा नहीं करना) का अवलम्बन करते हुए अथवा शाक-फल जो भी स्वतः मिल जाँय, उन्हें खाकर जीवन धारण करना चाहिये ॥ 27-29 ॥ अमृतानुकणिका-वैष्णवको वृक्षके समान सहनशील होना चाहिये, यह साधक भक्तोंके लिये शिक्षा है। फलदार वृक्ष साधारणतः पत्थर मारनेवालेको फल प्रदान करते हैं, परन्तु कभी-कभी आँधी-तूफानसे गिरकर नीचे बैठे व्यक्तिको कुचलकर मार भी डालते हैं। उत्तम वैष्णव वृक्षसे भी अधिक सहनशील और उपकारी होते हैं। वे किसी भी परिस्थितिमें किसीका भी अपकार नहीं करते हैं। यदि वे किसीको शाप भी देते हैं, तो उसमें भी उस व्यक्तिका कल्याण निहित होता है। जैसे नारदजीने कुबेरके पुत्रोंको वृक्ष बननेका शाप दिया था, वह उनके पक्षमें वरदान ही था, उन्हें वृक्षयोनिसे मुक्त करके श्रीकृष्णने भी उनसे ऐसा ही कहा था। इसी शापके फलस्वरूप श्रीकृष्णके चरणकमलोंके स्पर्शसे उन्हें गोलोक धामकी प्राप्ति हुई, जो कोटि-कोटि जन्मोंकी तपस्या आदिके द्वारा भी सम्भव नहीं है॥ 27-29 ॥ सदा नाम लइबे, यथा-लाभेते सन्तोष। एइमत आचार करे भक्तिधर्म-पोष ॥ 30 ॥ अनुवाद-सदा नाम लेते हुए स्वतः जो कुछ प्राप्त सतरहवाँ अध्याय | 225

[ 17/30-34 हो जाये, उसीमें सन्तोष करना चाहिये। इस प्रकारका आचरण भक्तिधर्मका पोषक है॥30॥ अनुभाष्य-चैःचः अन्त्यलीला, 20/22-26 संख्या द्रष्टव्य है॥30॥ श्रीमुखकी वाणी :- श्रीकृष्णचैतन्यचन्द्रोक्त शिक्षाष्टकके अन्तर्गत एक पद्य- तृणादपि सुनीचेन तरोरिव सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्त्तनीयः सदा हरिः ॥31॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥31॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो अपनेको तृणसे भी छोटा मानते हैं, जो वृक्षके समान सहनशील हैं, अपने लिये मानशून्य हैं और दूसरोंको सम्मान प्रदान करते हैं, वे ही सदा हरिकीर्त्तन करनेके अधिकारी हैं॥31॥ अनुभाष्य-तृणादपि (सर्वपददलित-गुरुभावरहितात् तृणादपि) सुनीचेन (सर्वतोभावेन नीचेन प्राकृतमर्यादा-रहितभाव-समन्वितेन जनेन) तरोरपि (वृक्षादपि) सहिष्णुना (सहनगुणयुक्तेन जनेन) अमानिना (स्वयं मननीयोऽपि तादृश-प्राकृत-मर्यादा-परित्यागेन) मानदेन (अन्यebhyah: मानरहितेभ्यः अयोग्येभ्यः अपि मानं गौरवं प्रदेन, एवम्भूतेन जनेन) सदा (नित्यकालं) हरिः [एव] कीर्त्तनीयः (अधरोष्ठजिह्वादौ उच्चारणीयः) । श्लोक भावानुवाद-स्वयंको सभीके पाँवोंके नीचे रौंदे जानेपर भी कोई प्रतिरोध नहीं करनेवाले तृणसे भी अपनेको नीचा माननेवाले, वृक्षसे भी अधिक सहनशीलता-गुणयुक्त, समस्त सांसारिक अभिमानसे रहित, अन्य सभीको (योग्य अथवा अयोग्यको) मान प्रदान करनेवाले जन, निरन्तर हरि-कीर्त्तन (अधर-ओष्ठ-जिह्वासे हरिनाम उच्चारण) कर सकते हैं॥31॥ इस श्लोकके अनुसार चलनेके लिये कविराज गोस्वामीका सभीको सविनय अनुरोध :- उर्द्धबाहु करि' कहौं, शुन, सर्वलोक। नाम-सूत्रे गाँथि' पर कण्ठे एइ श्लोक ॥ 32 ॥ प्रभु-आज्ञाय कर एइ श्लोक आचरण। अवश्य पाइबे तबे श्रीकृष्णचरण॥33॥ अनुवाद-मैं अपनी भुजाएँ उठाकर कह (विनती कर) रहा हूँ,-“सब लोग सुनो ! इस श्लोकको श्रीकृष्णनामके धागेपर पिरोकर सदा स्मरण करनेके लिये अपने कण्ठमें धारण करो।” महाप्रभुकी आज्ञा है कि इस श्लोककी शिक्षाका अपने जीवनमें आचरण करो, तब अवश्य ही तुम्हें श्रीकृष्णके चरणोंकी प्राप्ति होगी ॥ 32-33 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-ग्रन्थकार कह रहे हैं,-“ओहे सर्वजनगण! मैं अपनी भुजाएँ उठाकर कह रहा हूँ, तुम इसे सुनो। श्रीकृष्णनाम-मालामें इस श्लोकको गून्थकर कण्ठमें धारण करो। तात्पर्य यह है कि अधिकारी नहीं होनेपर नाम जप करनेसे 'नामाभास' अथवा 'नामापराध' होता है। इससे जीवको नामका फल जो 'श्रीकृष्णप्रेम' है, वह प्राप्त नहीं होता है। महाप्रभुके द्वारा रचित इस 'तृणादपि' श्लोकमें जो उपदेश दिया गया है, उसके अनुसार आचरण करते-करते हरिनाम करो, ऐसा करनेसे तुम अवश्य ही श्रीकृष्णचरणोंको प्राप्त करोगे॥”32-33॥ अनुभाष्य-'नामसूत्रे गाँथि'-प्राकृत अभिमानसे रहित ये चार भाव-(1) सुनीचता, (2) सहिष्णुता, (3) अमानी होना और (4) सबको मान प्रदान करना, श्रीहरिनामरूपी सूत्रसे माला अथवा रक्षाकवच पिरोनेकी वस्तु हैं। प्राकृत अभिमान रहनेपर निरन्तर हरिनाम कीर्त्तन करना सम्भव नहीं है। जड़्रीय अभिमानादि हरिनाममें बाधक हैं। चार प्रकारके अभिमानोंसे रहित होनेके उपरान्त ही शुद्धजीव सदैव हरिनाम कीर्त्तन कर पाते हैं। इस प्रकार साधन-भक्तिकी (उपरोक्त चार भावोंको धारण करनेकी) अनुशासनरूपी इस आज्ञाका सुचारु रूपसे पालन करनेपर हरिनाम-कीर्त्तनके फलस्वरूप श्रीकृष्णचरणोंकी अवश्य ही प्राप्ति होगी ॥ 32-33 ॥ एक वर्षतक श्रीवासके घरमें सङ्कीर्त्तन :- तबे प्रभु श्रीवासेर गृहे निरन्तर। रात्रे सङ्कीर्त्तन कैल एक सम्वत्सर ॥ 34 ॥ 226 | श्रीचैतन्यचरितामृत

