भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 771

छह प्रकारके ब्रह्मबन्धु अर्थात् नीच ब्राह्मण कहे गये हैं।” ब्रह्मबन्धु अथवा केवल ब्राह्मणकुलमें जन्म अपनी योग्यताका परिचय नहीं हैं, परन्तु उससे वस्तुभेदका सापेक्षत्व ही प्रमाणित होता है॥ 77-78 ॥ महाप्रभुके द्वारा आमका वृक्ष लगाना और फल-दान कहानी :- एकदिन प्रभु सब भक्तगण लञा। सङ्कीर्त्तन करि' कैसे श्रमयुक्त हञा॥ 79 ॥ एक आम्रबीज प्रभु अङ्गने रोपिल। ततक्षणे जन्मिया वृक्ष बाड़िते लागिल॥ 80 ॥ देखते देखिते वृक्ष लागिल फलिते। पाकिल अनेक फल, सबेइ विस्मिते॥ 81 ॥ शत दुइ फल प्रभु शीघ्र पाड़ाइल। प्रक्षालन करि' कृष्णे भोग लगाइल॥ 82 ॥ रक्त-पीतवर्ण, —नाहि अष्ठि-वल्कल। एकजनेर पेट भरे —खाइले एक फल॥ 83 ॥ अनुवाद-एक दिन महाप्रभु सब भक्तोंको लेकर सङ्कीर्तन करते हुए कुछ थककर बैठ गये। तब महाप्रभुने एक आमके बीजको अङ्गनमें रोपित किया। उसी क्षण ही उससे एक वृक्ष निकला और वह बढ़ने लगा। देखते-ही-देखते उस वृक्षमें फल लगने लगे और अनेक फल पक गये। यह देखकर सभी विस्मित हो गये। तब महाप्रभुने शीघ्र ही दो सौ फल तुड़वाये और उन्हें धोकर श्रीकृष्णको भोग लगाया। वे फल लाल-पीले रंगके थे और उनमें गुठली और छिलका भी नहीं था। एक फल खानेसे ही एक व्यक्तिका पेट भर जाता था ॥ 79-83 ॥ देखिया सन्तुष्ट हैला शचीर नन्दन। सबाके खाओयाल आगे करिया भक्षण॥ 84 ॥ अष्ठि-वल्कल नाहि, —अमृत-रसमय। एक फल खाइले रसे उदर पूरय॥ 85 ॥ एइमत प्रतिदिन फले बारमास। वैष्णव खायेन फल, —प्रभुर उल्लास॥ 86 ॥ एइसब लीला करे शचीर नन्दन। अन्य लोक नाहि जाने बिना भक्तगण॥ 87 ॥ एइ मत बारमास कीर्त्तन-अवसाने। आम्रमहोत्सव प्रभु करे दिने दिने॥ 88 ॥ अनुवाद-उन फलोंको देखकर महाप्रभु सन्तुष्ट हुए और पहले स्वयं फलको खाकर बाकी फलोंको सबको खिलाया। छिलके-गुठलीसे रहित वह फल अमृतके समान रसमय था और उस एक फलके रससे ही पेट भर जाता था। इसी प्रकार बारह मास प्रतिदिन वैष्णवोंने फल खाये, जिसे देखकर महाप्रभुके हृदयमें उल्लास हुआ। महाप्रभुने जो ये सब लीलाएँ की, इन्हें भक्तोंके अतिरिक्त अन्य कोई नहीं जान सकता है। इस प्रकार बारह मास तक प्रतिदिन कीर्तनके विश्राम होनेपर महाप्रभु आम-महोत्सव करते रहे ॥ 84-88 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-किसी दिन महाप्रभु भक्तोंके साथ नगर-कीर्तन करते हुए थककर जिस स्थानपर पहुँचे, वहाँपर उस भक्तके आङ्गनमें उन्होंने एक आमके बीजको रोपण किया और उसी क्षण उससे वृक्ष निकला तथा उसपर फल लग गये। तब महाप्रभुने उन आमोंसे आम-महोत्सव किया। वह स्थान आज भी 'आम्रघट्ट' (आम-घाटा) के नामसे प्रसिद्ध है॥ 79-86 ॥ अनुभाष्य-यह घटना चैतन्यभागवतमें नहीं है॥ 79-86॥ कीर्तनके समय महाप्रभुका मेघोंको न बरसनेका आदेश :- कीर्त्तन करिते प्रभु, आइला मेघगण। आपन-इच्छाय कैल मेघ निवारण॥ 89 ॥ सत्रहवाँ अध्याय | 235