भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 769

17/76–78 ] अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे उद्धव! मेरे प्रति की गयी प्रबल भक्ति जिस प्रकार मुझे वशीभूत कर सकती है, अष्टाङ्ग-योग, अभेद-ब्रह्मवादरूप सांख्यज्ञान, ब्राह्मणोंका स्वशाखा-अध्ययनरूप स्वाध्याय, सब प्रकारकी तपस्या और त्यागरूप संन्यासादिके द्वारा मुझे वैसा वशीभूत नहीं किया जा सकता है॥७६॥ अनुभाष्य—हे उद्धव, योगः (मरुन्नियमज-यमनियमासन- प्राणायामादिः), सांख्यं (कपिलकथितं तत्त्वसंख्यानं) धर्मः (वर्णाश्रम धर्मः), स्वाध्यायः (वेदाध्ययनं), तपः, त्यागः (संन्यासः), [तथा] मां न साधयति (वशीकरोति) यथा मम उर्जिता (वर्द्धिता) भक्तिः [मां वशीकरोति]। श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७६॥ मुरारिकी प्रशंसा :— मुरारिके कहे प्रभु,—कृष्ण वश कैला। शुनिया मुरारि श्लोक कहिते लागिला॥७७॥ अनुवाद—अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥७७॥ अनुभाष्य—महाप्रभुने मुरारिगुप्तसे कहा,—'तुमने अपनी प्रेमाभक्तिके द्वारा श्रीकृष्णको वशीभूत कर लिया है।' मुरारिगुप्तने 'सुदामा'-विप्रके द्वारा कहे गये भागवतके श्लोकका उच्चारण करके उसका उत्तर दिया॥७७॥ श्रीमद्भागवत (10/81/16)— क्वाहं दरिद्रः पापीयान् क्व कृष्णः श्रीनिकेतनः। ब्रह्मबन्धुरिति स्माहं बाहुभ्यां परिरम्भितः॥७८॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—(सुदामाने कहा)—कहाँ मैं अति पापी दरिद्र, कहाँ श्रीनिकेतन (लक्ष्मीके निवासस्थान) श्रीकृष्ण! उन्होंने मुझे अयोग्य ब्राह्मण-पुत्र जानकर मेरा आलिङ्गन किया, यह अति आश्चर्यका विषय है॥७८॥ अनुभाष्य—घर जानेको तत्पर 'श्रीसुदामा' अथवा 'श्रीदाम' विप्रकी मन-ही-मनमें उक्ति— दरिद्रः (समृद्धिरहितः) पापीयान् (पापसहितः) अहं क्व? श्रीनिकेतनः (ऐश्वर्यमूलविग्रहः निखिल-पुण्याश्रयः) कृष्णः क्व? अहं ब्रह्मबन्धुः (शौक्रविप्राधमः) [तया कृष्णेन] बाहुभ्यां परिरम्भितः (आलिङ्गितः)। (अयोग्ये मयि ब्रह्मबन्धौ कृष्णालिङ्गनं कदापि न सम्भवतीति कृष्णस्य महत्त्वमेव दर्शितं वक्तु श्लोक भावानुवाद—"कहाँ मैं दरिद्र और पापी? और कहाँ ऐश्वर्यके मूल विग्रह तथा समस्त पुण्योंके आश्रय श्रीकृष्ण? परन्तु श्रीकृष्णने मुझे ब्रह्मबन्धु (अर्थात् जन्मके कारण ब्राह्मण, परन्तु गुणोंमें अधम) जानकर अपनी भुजाओंसे मेरा आलिङ्गन किया। (मेरा अयोग्य ब्रह्मबन्धु होना श्रीकृष्णके आलिङ्गनका कारण नहीं है, अपितु यह श्रीकृष्णकी ही महिमा है, ऐसा वचन सुदामाकी दैन्यताका सूचक है।)।" महाप्रभुके द्वारा कहे गये वाक्यको अनुकूलरूपसे स्वीकार करनेपर यह अर्थ होता है कि श्रीकृष्णको वशीभूत करनेकी शक्ति मुरारिगुप्तमें नहीं है, श्रीकृष्ण अपने भक्तवात्सल्य-गुणसे ही अयोग्य दासके किसी एक तुच्छ गुणको लक्ष्य करके उसे अकल्पनीय सौभाग्यका अधिकारी बनाते हैं। ऐसी भावनासे ही मुरारिगुप्तने इस श्लोकका उच्चारण किया गया है। महाप्रभुके द्वारा कहे गये वाक्यको अपने हितके प्रतिकूल समझकर स्वयंको अयोग्य दिखलानेके उद्देश्यसे यह श्लोक उच्चारण करनेके पश्चात् मुरारि गुप्तने कहा,—'मैं श्रीकृष्णको वशमें करनेमें सम्पूर्ण अयोग्य हूँ, मैं उन्हें वशीभूत नहीं कर पाया।' सुदामा-विप्रने अपनी दरिद्रता, पापमें प्रवृत्ति, अ-ब्राह्मणतादि अपनी अयोग्यताका उल्लेख करके श्रीकृष्ण-आलिङ्गन रूप अपने सौभाग्यको सूचित किया था, किन्तु मुरारि गुप्तकी भावना इस प्रकार है,—'मैं इस प्रकारकी भावनाके भी अयोग्य हूँ।' दशम-टिप्पणी 'वैष्णव-तोषणी' में इस श्लोकका अर्थ इस प्रकार कहा गया है,— “क्वेति। पापीयान् दुर्भगः; कृष्ण साक्षात् भगवान्; एवं कृष्णत्व-पापीयस्त्वयोस्तथा दारिद्र्य-श्रीनिकेतत्वयोर्विरोधः, तथापि सतरहवाँ अध्याय | 233