17/34-45 ] अनुवाद-तत्पश्चात् महाप्रभुने श्रीवासके घरपर एक वर्षतक निरन्तर रात्रिकालमें सङ्कीर्त्तन किया ॥ ३४ ॥ द्वेषी-पाषण्डी व्यक्तियोंका प्रवेश निषेध :- कपाट दिया कीर्त्तन करे परम आवेशे। पाषण्डी हासिते आइसे, ना पाय प्रवेशे ॥ ३५ ॥ श्रीवासके प्रति ईर्ष्या और विद्वेष :- कीर्त्तन शुनि' बाहिरे तारा ज्वलि' पुड़ि' मरे। श्रीवासेरे दुःख दिते नाना युक्ति करे ॥ ३६ ॥ अनुवाद-द्वार बन्द करके महाप्रभु परमावेशमें सङ्कीर्त्तन करते थे। पाषण्डी लोग उनका उपहास करनेके लिये आते, परन्तु द्वार बन्द होनेके कारण वे भीतर प्रवेश नहीं कर पाते। वे बाहरसे ही कीर्त्तन सुनकर ईर्ष्याके कारण जल मरते थे। तब वे श्रीवासको दुःख देनेके लिये अनेक प्रकारकी युक्तियाँ करने लगे ॥ ३५-३६ ॥ श्रीवासके विरुद्ध गोपाल-चापालका काण्ड :- एकदिन विप्र, नाम-'गोपाल चापाल'। पाषण्डि-प्रधान सेइ दुर्मुख, वाचाल ॥ ३७ ॥ भवानी-पूजार सब सामग्री लञा। रात्रे श्रीवासेर द्वारे स्थान लेपाञा ॥ ३८ ॥ अनुवाद-एक दिन रात्रिमें पाषण्डियोंमें प्रधान दुर्वचन और अधिक बोलनेवाला 'गोपाल-चापाल' नामका एक ब्राह्मण भवानी-पूजाकी सारी सामग्री लाया और उसने श्रीवास पण्डितके घरके द्वारके बाहर भूमिको लेपकर वह सामग्री रख दी ॥ ३७-३८ ॥ अनुभाष्य-चैतन्यभागवतमें 'गोपाल-चापाल' का कोई वृत्तान्त प्राप्त नहीं होता है ॥ ३७ ॥ श्रीवासको शक्तिके उपासक दिखलानेकी चेष्टा :- कलार पात उपरे थुइल ओड़-फुल। हरिद्रा, सिन्दूर आर रक्तचन्दन, तण्डुल ॥ ३९ ॥ मद्यभाण्ड-पाशे धरि' निज-घरे गेल। प्रातःकाले श्रीवास ताहा त' देखिल ॥ ४० ॥ श्रीवासको शक्तिका उपासक सिद्ध करनेकी चेष्टा :- बड़ बड़ लोकेर आनिल बोलाइया। सबारे कहे श्रीवास हासिया हासिया ॥ ४१ ॥ "नित्य रात्रे करि आमि भवानी-पूजन। आमार महिमा देख, ब्राह्मण-सज्जन ॥" ४२ ॥ अनुवाद-वह केलेके पत्तेके ऊपर जवा-पुष्प, हल्दी, सिन्दूर, लाल-चन्दन, चावल और साथमें मदिराका पात्र रखकर अपने घर चला गया। प्रातःकाल श्रीवासने उठकर जब उस सामग्रीको देखा, तो वे पड़ोसके सभी सम्माननीय व्यक्तियोंको बुलाकर हँसते-हँसते कहने लगे, "हे ब्राह्मणों ! हे सज्जनों ! मेरी महिमा देखो। मैं प्रत्येक रात्रिमें भवानीकी पूजा करता हूँ ॥" ३९-४२ ॥ अनुभाष्य-'बोलाइया'-बुलाकर ॥ ४१ ॥ स्थानीय सज्जन व्यक्तियोंके मनमें क्षोभ और स्थान-शुद्धिकरण :- तबे सब शिष्टलोक करे हाहाकार। 'ऐछे कर्म हेथा कैल कोन् दुराचार ॥' ४३ ॥ हाड़िके आनिया सब दूर कराइल। जल-गोमय दिया सेइ स्थान लेपाइल ॥ ४४ ॥ अनुवाद-तब सब सज्जन लोग हाहाकार करके कहने लगे, "किस दुराचारीने ऐसा नीच कर्म किया है?" उन्होंने जमादारको बुलवाकर वह सब सामग्री दूर फिंकवा दी और जल तथा गोबरसे उस स्थानको लीपकर शुद्ध किया ॥ ४३-४४ ॥ वैष्णव-अपराधके फलस्वरूप गोपाल-चापालको कोढ़ :- तिन दिन रहि' सेइ गोपाल-चापाल। सर्वाङ्गे हइल कुष्ठ, बहे रक्तधार ॥ ४५ ॥ अनुवाद-तीन दिन बाद उस गोपाल-चापालके सभी अङ्गोंमें कुष्ट रोग हो गया और उनमेंसे रक्त बहने लगा ॥ ४५ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिस समय महाप्रभु श्रीवास सतरहवाँ अध्याय | 227

[ 17/35-53

आङ्गनमें द्वार बन्द करके कीर्तन-आनन्दका आस्वादन करते थे, उस समय नगरके अनेक बहिर्मुख ब्राह्मण वैष्णवोंका परिहास करनेके लिये अनेक प्रकारसे चेष्टा करने लगे। 'गोपाल-चापाल' नामका कोई एक वाचाल भट्टाचार्य देवी-पूजाकी सामग्री, केलेका पत्ता, जवाफूल और लाल-चन्दनादि मदिराके बर्तनके साथ उस बन्द द्वारके बाहर रखकर चला गया। प्रातःकालमें श्रीवासपण्डितने उसे देखकर परिहास करते हुए सभीसे कहा, — 'देखो देखो, मैं प्रत्येक रात्रिमें भवानीकी पूजा करता हूँ, इसके द्वारा मेरे 'शाक्त' होनेके परिचयकी जो महिमा है, उसे आप लोग जान लें।' सभी सज्जन लोग उसे देखकर बहुत दुःखी हुए और उन्होंने जमादारको बुलाकर मंदिरादि गन्दी वस्तुओंको दूर फिंकवा दिया। तब जल और गोबरके द्वारा उस स्थानको लीपकर शुद्ध किया। इस वैष्णवापराधके कारण गोपाल-चापालको रक्तस्राव होनेवाला कुष्टरोग हो गया ॥ 35-45 ॥

