भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 764

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आङ्गनमें द्वार बन्द करके कीर्तन-आनन्दका आस्वादन करते थे, उस समय नगरके अनेक बहिर्मुख ब्राह्मण वैष्णवोंका परिहास करनेके लिये अनेक प्रकारसे चेष्टा करने लगे। 'गोपाल-चापाल' नामका कोई एक वाचाल भट्टाचार्य देवी-पूजाकी सामग्री, केलेका पत्ता, जवाफूल और लाल-चन्दनादि मदिराके बर्तनके साथ उस बन्द द्वारके बाहर रखकर चला गया। प्रातःकालमें श्रीवासपण्डितने उसे देखकर परिहास करते हुए सभीसे कहा, — 'देखो देखो, मैं प्रत्येक रात्रिमें भवानीकी पूजा करता हूँ, इसके द्वारा मेरे 'शाक्त' होनेके परिचयकी जो महिमा है, उसे आप लोग जान लें।' सभी सज्जन लोग उसे देखकर बहुत दुःखी हुए और उन्होंने जमादारको बुलाकर मंदिरादि गन्दी वस्तुओंको दूर फिंकवा दिया। तब जल और गोबरके द्वारा उस स्थानको लीपकर शुद्ध किया। इस वैष्णवापराधके कारण गोपाल-चापालको रक्तस्राव होनेवाला कुष्टरोग हो गया ॥ 35-45 ॥

सर्वाङ्ग बेड़िल कीटे, काटे निरन्तर। असह्य वेदना, दुःखे ज्वलये अन्तर ॥ 46 ॥

अनुवाद—उसके सभी अङ्गोंमें कीड़े पड़ गये, जो उसे निरन्तर काटने लगे और उसको असहनीय पीड़ा होने लगी। उस दुःखकी ज्वालासे उसका अन्तःकरण जलने लगा ॥ 46 ॥

गङ्गातटपर वास और महाप्रभुसे उद्धार-कामना :— गङ्गाघाटे वृक्षतले रहे त' बसिया। एक दिन बले किछु प्रभुके देखिया ॥ 47 ॥ “ग्राम-सम्बन्धे आमि तोमार मातुल। भागिना, मुइ कुष्ठव्याधिते हञाछि व्याकुल ॥ 48 ॥ लोक सब उद्धारिते तोमार अवतार। मुञि बड़ दुःखी, मोरे करह उद्धार ॥” 49 ॥

अनुवाद—[कुष्टरोग संक्रामक रोग होनेके कारण वह ग्रामसे निकाल दिया गया था, इसलिये] वह गङ्गाके तटपर एक वृक्षके नीचे रहने लगा। एक दिन उसने महाप्रभुको देखकर उनसे कहा, — “ग्रामके सम्बन्धसे मैं तुम्हारा मामा लगता हूँ। हे भाञ्जे ! मुझे यह कुष्ट रोग हो गया है, जिसके कारण मैं बहुत कष्टमें हूँ। लोगोंका उद्धार करनेके लिये तुम्हारा यह अवतार हुआ है। मैं बहुत दुःखी हूँ, मेरा भी उद्धार करो ॥" 47-49 ॥

उसके वैष्णवापराधी होनेके कारण महाप्रभुके क्रोधपूर्ण वचन और उद्धारके लिये असम्मति :— एत शुनि' महाप्रभुर हइल क्रु क्रोधावेशे बले तारे तर्ज्जन-वचन ॥ 50 ॥ “आरे पापि, भक्तद्वेषि, तोरे ना उद्धारिमु। कोटिजन्म एड् मते कीड़ाय खाओयाइमु ॥ 51 ॥ श्रीवासे कराइलि तुइ भवानी-पूजन। कोटि जन्म हबे तोर रौरवे पतन ॥ 52 ॥ पाषण्डी संहारिते मोर एइ अवतार। पाषण्डी संहारि' भक्ति करिमु सञ्चार ॥” 53 ॥

अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुको क्रोध आ गया और क्रोधके आवेशमें उसे डाँटते हुए कहा, — “अरे पापी, भक्तद्वेषी ! मैं तुम्हारा उद्धार नहीं करूँगा। करोड़ों जन्म इसी प्रकार कीड़ोंके द्वारा तुम्हारे शरीरको कटवाऊँगा। तुमने श्रीवासपर भवानी पूजाका दोष लगाया है, करोड़ों जन्म तुम्हें रौरव नरक भोगना पड़ेगा। पाषण्डियोंके संहारके लिये ही मेरा यह अवतार हुआ है। पाषण्डियोंका संहार करके मैं जगत्में भक्तिका सञ्चार करूँगा ॥” 50-53 ॥

अनुभाष्य—अवैष्णव लोग ही भवानीकी पूजा करते हैं, यह वैष्णवोंका कार्य नहीं है। उसकी निन्दा करके महाप्रभुने बतलाया है कि अपने हृदयमें बहु-ईश्वरवादका पोषण करनेवाले अर्थात् अनेक देव-देवीकी उपासनाके पक्षपाती प्राकृत बिद्ध-वैष्णवोंका (जो शुद्ध वैष्णव नहीं हैं, उनका) सङ्ग वास्तवमें 'दुःसङ्ग' ही है॥ 52 ॥

228 | श्रीचैतन्यचरितामृत