श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 770, कुल 2549 में से
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ब्रह्मबन्धुः विप्रकुलजात इति बाहुभ्यां द्वाभ्यामेव परिरम्भितः परिरब्धः। 'स्म'-विस्मये। एवं परिरम्भे विप्रत्वमेव कारणमुक्तं, न तु सख्यं, तत्रात्मनोऽतीवायोज्यत्वमननात्। अतो भगवतो ब्रह्मण्यतैव श्लाघिता, न तु भक्तवत्सलतापीति।" “'क्वाहं दरिद्रः'-श्लोकका अर्थ बतला रहे हैं। सुदामा कह रहे हैं,-"मैं 'पापीयान्' अर्थात् भाग्यहीन हूँ और श्रीकृष्ण साक्षात् भगवान् हैं। इस प्रकार श्रीकृष्णत्व और पापीयत्व जिस प्रकार परस्पर विरुद्ध हैं, उसी प्रकार दारिद्र्य और श्रीनिकेतनत्व भी हैं। तथापि मैं अधम, ब्राह्मण-कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ, इसी कारण 'बाहुभ्यां'-दो बाहुओंके द्वारा 'परिरम्भित'-आलिङ्गित हुआ हूँ। मेरा ब्राह्मण कुलमें जन्म लेना ही उस आलिङ्गनका कारण है, मेरा सखाभाव नहीं।" यहाँपर उन्होंने अपनी अतीव अयोग्यताका मनन करनेके कारण ऐसा कहा है। इसलिये इस श्लोकमें भगवान्की ब्राह्मणोंके प्रति प्रीतिकी ही प्रशंसा हुई है, उनके भक्त-वात्सल्यकी नहीं। इससे पहलेवाले श्लोकमें सुदामाका भाव इस प्रकार कहा गया है,-जिस वक्षपर श्रीकृष्णकी प्राणोंसे अधिक प्रिया कमला विराजती हैं, उस वक्षके द्वारा उनकी ब्राह्मण-सम्बन्धी प्रीतिके वशीभूत होकर ब्रह्मण्यदेवने मेरे जैसे लक्ष्मीहीन दरिद्रका आलिङ्गन किया। इस श्लोकके भावानुसार ही उद्धृत श्लोककी टीकामें कहा गया है,-'ब्राह्मण होना ही आलिङ्गनका कारण है, सखा होना नहीं; तथा दैन्यताके कारण सुदामा विप्र स्वयं नितान्त अयोग्य हैं, वे स्वयं ब्राह्मणका धर्म पालन करने योग्य नहीं हैं, केवल भगवान्ने ही ब्राह्मणकी श्रेष्ठता और अपनी गरिमाके प्रदर्शनके लिये एक ब्रह्मबन्धुके लिये भी वैसी ही प्रीति दिखलायी-यही विस्मयका कारण है। सुदामा विप्रने दैन्यवशतः और स्वयंको अधम ज्ञापन करनेके उद्देश्यसे अपने आपको 'ब्रह्मबन्धु' कहकर अपना तिरस्कार किया। तथा ब्रह्मबन्धुके प्रति भी श्रीकृष्णका असामान्य अनुग्रह है, इसको व्यक्त करके उन्होंने अपने दैन्य और ब्राह्मण स्वभावका वास्तविक परिचय दिया। ऐसी दैन्यताके द्वारा सुदामा-विप्रने अपनी महिमाके त्यागका ज्वलन्त आदर्श प्रस्तुत किया। सुदामा ब्रह्मबन्धु अर्थात् पतित ब्राह्मण नहीं हैं, किन्तु ब्रह्मबन्धुत्व रूप विषयान्तर ही [जो सुदामा विप्रकी निज-सम्पत्ति नहीं है अर्थात् वे वास्तवमें ब्राह्मण हैं, परन्तु स्वयंको ब्रह्मबन्धु मान रहे हैं] वही कृष्णप्रीतिका कारण है, उनका अपना महत्त्व अथवा अपनी श्रीकृष्णभक्ति, श्रीकृष्णको उस प्रकारसे वशीभूत नहीं करती। मुरारि गुप्तने भी वैसे भावोंका अवलम्बन करके निज-महत्त्व आवरण करके दैन्य प्रकाशित किया। उस समयके सामाजिक-दृष्टिकोणसे मुरारिगुप्त शूद्रकुलमें उत्पन्न हुए थे और उन्हें 'ब्रह्मबन्धु' भी नहीं कहा जा सकता था। तब भी 'स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा' इस (भाः 1/4/25) श्लोकका तात्पर्य विचार करके मुरारिगुप्तने शूद्रके समान द्विजबन्धुत्वकी भी उपमा ग्रहण की थी। छान्दोग्य उपनिषद्की टीकामें शङ्कराचार्यने 'ब्रह्मबन्धु' की व्याख्या करते हुए कहा है- 'ब्राह्मणान् बन्धून्-व्यपदिशति, न स्वयं ब्राह्मण-वृत्तः।' (भाः 1/7/57)- “वपनं द्रविणादानं स्थानान्निर्यापणं तथा। एष हि ब्रह्मबन्धूनां वधो नान्योऽस्ति दैहिकः ॥” “शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार सिरका मुण्डन कर देना, धन छीन लेना और अपने स्थानसे बाहर निकाल देना-यह सब पतित ब्राह्मणके लिये उसका वध करनेके समान ही हैं। इसके अतिरिक्त सिर काटना आदिके द्वारा ब्राह्मणके शारीरिक-वधकी आज्ञा शास्त्रोंमें नहीं दी गयी है।” कूर्मपुराण (उत्तरभाग 21/28)- “शूद्रप्रेष्यो भृतो राज्ञो वृषलो ग्रामयाजकः। वधबन्धोपजीवी च षड़ेते ब्रह्मबन्धवः ॥" “जो ब्राह्मण शूद्रका दास हो, राजाका सेवक रहा हो, अन्त्यजोंका याजक रहा हो, किसीका वध करके अथवा अपहरण करके आजीविका चलाता हो-ऐसे
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