सर्वाङ्ग बेड़िल कीटे, काटे निरन्तर। असह्य वेदना, दुःखे ज्वलये अन्तर ॥ 46 ॥

अनुवाद—उसके सभी अङ्गोंमें कीड़े पड़ गये, जो उसे निरन्तर काटने लगे और उसको असहनीय पीड़ा होने लगी। उस दुःखकी ज्वालासे उसका अन्तःकरण जलने लगा ॥ 46 ॥

गङ्गातटपर वास और महाप्रभुसे उद्धार-कामना :— गङ्गाघाटे वृक्षतले रहे त' बसिया। एक दिन बले किछु प्रभुके देखिया ॥ 47 ॥ “ग्राम-सम्बन्धे आमि तोमार मातुल। भागिना, मुइ कुष्ठव्याधिते हञाछि व्याकुल ॥ 48 ॥ लोक सब उद्धारिते तोमार अवतार। मुञि बड़ दुःखी, मोरे करह उद्धार ॥” 49 ॥

अनुवाद—[कुष्टरोग संक्रामक रोग होनेके कारण वह ग्रामसे निकाल दिया गया था, इसलिये] वह गङ्गाके तटपर एक वृक्षके नीचे रहने लगा। एक दिन उसने महाप्रभुको देखकर उनसे कहा, — “ग्रामके सम्बन्धसे मैं तुम्हारा मामा लगता हूँ। हे भाञ्जे ! मुझे यह कुष्ट रोग हो गया है, जिसके कारण मैं बहुत कष्टमें हूँ। लोगोंका उद्धार करनेके लिये तुम्हारा यह अवतार हुआ है। मैं बहुत दुःखी हूँ, मेरा भी उद्धार करो ॥" 47-49 ॥

उसके वैष्णवापराधी होनेके कारण महाप्रभुके क्रोधपूर्ण वचन और उद्धारके लिये असम्मति :— एत शुनि' महाप्रभुर हइल क्रु क्रोधावेशे बले तारे तर्ज्जन-वचन ॥ 50 ॥ “आरे पापि, भक्तद्वेषि, तोरे ना उद्धारिमु। कोटिजन्म एड् मते कीड़ाय खाओयाइमु ॥ 51 ॥ श्रीवासे कराइलि तुइ भवानी-पूजन। कोटि जन्म हबे तोर रौरवे पतन ॥ 52 ॥ पाषण्डी संहारिते मोर एइ अवतार। पाषण्डी संहारि' भक्ति करिमु सञ्चार ॥” 53 ॥

अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुको क्रोध आ गया और क्रोधके आवेशमें उसे डाँटते हुए कहा, — “अरे पापी, भक्तद्वेषी ! मैं तुम्हारा उद्धार नहीं करूँगा। करोड़ों जन्म इसी प्रकार कीड़ोंके द्वारा तुम्हारे शरीरको कटवाऊँगा। तुमने श्रीवासपर भवानी पूजाका दोष लगाया है, करोड़ों जन्म तुम्हें रौरव नरक भोगना पड़ेगा। पाषण्डियोंके संहारके लिये ही मेरा यह अवतार हुआ है। पाषण्डियोंका संहार करके मैं जगत्में भक्तिका सञ्चार करूँगा ॥” 50-53 ॥

अनुभाष्य—अवैष्णव लोग ही भवानीकी पूजा करते हैं, यह वैष्णवोंका कार्य नहीं है। उसकी निन्दा करके महाप्रभुने बतलाया है कि अपने हृदयमें बहु-ईश्वरवादका पोषण करनेवाले अर्थात् अनेक देव-देवीकी उपासनाके पक्षपाती प्राकृत बिद्ध-वैष्णवोंका (जो शुद्ध वैष्णव नहीं हैं, उनका) सङ्ग वास्तवमें 'दुःसङ्ग' ही है॥ 52 ॥

228 | श्रीचैतन्यचरितामृत

17/54-61 ] वैष्णवापराधीका निरन्तर कष्ट भोग करनेके कारण सहज मृत्यु नहीं :- एत बलि' गेला प्रभु करिते गङ्गास्नान। सेइ पापी दुःख भोगे, ना याय पराण ॥ 54 ॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु गङ्गास्नानके लिये चले गये। वह पापी बहुत दुःख भोगता रहा, परन्तु उसके प्राण नहीं निकलते थे॥54॥ अनुभाष्य—'भोगे'—भोग रहा था॥54॥ महाप्रभुके पुनः आनेपर उसकी शरणागति :- संन्यास करिया यबे प्रभु नीलाचले गेला। तथा हैते यबे कुलिया ग्रामे आइला ॥ 55 ॥ तबे सेइ पापी प्रभुर लइल शरण। हित-उपदेश कैल हइया करुण ॥ 56 ॥ श्रीवास पण्डितसे अपराध-क्षमा प्रार्थनाके लिये महाप्रभुका उपदेश :- “श्रीवास पण्डितेर स्थाने आछे अपराध। तथा याह, तेंहो यदि करेन प्रसाद ॥ 57 ॥ शरणागतिके बाद पुनः पापाचरणका निषेध :- तबे तोमार हबे एइ पाप-विमोचन। यदि पुनः ऐछे नाहि कर आचरण॥" 58 ॥ अनुवाद—संन्यास लेनेके बाद महाप्रभु नीलाचल चले गये और वहाँसे जब वे कुलिया लौटकर आये, तब उस पापीने उनकी शरण ग्रहण की। महाप्रभुने करुणा करके उसके हितके लिये उपदेश दिया,—“श्रीवास पण्डितके चरणोंमें तुम्हारा अपराध हुआ है, इसलिये उनके पास जाकर क्षमा याचना करो। यदि वे तुमपर कृपा करेंगे और पुनः ऐसे पापका आचरण नहीं करोगे, तो तुम्हारी इस पापसे मुक्ति हो जायेगी॥”55-58॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘कुलियाग्राम’—गङ्गाके पूर्व तटपर उस समय नवद्वीप था और गङ्गाके दूसरी ओर कुलियाग्राम था, जिसे अब नवद्वीप कहते हैं॥55॥ अनुभाष्य—‘कुलिया’-ग्राम अर्थात् जिसे अब नवद्वीप शहर कहते हैं। ‘सबे गङ्गा मध्ये नदीयाय-कुलियाय’— चैःभाः अन्त्यखण्ड, 3/380; कुलिया गङ्गाके पश्चिम तटपर और नवद्वीप पूर्व तटपर था। ‘भक्तिरत्नाकर’—बारहवीं तरङ्ग, ‘चैतन्य-चरित महाकाव्य’, ‘चैतन्य-चन्द्रोदय’ नाटक और ‘चैतन्यभागवत’ में गङ्गाके पश्चिम तटपर स्थित कुलियाका उल्लेख द्रष्टव्य है। कोलद्वीपके अन्तर्गत कुलिया-ग्राममें आजतक ‘कुलियार गञ्ज’ नामक एक पल्ली (मोहल्ला) है; ‘कुलियार दह’ नामक जो जलस्रोत है, वह इस समय नवद्वीप शहरमें है। महाप्रभुके समय गङ्गाके पश्चिम तटपर जो ‘कुलिया’ और ‘पहाड़पुर’ नामक ग्राम थे, वे ‘बाहिर द्वीप’ के अन्तर्गत थे। नवद्वीप उस समय गङ्गाके पूर्व तटपर था, जिसे अब ‘अन्तर्द्वीप’ कहते हैं। वह श्रीमायापुरमें ‘द्वीपेर मठ’ के नामसे अभी भी प्रसिद्ध है। काँचड़ा-पाड़ाके निकट जो ‘कुलिया’ नामक गाँव है, वह उपरोक्त कुलिया ग्राम अथवा ‘अपराध-भञ्जन पाट’ नहीं है। धामविद्वेषके कारण कल्पना और भ्रमवश कुछेक वर्षोंसे वैसी मिथ्या धारणाकी उत्पत्ति हुई है॥55॥ गोपाल-चापालकी श्रीवास-चरणोंकी शरण ग्रहण और अपराध-मोचन :- तबे विप्र लइल श्रीवासेर शरण। ताँहार कृपाय हैल पाप-विमोचन ॥ 59 ॥ अनुवाद—तब उस ब्राह्मणने श्रीवास पण्डितकी शरण ग्रहण की और उनकी कृपासे उसकी पापसे मुक्ति हुई॥59॥ और एक दुर्बुद्धि ब्राह्मणके द्वारा महाप्रभुको शाप-प्रदान-कार्य :- आर एक विप्र आइल कीर्त्तन देखिते। द्वारे कपाट,—ना पाइल भितरे याइते ॥ 60 ॥ फिरि' गेल विप्र घरे मने दुःख पाञा। आर दिन प्रभुके कहे गङ्गाय देखिया ॥ 61 ॥ सतरहवाँ अध्याय | 229

