भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 776, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 776

[ 17/117-123 तुम्हारे सौ-सौ भाग किये देता हूँ।' हे राजन्! श्रीबलदेव प्रभुकी इस प्रकार फटकारसे भयभीत होकर यमुनाजी काँपते हुए उनके चरण-युगलमें गिर पड़ीं और प्रार्थना करने लगीं, - 'हे जगन्नाथ! हे महाबाहो! हे राम! आप अपने एक अंश (शेष) के द्वारा इस जगत्को धारण करते हैं, ऐसे प्रभावशाली आपके पराक्रमको मैं भूल गयी थी। हे अखिलान्तर्यामी भक्तवत्सल, भगवन्! मैं आपके मुख्य स्वरूपसे अवगत नहीं हूँ, इसलिये मुझ शरणागतको मुक्ति दान करें।' यमुनाजीकी इस प्रकार प्रार्थना सुनकर भगवान् श्रीबलरामने यमुनाजीको मुक्त कर दिया और फिर जैसे गजराज हथिनियोंके साथ क्रीड़ा करता है, वे गोपियोंके साथ जलक्रीड़ा करने लगे। हे राजन्! अभी भी यमुनाजी श्रीबलदेव प्रभुके द्वारा खींचे हुए मार्गसे बहती हैं और ऐसा जान पड़ता है कि वे महाविक्रमशाली श्रीबलदेव प्रभुके यश-पराक्रमका गान कर रही हों॥" 117॥ अनुभाष्य-चैतन्यमङ्गल मध्यखण्ड- “वनमाली-नाम ताँर पुत्र एक सङ्गे। विप्रकुले जन्म, वैसे पूर्वदेश बङ्गे॥ देखिलेक काञ्चन-निर्मित कलेवर। रत्नविभूषित येन सुमेरु-शिखर ॥ हलायुध-वेशे नाचे तिनलोक-नाथ॥ “वनमाली नामका उनका एक पुत्र था। उनका जन्म ब्राह्मण कुलमें हुआ था और वे पूर्व बङ्गालमें रहते थे। उन्होंने देखा कि महाप्रभुका शरीर मानो सोनेका बना है। वह ऐसा लग रहा था मानो रत्नोंसे जड़ित सुमेरु पर्वत हो। हलायुधको लेकर त्रिलोकी-नाथ नृत्य कर रहे थे।" चैःचः आदुलीला, 10/73 संख्यामें कहा गया है कि 'वनमाली पण्डित' ने भी महाप्रभुके हाथोंमें सोनेका हल-मूसल देखा था। उनकी 'पण्डित'-पदवी, और इनकी 'आचार्य'-पदवी, दोनों एक ही व्यक्ति हैं अथवा पृथक् व्यक्ति हैं? ॥ 119॥ चन्द्रशेखर आचार्यरत्नका महाप्रभुका बलदेवरूपमें दर्शन :- मदमत-गति बलदेव-अनुकार। आचार्य शेखर ताँरे देखे रामाकार ॥ 118॥ वनमाली आचार्यका महाप्रभुके हाथमें स्वर्ण हल-दर्शन :- वनमाली आचार्य देखे सोणार लाङ्गल। सबे मिलि' नृत्य करे आनन्दे विह्वल ॥ 119॥ एइमत नृत्य हइल चारि प्रहर। सन्ध्याय गङ्गास्नान करि' सबे गेला घर ॥ 120॥ महाप्रभुकी आज्ञासे घर-घरमें श्रीकृष्ण-कीर्त्तन :- नगरिया लोके प्रभु यबे आज्ञा दिला। घरे घरे सङ्कीर्त्तन करिते लागिला ॥ 121 ॥ नामगीति :- 'हरि हरये नमः, कृष्ण यादवाय नमः। गोपाल गोविन्द राम श्रीमधुसूदन ॥' 122॥ मृदङ्ग-करताल सङ्कीर्त्तन-महाध्वनि। 'हरि' 'हरि'-ध्वनि बिना अन्य नाहि शुनि ॥ 123 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने जब नगरके लोगोंको आज्ञा दी, वे घर-घरमें सङ्कीर्तन करने लगे। 'हरि हरये नमः, कृष्ण यादवाय नमः। गोपाल गोविन्द राम श्रीमधुसूदन' का कीर्तन होने लगा। मृदङ्ग-करतालके साथ सङ्कीर्तनकी ध्वनि सर्वत्र होने लगी और 'हरि-हरि' की ध्वनिके अतिरिक्त कुछ भी सुनायी नहीं देता था॥ 121-123॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीबलदेव प्रभुके समान मदमत्त गतिसे चलने लगे। श्रीचन्द्रशेखर आचार्यने उन्हें श्रीबलरामके रूपमें देखा। वनमाली आचार्यने महाप्रभुके हाथमें सोनेका हल देखा। सभी भक्त मिलकर आनन्दसे नृत्य करने लगे। इस प्रकार चार प्रहर तक नृत्य हुआ। सन्ध्यामें सभीने गङ्गास्नान किया और सब अपने-अपने घरोंको गये॥ 118-120 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-नगरमें नाम प्रचार करनेके समय महाप्रभुने श्रीवास-अङ्गनके निकटमें रहनेवाले 240 | श्रीचैतन्यचरितामृत

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला) · पृष्ठ 776, कुल 2549 में से · BharatKosha