भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 766

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“शापिब तोमारे मुञि, पाञाछि मनोदुःख।” पैता छिण्डिया शापे प्रचण्ड दुर्मुख ॥ 62 ॥ “संसार-सुख तोमार हउक विनाश।” शाप शुनि' महाप्रभुर हइल उल्लास ॥ 63 ॥ अनुवाद-कीर्तनको देखनेके लिये एक और ब्राह्मण आया था, परन्तु द्वार बन्द होनेके कारण वह भीतर नहीं जा सका। वह मन-ही-मन दुःखी होकर अपने घर लौट गया। वह ब्राह्मण कटु भाषी और दूसरोंको शीघ्र ही शाप देनेवाला था। बादमें एक दिन उसने महाप्रभुको गङ्गा तटपर देखकर कहा,-“मैं तुम्हें शाप दूँगा, क्योंकि तुमने मेरे मनको कष्ट दिया है।” उसने अपने जनेऊको तोड़कर महाप्रभुको शाप दिया,-“तुम्हारा संसार सुख नष्ट हो जाय।” इसे सुनकर महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए॥ 60-63॥ प्रभुर शाप-वार्त्ता सुने हञा श्रद्धावान्। ब्रह्मशाप हैते तार हय परित्राण ॥ 64 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके प्रति ब्राह्मणके शापकी कथा जो श्रद्धापूर्वक सुनेगा, ब्रह्मशापसे भी उसकी मुक्ति हो जायेगी ॥ 64॥ अनुभाष्य-मायाधीश महाप्रभुको शापादिके अधीन अथवा यमदण्ड तथा कर्मफलके अधीन जीव समझकर पाषण्डी होनेकी अपेक्षा उन्हें नित्य सेव्य परमेश्वर जाननेपर जीवोंकी अनादि-कृष्णबहिर्मुखता दूर होती है। यह घटना चैतन्यभागवतमें नहीं है॥ 64॥ मुकुन्दको दण्ड देकर उसपर कृपा :- मुकुन्द-दत्तेरे कैल दण्ड-परसाद। खण्डिल ताहार चित्ते सब अवसाद ॥ 65 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने मुकुन्द-दत्तपर दण्डरूप कृपा की और उनके चित्तके सभी दुःखोंको दूर किया॥ 65॥ अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुके महाप्रकाशके दिन मुकुन्ददत्त द्वारके बाहर खड़े थे। महाप्रभुने एक-एक करके अन्य सभी भक्तोंपर कृपा की। उन भक्तोंने महाप्रभुको बतलाया कि मुकुन्ददत्त बाहर खड़े हैं। तब महाप्रभुने कहा,-'मैं मुकुन्ददत्तपर शीघ्र ही प्रसन्न नहीं होऊँगा, क्योंकि वह भक्तोंको तो शुद्धभक्तिकी कथा कहता है और मायावादियोंके पास जाकर योगवाशिष्ठमें लिखे मायावादको स्वीकार करता है। उसके इस आचरणसे मुझे सदा दुःख होता है।' मुकुन्ददत्तने बाहर यह बात सुनकर कहा,-'मैं धन्य हूँ, क्योंकि जगत्-तारण महाप्रभु यदि शीघ्र कृपा नहीं करेंगे, तो कभी-न-कभी तो वे मुझपर अवश्य ही कृपा करेंगे।' तब महाप्रभुने मुकुन्ददत्तका दृढ़तापूर्वक मायावादियोंके सङ्गके परित्यागका निश्चय जानकर उसी क्षण उनको अपने पास बुलाकर अपनी प्रसन्नता प्रकाश की। इस कार्यसे महाप्रभुने मुकुन्ददत्तको मायावादियोंके सङ्गरूप अपराधका दण्ड प्रदानकर उन्हें शुद्धभक्तसङ्गके फलस्वरूप कृपा दी॥ 65॥ अनुभाष्य-'मुकुन्दके ऊपर दण्ड-रूपी कृपा'-चैःभाः मध्यखण्ड, दसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥ 65॥ श्रीअद्वैतको दण्डरूपी कृपा :- आचार्य-गोसाञिरे प्रभु करे गुरुभक्ति। ताहाते आचार्य बड़ हय दुःखमति ॥ 66 ॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीअद्वैताचार्यका गुरुकी भाँति सम्मान करते थे, जिससे श्रीअद्वैताचार्यके मनमें बहुत दुःख होता था॥ 66॥ भङ्गी करि' ज्ञानमार्ग करिल व्याख्यान। क्रोधावेशे प्रभु तारे कैल अवज्ञान ॥ 67 ॥ तबे आचार्य-गोसाञिर आनन्द हइल। लज्जित हइया प्रभु प्रसाद करिल ॥ 68 ॥ अनुवाद-जान-बूझकर श्रीअद्वैताचार्य ज्ञानमार्गकी श्रेष्ठताकी व्याख्या करने लगे। यह सुनकर महाप्रभुने क्रोधके आवेशमें उनको दण्ड दिया, जिससे श्रीअद्वैताचार्यको

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