[ 17/60-68

“शापिब तोमारे मुञि, पाञाछि मनोदुःख।” पैता छिण्डिया शापे प्रचण्ड दुर्मुख ॥ 62 ॥ “संसार-सुख तोमार हउक विनाश।” शाप शुनि' महाप्रभुर हइल उल्लास ॥ 63 ॥ अनुवाद-कीर्तनको देखनेके लिये एक और ब्राह्मण आया था, परन्तु द्वार बन्द होनेके कारण वह भीतर नहीं जा सका। वह मन-ही-मन दुःखी होकर अपने घर लौट गया। वह ब्राह्मण कटु भाषी और दूसरोंको शीघ्र ही शाप देनेवाला था। बादमें एक दिन उसने महाप्रभुको गङ्गा तटपर देखकर कहा,-“मैं तुम्हें शाप दूँगा, क्योंकि तुमने मेरे मनको कष्ट दिया है।” उसने अपने जनेऊको तोड़कर महाप्रभुको शाप दिया,-“तुम्हारा संसार सुख नष्ट हो जाय।” इसे सुनकर महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए॥ 60-63॥ प्रभुर शाप-वार्त्ता सुने हञा श्रद्धावान्। ब्रह्मशाप हैते तार हय परित्राण ॥ 64 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके प्रति ब्राह्मणके शापकी कथा जो श्रद्धापूर्वक सुनेगा, ब्रह्मशापसे भी उसकी मुक्ति हो जायेगी ॥ 64॥ अनुभाष्य-मायाधीश महाप्रभुको शापादिके अधीन अथवा यमदण्ड तथा कर्मफलके अधीन जीव समझकर पाषण्डी होनेकी अपेक्षा उन्हें नित्य सेव्य परमेश्वर जाननेपर जीवोंकी अनादि-कृष्णबहिर्मुखता दूर होती है। यह घटना चैतन्यभागवतमें नहीं है॥ 64॥ मुकुन्दको दण्ड देकर उसपर कृपा :- मुकुन्द-दत्तेरे कैल दण्ड-परसाद। खण्डिल ताहार चित्ते सब अवसाद ॥ 65 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने मुकुन्द-दत्तपर दण्डरूप कृपा की और उनके चित्तके सभी दुःखोंको दूर किया॥ 65॥ अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुके महाप्रकाशके दिन मुकुन्ददत्त द्वारके बाहर खड़े थे। महाप्रभुने एक-एक करके अन्य सभी भक्तोंपर कृपा की। उन भक्तोंने महाप्रभुको बतलाया कि मुकुन्ददत्त बाहर खड़े हैं। तब महाप्रभुने कहा,-'मैं मुकुन्ददत्तपर शीघ्र ही प्रसन्न नहीं होऊँगा, क्योंकि वह भक्तोंको तो शुद्धभक्तिकी कथा कहता है और मायावादियोंके पास जाकर योगवाशिष्ठमें लिखे मायावादको स्वीकार करता है। उसके इस आचरणसे मुझे सदा दुःख होता है।' मुकुन्ददत्तने बाहर यह बात सुनकर कहा,-'मैं धन्य हूँ, क्योंकि जगत्-तारण महाप्रभु यदि शीघ्र कृपा नहीं करेंगे, तो कभी-न-कभी तो वे मुझपर अवश्य ही कृपा करेंगे।' तब महाप्रभुने मुकुन्ददत्तका दृढ़तापूर्वक मायावादियोंके सङ्गके परित्यागका निश्चय जानकर उसी क्षण उनको अपने पास बुलाकर अपनी प्रसन्नता प्रकाश की। इस कार्यसे महाप्रभुने मुकुन्ददत्तको मायावादियोंके सङ्गरूप अपराधका दण्ड प्रदानकर उन्हें शुद्धभक्तसङ्गके फलस्वरूप कृपा दी॥ 65॥ अनुभाष्य-'मुकुन्दके ऊपर दण्ड-रूपी कृपा'-चैःभाः मध्यखण्ड, दसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥ 65॥ श्रीअद्वैतको दण्डरूपी कृपा :- आचार्य-गोसाञिरे प्रभु करे गुरुभक्ति। ताहाते आचार्य बड़ हय दुःखमति ॥ 66 ॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीअद्वैताचार्यका गुरुकी भाँति सम्मान करते थे, जिससे श्रीअद्वैताचार्यके मनमें बहुत दुःख होता था॥ 66॥ भङ्गी करि' ज्ञानमार्ग करिल व्याख्यान। क्रोधावेशे प्रभु तारे कैल अवज्ञान ॥ 67 ॥ तबे आचार्य-गोसाञिर आनन्द हइल। लज्जित हइया प्रभु प्रसाद करिल ॥ 68 ॥ अनुवाद-जान-बूझकर श्रीअद्वैताचार्य ज्ञानमार्गकी श्रेष्ठताकी व्याख्या करने लगे। यह सुनकर महाप्रभुने क्रोधके आवेशमें उनको दण्ड दिया, जिससे श्रीअद्वैताचार्यको

