भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 767, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 767

17/66-70 ]

बहुत आनन्द हुआ। तब महाप्रभुने लज्जित होकर उनपर कृपा की॥67॥ अमृतप्रवाह भाष्य- श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुके गुरु श्रीईश्वरपुरीके गुरुभ्राता थे, इस सम्बन्धसे महाप्रभु स्वयंको दास मानकर उनकी गुरुके समान भक्ति करते थे। श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुके द्वारा इस प्रकार गौरव प्रदान किये जानेपर दुःखी होते थे और उनसे दण्डरूपी कृपा पानेके लिये शान्तिपुरमें कुछ दुर्भागे व्यक्तियोंको ज्ञानमार्गकी श्रेष्ठताकी व्याख्या करने लगे। यह सुनकर महाप्रभुने क्रोधमें आविष्ट होकर शान्तिपुर जाकर श्रीअद्वैतप्रभुकी अच्छी प्रकारसे पिटाईयी की। वह पिटाईयी खाकर श्रीअद्वैतप्रभु यह कहकर नाचने लगे,–“देखो, आज मेरी इच्छा पूर्ण हुई। महाप्रभु कृपणतापूर्वक मुझे गुरुके समान मानते थे और आज उन्होंने मुझे अपना दास और शिष्य मानकर मेरी मायावादरूप दुर्मतिसे रक्षा करनेकी चेष्टा की।” श्रीअद्वैताचार्यकी यह भङ्गी देखकर महाप्रभु लज्जित हुए और उनके प्रति प्रसन्न हुए॥66-68॥

मुरारि गुप्तकी ऐकान्तिकी श्रीरामनिष्ठा :- मुरारिगुप्त-मुखे शुनि' राम-गुणग्राम। ललाटे लिखिल ताँर 'रामदास' नाम॥69॥

अनुवाद- महाप्रभुने मुरारिगुप्तके मुखसे श्रीरामचन्द्रके गुणोंका बखान सुनकर उनके माथेपर उनका 'रामदास' नाम लिख दिया॥69॥ अमृतप्रवाह भाष्य- एक दिन महाप्रभुने राममन्त्रोपासक मुरारिगुप्तको श्रीरामके स्तवका पाठ करनेको कहा। तब मुरारिगुप्तने महाप्रेममें आविष्ट होकर श्रीरामाष्टकका पाठ किया,– “इत्थं निशम्य रघुनन्दनराजसिंहश्लोकाष्टकं स भगवान् चरणं मुरारेः। वैद्यस्य मूर्ध्नि विनिधाय लिलेख भाले त्वं 'रामदास' इति भो भव मत्प्रसादात्॥” “'रघुनन्दनराजसिंहश्लोकाष्टकं' को सुनकर महाप्रभुने अपने चरण मुरारिगुप्तके मस्तकपर रख दिये और उनके माथेपर 'रामदास' लिखकर कहा कि तुम मेरी कृपासे सदाके लिये रामदास हुए हो॥” 69॥

अनुभाष्य- चैतन्यमङ्गल मध्यखण्ड- 'रामं जगत्त्रयगुरूं सततं भजामि।' “एइमते रघुवीराष्टक श्लोक शुनि'। मुरारि-मस्तके पद दिला त' आपनि॥ 'रामदास' बलि' नाम लिखिला कपाले। मोर परसादे तुमि 'रामदास' हइले॥ इहा बलि' राम-रूप देखाइल तारे। स्तव करे मुरारि पड़िया पदतले॥” “'तीनों जगत्के गुरु श्रीरामचन्द्रका मैं निरन्तर भजन करता हूँ, इस प्रकार रघुवीराष्टकका श्लोक सुनकर महाप्रभुने अपने चरणोंको मुरारि गुप्तके मस्तकपर रखा और उनके माथेपर 'रामदास' लिख दिया। तब महाप्रभुने कहा कि मेरी कृपासे तुम 'रामदास' हुए हो। यह कहकर महाप्रभुने उन्हें अपना रामरूप दिखलाया। उसे देखकर मुरारिगुप्त उनकी स्तुति करते हुए उनके चरणोंमें गिर पड़े।” मुरारिगुप्तके प्रति महाप्रभुकी कृपा-चैःभाः मध्यखण्ड, दसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥69॥

श्रीधरके घरमें लोहेके पात्रमें जलपान और वरप्रदान :- श्रीधरेर लौहपात्रे कैल जलपान। समस्त भक्तरे दिल इष्ट वरदान॥70॥

अनुवाद- महाप्रभुने श्रीधरके घरमें उसके टूटे हुए लोहेके पात्रमें जलका पान किया। महाप्रभुने सभी भक्तोंको उनके इष्ट वरको प्रदान किया॥70॥ अमृतप्रवाह भाष्य- प्रथम नगरकीर्त्तन-रात्रिमें काजीका उद्धार करनेके बाद चाँदकाजी कीर्त्तनके साथ-साथ श्रीधरके आङ्गनतक आया था। वहाँपर कीर्त्तनका विश्राम होनेपर महाप्रभुने कृपापूर्वक श्रीधरके टूटे हुए लोहेके पात्रमें जो जल था, उसे 'भक्तके द्वारा दिया गया जल' कहकर उसका पान किया। काजी उस स्थानसे वापिस लौट गया। मायापुरके उत्तर-पूर्वांशमें उस स्थानको अभी भी 'कीर्त्तन-विश्रामस्थान' कहते हैं॥70॥

सतरहवाँ अध्याय | 231