श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 774, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 17/101-111
प्रभु सङ्गे नृत्य करे परम उल्लासे। प्रभु तारे प्रेम दिल, प्रेमरसे भासे ॥ 102 ॥ अनुवाद—और एक दिन एक भिक्षुक भिक्षा माँगते हुए आया और महाप्रभुका नृत्य देखकर वह भी नृत्य करने लगा। वह महाप्रभुके साथ परम-उल्लाससे नृत्य करता रहा। महाप्रभुने उसे प्रेम प्रदान किया और वह प्रेमरसमें डूब गया ॥ 101-102 ॥ महाप्रभुके द्वारा ज्योतिषीसे अपने पूर्वजन्मकी जिज्ञासा :- आर दिने ज्योतिष एक सर्वज्ञ आइल। ताहारे सम्मान करि' प्रभु प्रश्न कैल ॥ 103 ॥ “के आछिलुँ पूर्वजन्मे आमि, कह गणि'।” गणिते लागिला सर्वज्ञ प्रभुवाक्य शुनि' ॥ 104 ॥ अनुवाद—और एक दिन एक सर्वज्ञ ज्योतिषी आया। महाप्रभुने उसका सम्मान करके एक प्रश्न पूछा, “मैं पूर्व जन्ममें कौन था ?” यह सुनकर वह सर्वज्ञ गणना करने लगा ॥ 103-104 ॥ अनुभाष्य—'सर्वज्ञ'—भूत, भविष्य और वर्तमानको जाननेवाला त्रिकालज्ञ। अभी भी पूर्व बङ्गाल (बाङ्गलादेश) में 'छिल', 'छिले' और 'छिलाम' आदि क्रिया विभक्तिके स्थानपर 'आछिल', 'आछिला' और 'आछिलाम' व्यवहार होता आ रहा है ॥ 103-104 ॥ ज्योतिषीकी महाप्रभुमें परमेश्वर-बुद्धि :- गणि' ध्याने देखे सर्वज्ञ,—महाज्योतिर्मय। अनन्त वैकुण्ठ-ब्रह्माण्ड—सबार आश्रय ॥ 105 ॥ परमतत्त्व, परब्रह्म, परम-ईश्वर। देखि' प्रभुर मूर्ति सर्वज्ञ हइल फाँफर ॥ 106 ॥ अनुवाद—गणना करके सर्वज्ञने ध्यानमें महाप्रभुको महाज्योतिर्मय अनन्त वैकुण्ठ-ब्रह्माण्डोंके आश्रय, परमतत्त्व, परब्रह्म, परमेश्वर रूपमें देखा और वह असमञ्जसमें पड़ गया ॥ 105-106 ॥
बलिते ना पारे किछु, मौन हइल। प्रभु पुनः प्रश्न कैल, कहिते लागिल ॥ 107 ॥ “पूर्वजन्मे छिला तुमि परम-आश्रय। परिपूर्ण भगवान्—सर्वैश्वर्यमय ॥ 108 ॥ पूर्वे यैछे छिला तुमि एबेह सेरूप। दुर्विज्ञेय नित्यानन्द—तोमार स्वरूप ॥”109 ॥ अनुवाद—वह कुछ बोल नहीं पाया और मौन धारण करके रहा। जब महाप्रभुने पुनः उससे वही प्रश्न किया, तो वह कहने लगा—“पूर्वजन्ममें आप सबके पराश्रय, सर्वैश्वर्यमय परिपूर्ण भगवान् थे। पूर्व जन्ममें आप जैसे थे, अब भी वैसे ही उसी स्वरूपमें हो। आपका नित्यानन्द स्वरूप दुर्विज्ञेय है॥” 107-109 ॥ महाप्रभुके द्वारा अपने गोपस्वरूपका परिचय प्रदान :- प्रभु हासि' कैला,—“तुमि किछु ना जानिला। पूर्वे आमि छिलाम जातिते गोयाला ॥ 110 ॥ गोपगृहे जन्म छिल, गाभीर राखाल। सेइ पुण्ये हैलाङ आमि ब्राह्मण-छाओयाल ॥” 111 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने हँसकर कहा—“तुम कुछ भी नहीं जानते हो। मैं तो पूर्व जन्ममें ग्वाला था। मेरा जन्म गोपके घरमें हुआ था और मैं गायोंका रखवाला था। गायोंकी सेवाके पुण्यसे ही मैं इस जन्ममें ब्राह्मणका पुत्र हुआ हूँ॥” 110-111 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गायोंकी सेवा करनेसे पुण्य होता है। गायोंकी देखभाल करनेवाला होनेके कारण मैंने पूर्वजन्ममें उनकी सेवा करके जो पुण्य अर्जित किया था, उसके फलसे मैं इस जन्ममें 'ब्राह्मण' हुआ हूँ॥ 111 ॥ अनुभाष्य—सर्वज्ञ ज्योतिषीके साथ महाप्रभुका रहस्यमय वाक्य ॥ 110-111 ॥
238 | श्रीचैतन्यचरितामृत