230 | श्रीचैतन्यचरितामृत

17/66-70 ]

बहुत आनन्द हुआ। तब महाप्रभुने लज्जित होकर उनपर कृपा की॥67॥ अमृतप्रवाह भाष्य- श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुके गुरु श्रीईश्वरपुरीके गुरुभ्राता थे, इस सम्बन्धसे महाप्रभु स्वयंको दास मानकर उनकी गुरुके समान भक्ति करते थे। श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुके द्वारा इस प्रकार गौरव प्रदान किये जानेपर दुःखी होते थे और उनसे दण्डरूपी कृपा पानेके लिये शान्तिपुरमें कुछ दुर्भागे व्यक्तियोंको ज्ञानमार्गकी श्रेष्ठताकी व्याख्या करने लगे। यह सुनकर महाप्रभुने क्रोधमें आविष्ट होकर शान्तिपुर जाकर श्रीअद्वैतप्रभुकी अच्छी प्रकारसे पिटाईयी की। वह पिटाईयी खाकर श्रीअद्वैतप्रभु यह कहकर नाचने लगे,–“देखो, आज मेरी इच्छा पूर्ण हुई। महाप्रभु कृपणतापूर्वक मुझे गुरुके समान मानते थे और आज उन्होंने मुझे अपना दास और शिष्य मानकर मेरी मायावादरूप दुर्मतिसे रक्षा करनेकी चेष्टा की।” श्रीअद्वैताचार्यकी यह भङ्गी देखकर महाप्रभु लज्जित हुए और उनके प्रति प्रसन्न हुए॥66-68॥

मुरारि गुप्तकी ऐकान्तिकी श्रीरामनिष्ठा :- मुरारिगुप्त-मुखे शुनि' राम-गुणग्राम। ललाटे लिखिल ताँर 'रामदास' नाम॥69॥

अनुवाद- महाप्रभुने मुरारिगुप्तके मुखसे श्रीरामचन्द्रके गुणोंका बखान सुनकर उनके माथेपर उनका 'रामदास' नाम लिख दिया॥69॥ अमृतप्रवाह भाष्य- एक दिन महाप्रभुने राममन्त्रोपासक मुरारिगुप्तको श्रीरामके स्तवका पाठ करनेको कहा। तब मुरारिगुप्तने महाप्रेममें आविष्ट होकर श्रीरामाष्टकका पाठ किया,– “इत्थं निशम्य रघुनन्दनराजसिंहश्लोकाष्टकं स भगवान् चरणं मुरारेः। वैद्यस्य मूर्ध्नि विनिधाय लिलेख भाले त्वं 'रामदास' इति भो भव मत्प्रसादात्॥” “'रघुनन्दनराजसिंहश्लोकाष्टकं' को सुनकर महाप्रभुने अपने चरण मुरारिगुप्तके मस्तकपर रख दिये और उनके माथेपर 'रामदास' लिखकर कहा कि तुम मेरी कृपासे सदाके लिये रामदास हुए हो॥” 69॥

अनुभाष्य- चैतन्यमङ्गल मध्यखण्ड- 'रामं जगत्त्रयगुरूं सततं भजामि।' “एइमते रघुवीराष्टक श्लोक शुनि'। मुरारि-मस्तके पद दिला त' आपनि॥ 'रामदास' बलि' नाम लिखिला कपाले। मोर परसादे तुमि 'रामदास' हइले॥ इहा बलि' राम-रूप देखाइल तारे। स्तव करे मुरारि पड़िया पदतले॥” “'तीनों जगत्के गुरु श्रीरामचन्द्रका मैं निरन्तर भजन करता हूँ, इस प्रकार रघुवीराष्टकका श्लोक सुनकर महाप्रभुने अपने चरणोंको मुरारि गुप्तके मस्तकपर रखा और उनके माथेपर 'रामदास' लिख दिया। तब महाप्रभुने कहा कि मेरी कृपासे तुम 'रामदास' हुए हो। यह कहकर महाप्रभुने उन्हें अपना रामरूप दिखलाया। उसे देखकर मुरारिगुप्त उनकी स्तुति करते हुए उनके चरणोंमें गिर पड़े।” मुरारिगुप्तके प्रति महाप्रभुकी कृपा-चैःभाः मध्यखण्ड, दसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥69॥

श्रीधरके घरमें लोहेके पात्रमें जलपान और वरप्रदान :- श्रीधरेर लौहपात्रे कैल जलपान। समस्त भक्तरे दिल इष्ट वरदान॥70॥

अनुवाद- महाप्रभुने श्रीधरके घरमें उसके टूटे हुए लोहेके पात्रमें जलका पान किया। महाप्रभुने सभी भक्तोंको उनके इष्ट वरको प्रदान किया॥70॥ अमृतप्रवाह भाष्य- प्रथम नगरकीर्त्तन-रात्रिमें काजीका उद्धार करनेके बाद चाँदकाजी कीर्त्तनके साथ-साथ श्रीधरके आङ्गनतक आया था। वहाँपर कीर्त्तनका विश्राम होनेपर महाप्रभुने कृपापूर्वक श्रीधरके टूटे हुए लोहेके पात्रमें जो जल था, उसे 'भक्तके द्वारा दिया गया जल' कहकर उसका पान किया। काजी उस स्थानसे वापिस लौट गया। मायापुरके उत्तर-पूर्वांशमें उस स्थानको अभी भी 'कीर्त्तन-विश्रामस्थान' कहते हैं॥70॥

