भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 775

17/112-117 ] ज्योतिषीके द्वारा शरण ग्रहण और प्रेमलाभ :- सर्वज्ञ कहे, — “आमि ताहा ध्याने देखिलाङ। ताहाते ऐश्वर्य देखि' फाँफर हइलाङ ॥ 112 ॥ सेइरूपे एइरूपे देखि एकाकार। कभु भेद देखि, एइ मायाय तोमार ॥ 113 ॥ ज्योतिषीपर कृपा और प्रेमदान :- ये हओ, से हओ तुमि, तोमाके नमस्कार।” प्रभु तारे प्रेम दिल, कैल पुरस्कार ॥ 114 ॥ अनुवाद—सर्वज्ञने कहा— “मैंने वह ध्यानमें देखा था, परन्तु आपका ऐश्वर्य देखकर मैं असमञ्जसमें पड़ गया था। आपका वह रूप और यह रूप कभी एक समान और कभी उनमें भेद देखता हूँ, यह आपकी माया ही है। आप जो हैं, सो हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूँ।” तब महाप्रभुने प्रसन्न होकर कृपाकर उसे प्रेम प्रदान किया॥ 112-114॥ अनुभाष्य—ज्योतिषीका वृत्तान्त चैतन्यभागवतमें दिखलायी नहीं देता है॥ 103-114॥ महाप्रभुकी बलदेव-आवेशमें यमुनाकर्षण-लीला :- एकदिन प्रभु विष्णुमण्डपे बसिया। 'मधु आन', 'मधु आन' बलेन डाकिया॥ 115 ॥ नित्यानन्द-गोसाञि प्रभुर आवेश जानिल। गङ्गाजल-पात्र आनि' सन्मुखे धरिल ॥ 116 ॥ जल पान करिया नाचे हञा विह्वल। यमुनाकर्षण-लीला देखये सकल ॥ 117 ॥ अनुवाद—एक दिन महाप्रभु विष्णुमण्डपमें बैठकर जोर-जोरसे कहने लगे—'मधु लाओ', 'मधु लाओ'। श्रीनित्यानन्द प्रभुने महाप्रभुके आवेशको समझकर गङ्गाजलका पात्र उनके सामने लाकर रखा। महाप्रभु जलपान करके आनन्दसे नृत्य करने लगे। सबने देखा कि महाप्रभु यमुना-आकर्षण लीला कर रहे हैं॥ 115-117॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'यमुनाकर्षणलीला'—श्रीबलदेव प्रभुने एक दिन यमुनापर क्रोध करके हल-मूसलके द्वारा यमुनाको खींचा था। महाप्रभु जब श्रीबलदेवके आवेशमें 'मधु लाओ', 'मधु लाओ' कह रहे थे, उस समय अन्य सभी उपरोक्त यमुनाकर्षण-लीलाको देख रहे थे॥ 117 ॥ अनुभाष्य—चैःभाः मध्यखण्ड, छब्बीसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥ 116॥ श्रीबलदेव प्रभु गोकुलमें आकर चैत्र और वैशाख, दो मास गोपियोंसे परिवृत होकर वास कर रहे थे। वारूणी पान करते हुए उन्होंने जलक्रीड़ाके लिये यमुनाजीको अपने निकट आह्वान किया। (भाः 10/65/25-30, 33)— “स आजुहाव यमुनां जलक्रीड़ार्थमीश्वरः। निजं वाक्यमनादृत्य मत्त इत्यापगां बलः। अनागतां हलाग्रेण कुपितो विचकर्ष ह॥ पापे त्वं मामनादृत्य यन्नायासि मयाहता। नेष्ये त्वां लाङ्गलाग्रेण शतधा कामचारिणीम्॥ एवं निर्भर्त्सिता भीता यमुना यदुनन्दनम्। उवाच चकिता वाचं पतिता पादयोर्नृप ॥ राम राम महाबाहो न जाने तव विक्रमम्। यस्यैकांशेन विधृता जगती जगतः पते॥ परं भावं भगवतो भगवन्मामजानतीम्। मोक्तु ततो व्यमुञ्चत् यमुनां याचितो भगवान् बलः। विजगाह जलं स्त्रीभिः करेणुभिरिवेभराट् ॥ अद्यापि दृश्यते राजन् यमुनाकृष्टवर्त्मना। बलस्यानन्तवीर्यस्य वीर्यं सूचयतीव हि।” “श्रीबलदेव प्रभुने जलकेलिके लिये यमुनाजीका आह्वान किया। यमुनाजीने यह समझकर कि ये तो मतवाले हो रहे हैं, उनकी आज्ञाका उल्लङ्घन किया और वे नहीं आयीं। तब श्रीबलदेव प्रभुने क्रोधित होकर उन्हें अपने हलकी नोकसे खींचा। उन्होंने कहा,—'पापिनी यमुने! क्योंकि तुम मेरी आदेशकी अवज्ञा करके यहाँ नहीं आ रही हो और स्वेच्छाचार करके तुम जो अपराध कर रही हो, उसका फल मैं तुम्हें अभी चखाता हूँ। मैं अपने हलकी नोकके द्वारा सतरहवाँ अध्याय | 239