श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 768, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 17/70-76 अनुभाष्य-‘श्रीधरके लौह-पात्रमें महाप्रभुके द्वारा अनुवाद—एक दिन महाप्रभुने भक्तोंको नामकी जलपान'—चैःभाः मध्यखण्ड, तेइसवाँ अध्याय द्रष्टव्य महिमा सुनायी। इसे सुनकर एक छात्रने उसमें अर्थवादका है॥ 70 ॥ आरोप किया। नाममें स्तुतिवाद सुनकर महाप्रभुको दुःख हुआ और उन्होंने सभी भक्तोंसे कहा,—“आजसे इसका ठाकुर श्रीहरिदासपर कृपा, शचीमाताके मुख भी मत देखना।” महाप्रभुने तब अपने परिकरोंके अपराध-मोचनका अभिनय :— साथ वस्त्रोंके सहित स्नान किया और वहाँ उन्होंने हरिदास ठाकुरेर करिल प्रसाद। भक्तिकी महिमाकी व्याख्या की—‘ज्ञान, कर्म, योग, आचार्य-स्थाने मातार खण्डाइल अपराध ॥ 71 ॥ धर्मादि साधनोंके द्वारा श्रीकृष्णको वशीभूत नहीं किया अनुवाद—महाप्रभुने हरिदास ठाकुरपर कृपा की जा सकता। श्रीकृष्णको वशमें करनेका एकमात्र उपाय और शचीमाताके द्वारा श्रीअद्वैताचार्यके प्रति हुए अपराधको श्रीकृष्णप्रेम-रस ही है॥'72-75॥ खण्डित करवाया॥ 71 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—एकदिन महाप्रभुने भक्तोंको नामकी अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रकाशके दिन महाप्रभुने अपार महिमाका वर्णन किया, उसे सुनकर किसी दुर्भागे हरिदास ठाकुरको आलिङ्गन करके उनको प्रह्लादका छात्रने कहा, - 'यह सब नामकी महिमा वास्तविक नहीं अवतार बतलाकर उन्हें वरदान दिया। है, शास्त्रमें नामका स्तुतिवाद मात्र किया गया है।' इस विश्वरूपके संन्यास लेनेपर शचीमाताने इसका दोष प्रकार नाम-महिमाका अन्य अर्थ करनेसे नाममें श्रीअद्वैताचार्यपर लगाया। इस प्रकार मातासे जो यह 'अर्थवादरूप' नामापराध होता है। नामापराधके समान वैष्णवापराध हुआ, उसे उनके द्वारा श्रीअद्वैताचार्यकी और किसी प्रकारका अपराध उतना भयङ्कर नहीं है। पदधूलि लेकर खण्डन करवाया॥ 71 ॥ उस अपराधी छात्रका मुख भी देखनेका निषेध करके अनुभाष्य—'हरिदास ठाकुरपर कृपा'—चैःभाः मध्यखण्ड, महाप्रभुने अपने परिकरोंके साथ वस्त्र-सहित गङ्गास्नान दसवाँ और 'शचीमातापर महाप्रभुकी कृपा'—चैःभाः मध्यखण्ड, किया। इसका तात्पर्य यह है कि नामापराधीका मुख बाइसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥ 71 ॥ देखनेपर वस्त्रोंके साथ ही स्नान करना उचित है—यही इसकी शिक्षा है॥ 72-73 ॥ एक पाषण्डी छात्रका श्रीनाममें अर्थवाद :— भक्तगणे प्रभु नाम-महिमा कहिल। अनुभाष्य—साक्षात् श्रीकृष्णसे अभिन्न श्रीनामप्रभुकी शुनिया पड़ुया ताहाँ अर्थवाद कैल ॥ 72 ॥ महिमाको 'अतिस्तुति' (महिमाको बढ़ा-चढ़ाकर कहा नामे स्तुतिवाद शुनि' प्रभुर हैल दुःख। गया है), 'अप्रकृत' (वास्तवमें नहीं है), इसलिये उसे सबारे निषेधिल,—“इहार ना देखिह मुख॥”73 ॥ 'असत्य' मानकर (नाम और नामीमें) भेद-बुद्धिका नाम सगण वस्त्र-सहित गङ्गास्नान और एकमात्र ही 'अर्थवाद' अथवा (मिथ्या) स्तुतिवाद अथवा निन्दावाद अभिधेय भक्तिकी महिमा-गान :— है। यह केवल पाषण्डता अथवा नास्तिकता अर्थात् सगणे सचेले गिया कैल गङ्गास्नान। केवल ईश्वरका विरोध मात्र ही है॥ 72 ॥ भक्तिर महिमा ताहाँ करिल व्याख्यान ॥ 74 ॥ श्रीमद्भागवत (11/14/20)— ज्ञान-कर्म-योग-धर्मे नहे कृष्ण वश। ना साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव। कृष्णवश-हेतु एक—कृष्णप्रेम-रस ॥ 75 ॥ न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता ॥ 76 ॥ 232 | श्रीचैतन्यचरितामृत