सतरहवाँ अध्याय | 231

[ 17/70-76 अनुभाष्य-‘श्रीधरके लौह-पात्रमें महाप्रभुके द्वारा अनुवाद—एक दिन महाप्रभुने भक्तोंको नामकी जलपान'—चैःभाः मध्यखण्ड, तेइसवाँ अध्याय द्रष्टव्य महिमा सुनायी। इसे सुनकर एक छात्रने उसमें अर्थवादका है॥ 70 ॥ आरोप किया। नाममें स्तुतिवाद सुनकर महाप्रभुको दुःख हुआ और उन्होंने सभी भक्तोंसे कहा,—“आजसे इसका ठाकुर श्रीहरिदासपर कृपा, शचीमाताके मुख भी मत देखना।” महाप्रभुने तब अपने परिकरोंके अपराध-मोचनका अभिनय :— साथ वस्त्रोंके सहित स्नान किया और वहाँ उन्होंने हरिदास ठाकुरेर करिल प्रसाद। भक्तिकी महिमाकी व्याख्या की—‘ज्ञान, कर्म, योग, आचार्य-स्थाने मातार खण्डाइल अपराध ॥ 71 ॥ धर्मादि साधनोंके द्वारा श्रीकृष्णको वशीभूत नहीं किया अनुवाद—महाप्रभुने हरिदास ठाकुरपर कृपा की जा सकता। श्रीकृष्णको वशमें करनेका एकमात्र उपाय और शचीमाताके द्वारा श्रीअद्वैताचार्यके प्रति हुए अपराधको श्रीकृष्णप्रेम-रस ही है॥'72-75॥ खण्डित करवाया॥ 71 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—एकदिन महाप्रभुने भक्तोंको नामकी अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रकाशके दिन महाप्रभुने अपार महिमाका वर्णन किया, उसे सुनकर किसी दुर्भागे हरिदास ठाकुरको आलिङ्गन करके उनको प्रह्लादका छात्रने कहा, - 'यह सब नामकी महिमा वास्तविक नहीं अवतार बतलाकर उन्हें वरदान दिया। है, शास्त्रमें नामका स्तुतिवाद मात्र किया गया है।' इस विश्वरूपके संन्यास लेनेपर शचीमाताने इसका दोष प्रकार नाम-महिमाका अन्य अर्थ करनेसे नाममें श्रीअद्वैताचार्यपर लगाया। इस प्रकार मातासे जो यह 'अर्थवादरूप' नामापराध होता है। नामापराधके समान वैष्णवापराध हुआ, उसे उनके द्वारा श्रीअद्वैताचार्यकी और किसी प्रकारका अपराध उतना भयङ्कर नहीं है। पदधूलि लेकर खण्डन करवाया॥ 71 ॥ उस अपराधी छात्रका मुख भी देखनेका निषेध करके अनुभाष्य—'हरिदास ठाकुरपर कृपा'—चैःभाः मध्यखण्ड, महाप्रभुने अपने परिकरोंके साथ वस्त्र-सहित गङ्गास्नान दसवाँ और 'शचीमातापर महाप्रभुकी कृपा'—चैःभाः मध्यखण्ड, किया। इसका तात्पर्य यह है कि नामापराधीका मुख बाइसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥ 71 ॥ देखनेपर वस्त्रोंके साथ ही स्नान करना उचित है—यही इसकी शिक्षा है॥ 72-73 ॥ एक पाषण्डी छात्रका श्रीनाममें अर्थवाद :— भक्तगणे प्रभु नाम-महिमा कहिल। अनुभाष्य—साक्षात् श्रीकृष्णसे अभिन्न श्रीनामप्रभुकी शुनिया पड़ुया ताहाँ अर्थवाद कैल ॥ 72 ॥ महिमाको 'अतिस्तुति' (महिमाको बढ़ा-चढ़ाकर कहा नामे स्तुतिवाद शुनि' प्रभुर हैल दुःख। गया है), 'अप्रकृत' (वास्तवमें नहीं है), इसलिये उसे सबारे निषेधिल,—“इहार ना देखिह मुख॥”73 ॥ 'असत्य' मानकर (नाम और नामीमें) भेद-बुद्धिका नाम सगण वस्त्र-सहित गङ्गास्नान और एकमात्र ही 'अर्थवाद' अथवा (मिथ्या) स्तुतिवाद अथवा निन्दावाद अभिधेय भक्तिकी महिमा-गान :— है। यह केवल पाषण्डता अथवा नास्तिकता अर्थात् सगणे सचेले गिया कैल गङ्गास्नान। केवल ईश्वरका विरोध मात्र ही है॥ 72 ॥ भक्तिर महिमा ताहाँ करिल व्याख्यान ॥ 74 ॥ श्रीमद्भागवत (11/14/20)— ज्ञान-कर्म-योग-धर्मे नहे कृष्ण वश। ना साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव। कृष्णवश-हेतु एक—कृष्णप्रेम-रस ॥ 75 ॥ न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता ॥ 76 ॥ 232 | श्रीचैतन्यचरितामृत

