भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 772, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 772

[ 17/89–94 अनुवाद—एक दिन जिस समय सङ्कीर्तन चल रहा था, उस समय आकाशमें घनघोर मेघ घिर आये। महाप्रभुकी इच्छासे वे मेघ शीघ्र ही छिन्न-भिन्न हो गये ॥ 89 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—एकदिन महाप्रभु (अपने वासस्थानसे) दूर स्थानपर सङ्कीर्तन कर रहे थे, उसी समय आकाशमें घनघोर मेघ छा गये। महाप्रभुने उनको वहाँसे चले जानेकी इच्छा की और मेघोंको जानेकी आज्ञा दी। वे मेघ तत्क्षणात् वहाँसे चले गये। इस कारणसे गङ्गातटकी उस भूमिको 'मेघेर चर' कहते हैं। आजकल गङ्गाका प्रवाह परिवर्तन होनेसे 'बेलपुखुरिया' ग्राम उस 'मेघेर चर' में स्थानान्तरित हो गया है। बेलपुखुरिया पहले जिस स्थानपर था, उसका वर्तमान नाम 'तारणवास' अथवा 'टोटा' हो गया है ॥ 89 ॥ अनुभाष्य—चैतन्यमङ्गल मध्यखण्ड— “दिन अवसान, सन्ध्या धन्य दिगन्तर। आचम्बिते मेघारम्भ गगनमण्डल॥ घन घन गरजय गम्भीर निनादे। देखिया वैष्णवगण गणिल प्रमादे॥ तबे महाप्रभु से मन्दिरा करि' करे। नामगुण-सङ्कीर्त्तन करे उच्चैःस्वरे॥ देवलोक कृतार्थ करिब हेन मने। ऊर्ध्वमुखे चाहे प्रभु आकाशेर पाने॥ दूर गेल मेघगण प्रकाश आकाश। हरिषे वैष्णवगणे बाड़िल उल्लास॥ निरमल भेल शशी-रञ्जित रजनी। अनुगत गुण गाये नाचये आपनि॥” “दिनके ढल जानेपर सन्ध्याका धन्य समय था, तभी गगनमें मेघ एकत्रित होने लगे और गम्भीर गर्जना करने लगे। उसे देखकर वैष्णव भयभीत हो गये। तब महाप्रभु अपने हाथोंमें करताल लेकर उच्च-स्वरसे श्रीकृष्णनाम-गुणका सङ्कीर्तन करने लगे। देवता कीर्तन सुनकर उन्हें कृतार्थ करेंगे, ऐसा मनमें विचार करके वे ऊपर आकाशकी ओर देखने लगे। तभी सभी मेघ वहाँसे दूर चले गये और निर्मल आकाशमें चन्द्रमा उदित हो गया। वैष्णवोंके मनमें हर्ष और उल्लास हुआ तथा महाप्रभु आनन्दसे नाचने लगे ॥ 89 ॥ श्रीवासका विष्णु-सहस्रनाम पाठ :- एकदिन प्रभु श्रीवासे आज्ञा दिल। 'बृहत् सहस्रनाम' पड़, शुनिते मन हैल ॥ 90 ॥ अनुवाद—एक दिन महाप्रभुने श्रीवासको आज्ञा दी कि 'बृहत् सहस्रनाम' सुननेका मेरा मन कर रहा है, इसलिये उसका पाठ करो ॥ 90 ॥ महाप्रभुकी नृसिंहावेश-लीला :- पड़िते आइला स्तवे नृसिंहेर नाम। शुनिया आविष्ट हैला प्रभु गुणधाम ॥ 91 ॥ पाषण्डियोंके एकमात्र दण्डविधाता श्रीनृसिंहके आवेशमें महाप्रभुका पाषण्डियोंको भय-प्रदान :- नृसिंह-आवेशे प्रभु हाते गदा लञा। पाषण्डी मारिते याय नगरे धाइया ॥ 92 ॥ नृसिंह-आवेश देखि' महातेजोमय। पथ छाड़ि' भागे लोक पाञा बड़ भय ॥ 93 ॥ महाप्रभुका क्रोध-सम्वरण और करुणा :- लोक-भय देखि' प्रभुर बाह्य हइल। श्रीवास-गृहेते गिया गदा फेलाइल ॥ 94 ॥ अनुवाद—(सहस्रनाम) पढ़ते-पढ़ते स्तवमें नृसिंह भगवान्का नाम आया, तो उसे सुनकर महाप्रभु नृसिंहके आवेशमें आ गये। उस आवेशमें उन्होंने अपने हाथमें गदा ले ली और पाषण्डियोंको मारनेके लिये नगरमें भागे। उनके महातेजोमय नृसिंह-आवेशको देखकर लोग डरकर मार्ग छोड़कर इधर-उधर भागने लगे। लोगोंको भयभीत देखकर महाप्रभुको बाह्य-ज्ञान हुआ और उन्होंने श्रीवासके घर जाकर गदा फेंक दी ॥ 91-94 ॥ अनुभाष्य-'भागे' - पलायन करना। यह घटना चैतन्यभागवतमें नहीं है ॥ 93 ॥ 236 | श्रीचैतन्यचरितामृत