श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 777, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें17/121–130 ] नगरवासियोंको पहले करतालके साथ हरिनाम करनेकी आज्ञा दी; क्रमशः सङ्कीर्त्तनमें मृदङ्ग-करताल़ादि बजने लगे। तबसे घर-घरमें सङ्कीर्त्तनका प्रचार होता आ रहा है॥121॥ कीर्त्तन-विरोधी यवन और काजी :- शुनिय़ा ये क्रु काजी-पाशे आसि' सब कैल निवेदन ॥ 124॥ अनुवाद-सङ्कीर्त्तनकी ध्वनि सुनकर यवन लोग क्रोधित हो गये और उन्होंने काजीके पास आकर सङ्कीर्त्तन बन्द करवानेका निवेदन किया॥ 124॥ अनुभाष्य-नगरवासियोंका श्रीकृष्ण-कीर्त्तन और काजीका क्रोध तथा काजीका उद्धार-चैः भाः मध्यखण्ड, तेइसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है। ‘काजी’—फौजदार, चाँदकाजी। पहले जमींदार, राजा अथवा मण्डल भूमिके करका संग्रह करते थे। दण्डका विधान और शासन आदिका कार्य काजी लोगोंके द्वारा ही सम्पादित होता था। जमींदार अथवा काजी-ये दोनों ही बङ्गाल-सूबाके सूबेदारके अधीन थे। नदिया, इस्लामपुर और बागोयान आदि परगना ही उस समय हरि होड़के अथवा उनके अधीन कृष्णदास होड़के अधीन था। इनके भूमि अधिकारी होनेपर भी शासनका भार काजीके पास ही था। कहा जाता है कि चाँदकाजी बङ्गालके नवाब 'हुसेन शाह' के गुरु थे। किसीके मतसे इनका दूसरा नाम 'मौलाना सिराजुद्दीन' तथा किसीके मतसे 'हबिबर रहमान' था। इनके वंशज अभी भी उस स्थानपर वर्तमान है और चाँदकाजीकी समाधि भी वहाँ विद्यमान है॥ 124॥ काजीका मृदङ्ग तोड़ना, कीर्त्तनका विरोध और न करनेकी आज्ञा :- क्रोधे सन्ध्याकाले काजी एक घरे आइल। मृदङ्ग भाङ्गिय़ा लोके कहिते लागिल॥ 125॥ “एतकाल प्रकटे केह ना कैल हिन्दुयानि। एबे ये उद्यम चालाओ कार बल जानि' ॥ 126॥ केह कीर्त्तन ना करिह सकल नगरे। आजि आमि क्षमा करि' याइतेछों घरे॥ 127॥ आर यदि कीर्त्तन करिते लाग पाइमु। सर्वस्व दण्डिय़ा तार जाति ये लइमु॥”128॥ अनुवाद-सन्ध्याके समय काजी क्रोधित होकर एक हिन्दूके घरमें आया और मृदङ्ग तोड़कर कहने लगा-“अभी तक तो हिन्दुओंका ऐसा आचरण नहीं था, किसके बलपर तुम लोग यह सब कर रहे हो? आज मैं तुम्हें क्षमा करके अपने घर जा रहा हूँ, परन्तु कोई भी अबसे नगरमें कहीं भी कीर्त्तन नहीं करेगा। और यदि मैंने किसीको कीर्त्तन करते हुए पाया, तो मैं उसका सब कुछ हरण करके उसकी जाति भ्रष्ट कर दूँगा॥”125॥ अमृतप्रवाह भाष्य-बख्तियार खिलजीके आनेके समयसे लेकर चाँदकाजीके समय तक हिन्दुओंका धर्माचरण बहुत कमजोर हो गया था। जिनकी वास्तविक हिन्दू धर्ममें आस्था थी, वे चुपचाप एक बार “हरि हरि” बोलकर चुप हो जाते थे। इसलिये काजीने कहा-‘अभी तक तो हिन्दुओंका ऐसा आचरण नहीं था, किसके बलपर ऐसा प्रयास कर रहे हो?'॥ 126॥ अनुभाष्य-अब भी वह स्थान मायापुरमें ‘खोलभाङ्गार डाङ्गा’ के नामसे प्रसिद्ध है॥ 125॥ दुःखी सज्जन व्यक्तियोंका महाप्रभुके निकट आवेदन :- एत बलि' काजी गेल, -नगरिया लोक। प्रभु-स्थाने निवेदिल पाञा बड़ शोक॥ 129॥ महाप्रभुका क्रोध तथा सभीको सङ्कीर्त्तन करनेका आदेश :- प्रभु आज्ञा दिल-“याह, करह कीर्त्तन। मुञि संहारिमु आजि सकल यवन॥”130॥ सतरहवाँ अध्याय | 241