17/76–78 ] अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे उद्धव! मेरे प्रति की गयी प्रबल भक्ति जिस प्रकार मुझे वशीभूत कर सकती है, अष्टाङ्ग-योग, अभेद-ब्रह्मवादरूप सांख्यज्ञान, ब्राह्मणोंका स्वशाखा-अध्ययनरूप स्वाध्याय, सब प्रकारकी तपस्या और त्यागरूप संन्यासादिके द्वारा मुझे वैसा वशीभूत नहीं किया जा सकता है॥७६॥ अनुभाष्य—हे उद्धव, योगः (मरुन्नियमज-यमनियमासन- प्राणायामादिः), सांख्यं (कपिलकथितं तत्त्वसंख्यानं) धर्मः (वर्णाश्रम धर्मः), स्वाध्यायः (वेदाध्ययनं), तपः, त्यागः (संन्यासः), [तथा] मां न साधयति (वशीकरोति) यथा मम उर्जिता (वर्द्धिता) भक्तिः [मां वशीकरोति]। श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७६॥ मुरारिकी प्रशंसा :— मुरारिके कहे प्रभु,—कृष्ण वश कैला। शुनिया मुरारि श्लोक कहिते लागिला॥७७॥ अनुवाद—अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥७७॥ अनुभाष्य—महाप्रभुने मुरारिगुप्तसे कहा,—'तुमने अपनी प्रेमाभक्तिके द्वारा श्रीकृष्णको वशीभूत कर लिया है।' मुरारिगुप्तने 'सुदामा'-विप्रके द्वारा कहे गये भागवतके श्लोकका उच्चारण करके उसका उत्तर दिया॥७७॥ श्रीमद्भागवत (10/81/16)— क्वाहं दरिद्रः पापीयान् क्व कृष्णः श्रीनिकेतनः। ब्रह्मबन्धुरिति स्माहं बाहुभ्यां परिरम्भितः॥७८॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—(सुदामाने कहा)—कहाँ मैं अति पापी दरिद्र, कहाँ श्रीनिकेतन (लक्ष्मीके निवासस्थान) श्रीकृष्ण! उन्होंने मुझे अयोग्य ब्राह्मण-पुत्र जानकर मेरा आलिङ्गन किया, यह अति आश्चर्यका विषय है॥७८॥ अनुभाष्य—घर जानेको तत्पर 'श्रीसुदामा' अथवा 'श्रीदाम' विप्रकी मन-ही-मनमें उक्ति— दरिद्रः (समृद्धिरहितः) पापीयान् (पापसहितः) अहं क्व? श्रीनिकेतनः (ऐश्वर्यमूलविग्रहः निखिल-पुण्याश्रयः) कृष्णः क्व? अहं ब्रह्मबन्धुः (शौक्रविप्राधमः) [तया कृष्णेन] बाहुभ्यां परिरम्भितः (आलिङ्गितः)। (अयोग्ये मयि ब्रह्मबन्धौ कृष्णालिङ्गनं कदापि न सम्भवतीति कृष्णस्य महत्त्वमेव दर्शितं वक्तु श्लोक भावानुवाद—"कहाँ मैं दरिद्र और पापी? और कहाँ ऐश्वर्यके मूल विग्रह तथा समस्त पुण्योंके आश्रय श्रीकृष्ण? परन्तु श्रीकृष्णने मुझे ब्रह्मबन्धु (अर्थात् जन्मके कारण ब्राह्मण, परन्तु गुणोंमें अधम) जानकर अपनी भुजाओंसे मेरा आलिङ्गन किया। (मेरा अयोग्य ब्रह्मबन्धु होना श्रीकृष्णके आलिङ्गनका कारण नहीं है, अपितु यह श्रीकृष्णकी ही महिमा है, ऐसा वचन सुदामाकी दैन्यताका सूचक है।)।" महाप्रभुके द्वारा कहे गये वाक्यको अनुकूलरूपसे स्वीकार करनेपर यह अर्थ होता है कि श्रीकृष्णको वशीभूत करनेकी शक्ति मुरारिगुप्तमें नहीं है, श्रीकृष्ण अपने भक्तवात्सल्य-गुणसे ही अयोग्य दासके किसी एक तुच्छ गुणको लक्ष्य करके उसे अकल्पनीय सौभाग्यका अधिकारी बनाते हैं। ऐसी भावनासे ही मुरारिगुप्तने इस श्लोकका उच्चारण किया गया है। महाप्रभुके द्वारा कहे गये वाक्यको अपने हितके प्रतिकूल समझकर स्वयंको अयोग्य दिखलानेके उद्देश्यसे यह श्लोक उच्चारण करनेके पश्चात् मुरारि गुप्तने कहा,—'मैं श्रीकृष्णको वशमें करनेमें सम्पूर्ण अयोग्य हूँ, मैं उन्हें वशीभूत नहीं कर पाया।' सुदामा-विप्रने अपनी दरिद्रता, पापमें प्रवृत्ति, अ-ब्राह्मणतादि अपनी अयोग्यताका उल्लेख करके श्रीकृष्ण-आलिङ्गन रूप अपने सौभाग्यको सूचित किया था, किन्तु मुरारि गुप्तकी भावना इस प्रकार है,—'मैं इस प्रकारकी भावनाके भी अयोग्य हूँ।' दशम-टिप्पणी 'वैष्णव-तोषणी' में इस श्लोकका अर्थ इस प्रकार कहा गया है,— “क्वेति। पापीयान् दुर्भगः; कृष्ण साक्षात् भगवान्; एवं कृष्णत्व-पापीयस्त्वयोस्तथा दारिद्र्य-श्रीनिकेतत्वयोर्विरोधः, तथापि सतरहवाँ अध्याय | 233

[ 17/77-78

ब्रह्मबन्धुः विप्रकुलजात इति बाहुभ्यां द्वाभ्यामेव परिरम्भितः परिरब्धः। 'स्म'-विस्मये। एवं परिरम्भे विप्रत्वमेव कारणमुक्तं, न तु सख्यं, तत्रात्मनोऽतीवायोज्यत्वमननात्। अतो भगवतो ब्रह्मण्यतैव श्लाघिता, न तु भक्तवत्सलतापीति।" “'क्वाहं दरिद्रः'-श्लोकका अर्थ बतला रहे हैं। सुदामा कह रहे हैं,-"मैं 'पापीयान्' अर्थात् भाग्यहीन हूँ और श्रीकृष्ण साक्षात् भगवान् हैं। इस प्रकार श्रीकृष्णत्व और पापीयत्व जिस प्रकार परस्पर विरुद्ध हैं, उसी प्रकार दारिद्र्य और श्रीनिकेतनत्व भी हैं। तथापि मैं अधम, ब्राह्मण-कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ, इसी कारण 'बाहुभ्यां'-दो बाहुओंके द्वारा 'परिरम्भित'-आलिङ्गित हुआ हूँ। मेरा ब्राह्मण कुलमें जन्म लेना ही उस आलिङ्गनका कारण है, मेरा सखाभाव नहीं।" यहाँपर उन्होंने अपनी अतीव अयोग्यताका मनन करनेके कारण ऐसा कहा है। इसलिये इस श्लोकमें भगवान्‌की ब्राह्मणोंके प्रति प्रीतिकी ही प्रशंसा हुई है, उनके भक्त-वात्सल्यकी नहीं। इससे पहलेवाले श्लोकमें सुदामाका भाव इस प्रकार कहा गया है,-जिस वक्षपर श्रीकृष्णकी प्राणोंसे अधिक प्रिया कमला विराजती हैं, उस वक्षके द्वारा उनकी ब्राह्मण-सम्बन्धी प्रीतिके वशीभूत होकर ब्रह्मण्यदेवने मेरे जैसे लक्ष्मीहीन दरिद्रका आलिङ्गन किया। इस श्लोकके भावानुसार ही उद्धृत श्लोककी टीकामें कहा गया है,-'ब्राह्मण होना ही आलिङ्गनका कारण है, सखा होना नहीं; तथा दैन्यताके कारण सुदामा विप्र स्वयं नितान्त अयोग्य हैं, वे स्वयं ब्राह्मणका धर्म पालन करने योग्य नहीं हैं, केवल भगवान्ने ही ब्राह्मणकी श्रेष्ठता और अपनी गरिमाके प्रदर्शनके लिये एक ब्रह्मबन्धुके लिये भी वैसी ही प्रीति दिखलायी-यही विस्मयका कारण है। सुदामा विप्रने दैन्यवशतः और स्वयंको अधम ज्ञापन करनेके उद्देश्यसे अपने आपको 'ब्रह्मबन्धु' कहकर अपना तिरस्कार किया। तथा ब्रह्मबन्धुके प्रति भी श्रीकृष्णका असामान्य अनुग्रह है, इसको व्यक्त करके उन्होंने अपने दैन्य और ब्राह्मण स्वभावका वास्तविक परिचय दिया। ऐसी दैन्यताके द्वारा सुदामा-विप्रने अपनी महिमाके त्यागका ज्वलन्त आदर्श प्रस्तुत किया। सुदामा ब्रह्मबन्धु अर्थात् पतित ब्राह्मण नहीं हैं, किन्तु ब्रह्मबन्धुत्व रूप विषयान्तर ही [जो सुदामा विप्रकी निज-सम्पत्ति नहीं है अर्थात् वे वास्तवमें ब्राह्मण हैं, परन्तु स्वयंको ब्रह्मबन्धु मान रहे हैं] वही कृष्णप्रीतिका कारण है, उनका अपना महत्त्व अथवा अपनी श्रीकृष्णभक्ति, श्रीकृष्णको उस प्रकारसे वशीभूत नहीं करती। मुरारि गुप्तने भी वैसे भावोंका अवलम्बन करके निज-महत्त्व आवरण करके दैन्य प्रकाशित किया। उस समयके सामाजिक-दृष्टिकोणसे मुरारिगुप्त शूद्रकुलमें उत्पन्न हुए थे और उन्हें 'ब्रह्मबन्धु' भी नहीं कहा जा सकता था। तब भी 'स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा' इस (भाः 1/4/25) श्लोकका तात्पर्य विचार करके मुरारिगुप्तने शूद्रके समान द्विजबन्धुत्वकी भी उपमा ग्रहण की थी। छान्दोग्य उपनिषद्की टीकामें शङ्कराचार्यने 'ब्रह्मबन्धु' की व्याख्या करते हुए कहा है- 'ब्राह्मणान् बन्धून्-व्यपदिशति, न स्वयं ब्राह्मण-वृत्तः।' (भाः 1/7/57)- “वपनं द्रविणादानं स्थानान्निर्यापणं तथा। एष हि ब्रह्मबन्धूनां वधो नान्योऽस्ति दैहिकः ॥” “शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार सिरका मुण्डन कर देना, धन छीन लेना और अपने स्थानसे बाहर निकाल देना-यह सब पतित ब्राह्मणके लिये उसका वध करनेके समान ही हैं। इसके अतिरिक्त सिर काटना आदिके द्वारा ब्राह्मणके शारीरिक-वधकी आज्ञा शास्त्रोंमें नहीं दी गयी है।” कूर्मपुराण (उत्तरभाग 21/28)- “शूद्रप्रेष्यो भृतो राज्ञो वृषलो ग्रामयाजकः। वधबन्धोपजीवी च षड़ेते ब्रह्मबन्धवः ॥" “जो ब्राह्मण शूद्रका दास हो, राजाका सेवक रहा हो, अन्त्यजोंका याजक रहा हो, किसीका वध करके अथवा अपहरण करके आजीविका चलाता हो-ऐसे

