भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 773, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 773

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श्रीवासे कहेन प्रभु करिया विषाद। “लोक भय पाय, — मोर हय अपराध ॥” 95 ॥ अनुवाद—महाप्रभु बहुत दुःखी होकर श्रीवाससे कहने लगे,—“मुझे देखकर लोग भयभीत हो गये, मुझसे यह अपराध हो गया॥”95॥ अनुभाष्य—चैतन्यमङ्गल मध्यखण्ड— “पितृकर्म करे सेइ श्रीवासपण्डित। शुनये 'सहस्रनाम' अति शुद्धचित्त॥ हेनकाले सेइ ठाञि गेला गौरहरि। शुनये 'सहस्रनाम' मनोरथ पूरि'॥ शुनिते-शुनिते भेल नृसिंह-आवेश। क्रोधे राङ्गा दुंनयन, ऊर्ध्व भेल केश॥ पुलकित सब अङ्ग अरुण वरण। घनघन हुँकार सिंहेर गर्जन॥ आचम्बिते गदा लञा धाइल सत्वर। देखिया सकल लोक काँपिल अन्तर॥ सब सम्वरिया प्रभु बसिला आसने। ना जानि, कि अपराध भैगेला आमार॥” “वे श्रीवास पण्डित पितृ-कर्म करते हुए शुद्ध चित्तसे 'सहस्रनाम' सुन रहे थे। उस समय गौरहरि वहाँ पहुँचे और 'सहस्रनाम' सुनकर उनकी मनोवाञ्छा पूर्ण हुई। सुनते-सुनते उनमें नृसिंह भगवान्‌का आवेश आ गया। क्रोधसे उनके नेत्र लाल हो गये और केश खड़े हो गये। उनके सभी अङ्ग पुलकित होकर लाल रङ्गके हो गये और वे जोरसे सिंहके समान गर्जन करने लगे। वे हाथमें गदा लेकर भागे और उनके ऐसे उग्र रूपको देखकर सभीके हृदय काँपने लगे। तब उस आवेशको सम्वरण करके महाप्रभु आकर आसनपर बैठ गये और कहने लगे, “मैं नहीं जानता कि मुझसे क्या अपराध हो गया है?”॥ 90-95 ॥ श्रीवासकी उक्ति, श्रीगौरनामसे अपराध क्षय :— श्रीवास बलेन,—“ये तोमार नाम लय। तार कोटि अपराध सब हय क्षय ॥ 96 ॥ श्रीगौरदर्शनसे संसार-ध्वंस :— अपराध नाहि, कैले लोकेर निस्तार। ये तोमा' देखिल, तार छुटिल संसार ॥” 97 ॥ अनुवाद—श्रीवास बोले,—“जो आपका नाम लेता है, उसके कोटि-कोटि अपराध नष्ट हो जाते हैं। आपसे कोई अपराध हो ही नहीं सकता, अपितु आपने लोगोंका उद्धार किया है। जिन्होंने भी आपके दर्शन किये हैं, वे संसार बन्धनसे मुक्त हो गये हैं॥”96-97॥ एत बलि' श्रीवास करिल सेवन। तुष्ट हञा प्रभु आइला आपन-भवन ॥ 98 ॥ अनुवाद—यह कहकर श्रीवास उनकी सेवा करने लगे। तब महाप्रभु सन्तुष्ट होकर अपने घर लौट आये॥ 98 ॥ महाभाग्यवान् शैवके कन्धेपर चढ़े महाप्रभुका शिवावेश :— आर दिन शिवभक्त शिवगुण गाय। प्रभुर अङ्गने नाचे, डम्बुरु बाजाय ॥ 99 ॥ महेश-आवेश हैला शचीर नन्दन। तार स्कन्धे चड़ि' नृत्य कैल बहुक्षण ॥ 100 ॥ अनुवाद—और एक दिन एक शिवभक्त शिवजीके गुण गाता हुआ महाप्रभुके आङ्गनमें आकर डमरु बजा-बजाकर नाचने लगा। उसे देखकर महाप्रभुको शिवजीका आवेश हो गया और उसके कन्धेपर चढ़कर महाप्रभुने बहुत देर तक नृत्य किया॥ 99-100 ॥ अनुभाष्य—चैःभाः मध्यखण्ड, अष्टम अध्याय द्रष्टव्य है॥ 99-100 ॥ नृत्यपरायण भिक्षुकको प्रेमदान :— आर दिन एक भिक्षुक आइला मागिते। प्रभुर नृत्य देखि' नृत्य लागिला करिते ॥ 101 ॥

सतरहवाँ अध्याय | 237