भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 765

17/54-61 ] वैष्णवापराधीका निरन्तर कष्ट भोग करनेके कारण सहज मृत्यु नहीं :- एत बलि' गेला प्रभु करिते गङ्गास्नान। सेइ पापी दुःख भोगे, ना याय पराण ॥ 54 ॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु गङ्गास्नानके लिये चले गये। वह पापी बहुत दुःख भोगता रहा, परन्तु उसके प्राण नहीं निकलते थे॥54॥ अनुभाष्य—'भोगे'—भोग रहा था॥54॥ महाप्रभुके पुनः आनेपर उसकी शरणागति :- संन्यास करिया यबे प्रभु नीलाचले गेला। तथा हैते यबे कुलिया ग्रामे आइला ॥ 55 ॥ तबे सेइ पापी प्रभुर लइल शरण। हित-उपदेश कैल हइया करुण ॥ 56 ॥ श्रीवास पण्डितसे अपराध-क्षमा प्रार्थनाके लिये महाप्रभुका उपदेश :- “श्रीवास पण्डितेर स्थाने आछे अपराध। तथा याह, तेंहो यदि करेन प्रसाद ॥ 57 ॥ शरणागतिके बाद पुनः पापाचरणका निषेध :- तबे तोमार हबे एइ पाप-विमोचन। यदि पुनः ऐछे नाहि कर आचरण॥" 58 ॥ अनुवाद—संन्यास लेनेके बाद महाप्रभु नीलाचल चले गये और वहाँसे जब वे कुलिया लौटकर आये, तब उस पापीने उनकी शरण ग्रहण की। महाप्रभुने करुणा करके उसके हितके लिये उपदेश दिया,—“श्रीवास पण्डितके चरणोंमें तुम्हारा अपराध हुआ है, इसलिये उनके पास जाकर क्षमा याचना करो। यदि वे तुमपर कृपा करेंगे और पुनः ऐसे पापका आचरण नहीं करोगे, तो तुम्हारी इस पापसे मुक्ति हो जायेगी॥”55-58॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘कुलियाग्राम’—गङ्गाके पूर्व तटपर उस समय नवद्वीप था और गङ्गाके दूसरी ओर कुलियाग्राम था, जिसे अब नवद्वीप कहते हैं॥55॥ अनुभाष्य—‘कुलिया’-ग्राम अर्थात् जिसे अब नवद्वीप शहर कहते हैं। ‘सबे गङ्गा मध्ये नदीयाय-कुलियाय’— चैःभाः अन्त्यखण्ड, 3/380; कुलिया गङ्गाके पश्चिम तटपर और नवद्वीप पूर्व तटपर था। ‘भक्तिरत्नाकर’—बारहवीं तरङ्ग, ‘चैतन्य-चरित महाकाव्य’, ‘चैतन्य-चन्द्रोदय’ नाटक और ‘चैतन्यभागवत’ में गङ्गाके पश्चिम तटपर स्थित कुलियाका उल्लेख द्रष्टव्य है। कोलद्वीपके अन्तर्गत कुलिया-ग्राममें आजतक ‘कुलियार गञ्ज’ नामक एक पल्ली (मोहल्ला) है; ‘कुलियार दह’ नामक जो जलस्रोत है, वह इस समय नवद्वीप शहरमें है। महाप्रभुके समय गङ्गाके पश्चिम तटपर जो ‘कुलिया’ और ‘पहाड़पुर’ नामक ग्राम थे, वे ‘बाहिर द्वीप’ के अन्तर्गत थे। नवद्वीप उस समय गङ्गाके पूर्व तटपर था, जिसे अब ‘अन्तर्द्वीप’ कहते हैं। वह श्रीमायापुरमें ‘द्वीपेर मठ’ के नामसे अभी भी प्रसिद्ध है। काँचड़ा-पाड़ाके निकट जो ‘कुलिया’ नामक गाँव है, वह उपरोक्त कुलिया ग्राम अथवा ‘अपराध-भञ्जन पाट’ नहीं है। धामविद्वेषके कारण कल्पना और भ्रमवश कुछेक वर्षोंसे वैसी मिथ्या धारणाकी उत्पत्ति हुई है॥55॥ गोपाल-चापालकी श्रीवास-चरणोंकी शरण ग्रहण और अपराध-मोचन :- तबे विप्र लइल श्रीवासेर शरण। ताँहार कृपाय हैल पाप-विमोचन ॥ 59 ॥ अनुवाद—तब उस ब्राह्मणने श्रीवास पण्डितकी शरण ग्रहण की और उनकी कृपासे उसकी पापसे मुक्ति हुई॥59॥ और एक दुर्बुद्धि ब्राह्मणके द्वारा महाप्रभुको शाप-प्रदान-कार्य :- आर एक विप्र आइल कीर्त्तन देखिते। द्वारे कपाट,—ना पाइल भितरे याइते ॥ 60 ॥ फिरि' गेल विप्र घरे मने दुःख पाञा। आर दिन प्रभुके कहे गङ्गाय देखिया ॥ 61 ॥ सतरहवाँ अध्याय | 229