234 | श्रीचैतन्यचरितामृत

छह प्रकारके ब्रह्मबन्धु अर्थात् नीच ब्राह्मण कहे गये हैं।” ब्रह्मबन्धु अथवा केवल ब्राह्मणकुलमें जन्म अपनी योग्यताका परिचय नहीं हैं, परन्तु उससे वस्तुभेदका सापेक्षत्व ही प्रमाणित होता है॥ 77-78 ॥ महाप्रभुके द्वारा आमका वृक्ष लगाना और फल-दान कहानी :- एकदिन प्रभु सब भक्तगण लञा। सङ्कीर्त्तन करि' कैसे श्रमयुक्त हञा॥ 79 ॥ एक आम्रबीज प्रभु अङ्गने रोपिल। ततक्षणे जन्मिया वृक्ष बाड़िते लागिल॥ 80 ॥ देखते देखिते वृक्ष लागिल फलिते। पाकिल अनेक फल, सबेइ विस्मिते॥ 81 ॥ शत दुइ फल प्रभु शीघ्र पाड़ाइल। प्रक्षालन करि' कृष्णे भोग लगाइल॥ 82 ॥ रक्त-पीतवर्ण, —नाहि अष्ठि-वल्कल। एकजनेर पेट भरे —खाइले एक फल॥ 83 ॥ अनुवाद-एक दिन महाप्रभु सब भक्तोंको लेकर सङ्कीर्तन करते हुए कुछ थककर बैठ गये। तब महाप्रभुने एक आमके बीजको अङ्गनमें रोपित किया। उसी क्षण ही उससे एक वृक्ष निकला और वह बढ़ने लगा। देखते-ही-देखते उस वृक्षमें फल लगने लगे और अनेक फल पक गये। यह देखकर सभी विस्मित हो गये। तब महाप्रभुने शीघ्र ही दो सौ फल तुड़वाये और उन्हें धोकर श्रीकृष्णको भोग लगाया। वे फल लाल-पीले रंगके थे और उनमें गुठली और छिलका भी नहीं था। एक फल खानेसे ही एक व्यक्तिका पेट भर जाता था ॥ 79-83 ॥ देखिया सन्तुष्ट हैला शचीर नन्दन। सबाके खाओयाल आगे करिया भक्षण॥ 84 ॥ अष्ठि-वल्कल नाहि, —अमृत-रसमय। एक फल खाइले रसे उदर पूरय॥ 85 ॥ एइमत प्रतिदिन फले बारमास। वैष्णव खायेन फल, —प्रभुर उल्लास॥ 86 ॥ एइसब लीला करे शचीर नन्दन। अन्य लोक नाहि जाने बिना भक्तगण॥ 87 ॥ एइ मत बारमास कीर्त्तन-अवसाने। आम्रमहोत्सव प्रभु करे दिने दिने॥ 88 ॥ अनुवाद-उन फलोंको देखकर महाप्रभु सन्तुष्ट हुए और पहले स्वयं फलको खाकर बाकी फलोंको सबको खिलाया। छिलके-गुठलीसे रहित वह फल अमृतके समान रसमय था और उस एक फलके रससे ही पेट भर जाता था। इसी प्रकार बारह मास प्रतिदिन वैष्णवोंने फल खाये, जिसे देखकर महाप्रभुके हृदयमें उल्लास हुआ। महाप्रभुने जो ये सब लीलाएँ की, इन्हें भक्तोंके अतिरिक्त अन्य कोई नहीं जान सकता है। इस प्रकार बारह मास तक प्रतिदिन कीर्तनके विश्राम होनेपर महाप्रभु आम-महोत्सव करते रहे ॥ 84-88 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-किसी दिन महाप्रभु भक्तोंके साथ नगर-कीर्तन करते हुए थककर जिस स्थानपर पहुँचे, वहाँपर उस भक्तके आङ्गनमें उन्होंने एक आमके बीजको रोपण किया और उसी क्षण उससे वृक्ष निकला तथा उसपर फल लग गये। तब महाप्रभुने उन आमोंसे आम-महोत्सव किया। वह स्थान आज भी 'आम्रघट्ट' (आम-घाटा) के नामसे प्रसिद्ध है॥ 79-86 ॥ अनुभाष्य-यह घटना चैतन्यभागवतमें नहीं है॥ 79-86॥ कीर्तनके समय महाप्रभुका मेघोंको न बरसनेका आदेश :- कीर्त्तन करिते प्रभु, आइला मेघगण। आपन-इच्छाय कैल मेघ निवारण॥ 89 ॥ सत्रहवाँ अध्याय | 235