भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 778, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 778

[ 17/130-139 अनुवाद—यह कहकर काजी चला गया। नगरके लोगोंको बहुत दुःख हुआ और वे महाप्रभुके पास जाकर निवेदन करने लगे। महाप्रभुने उन्हें आज्ञा दी—"तुम लोग जाकर निर्भय होकर कीर्तन करो। मैं आज ही सभी यवनोंका संहार करूँगा॥" 130 ॥ घरे गिया सब लोक करय कीर्त्तन। काजीर भये स्वच्छन्द नहे, चमक्ति मन ॥ 131 ॥ ता-सबार अन्तरे भय प्रभु मने जानि'। कहिते लागिला लोके शीघ्र डाकि' आनि' ॥ 132 ॥ “नगरे नगरे आजि करिमु कीर्त्तन। सन्ध्याकाले कर सबे नगर मण्डन ॥ 133 ॥ सन्ध्याते देउटि सबे ज्वाल घरे घरे। देख, कोन् काजी आसि मोरे माना करे ॥" 134 ॥ अनुवाद—सभी लोग अपने-अपने घरमें जाकर कीर्तन करने लगे। परन्तु काजीका भय उनके मनमें था, इसलिये वे स्वच्छन्द रूपसे कीर्तन नहीं कर पा रहे थे। महाप्रभु मन-ही-मनमें उन सबके हृदयके भयको जानते थे, इसलिये उन्होंने कहा,—“शीघ्र ही सभी लोगोंको बुलाकर लाओ। आज मैं नगर-नगरमें कीर्तन करूँगा। सन्ध्याकालमें सारे नगरको सजा दो और उस समय सब घरोंमें मशालें जला दो। मैं देखूँगा कि कौन काजी आकर मुझे ऐसा करनेसे मना करता है?॥” 131-134 ॥ एत कहि' सन्ध्याकाले चले गौरराय। कीर्त्तनेर कैल प्रभु तिन सम्प्रदाय ॥ 135 ॥ तीन गुटोंमें कीर्तन-विभाग :- आगे सम्प्रदाये नृत्य करे हरिदास। मध्ये नाचे आचार्य-गोसाञि परम उल्लास ॥ 136 ॥ पाछे सम्प्रदाये नृत्य करे गौरचन्द्र। ताँर सङ्गे नाचि' बुले प्रभु नित्यानन्द ॥ 137 ॥ अनुवाद—यह कहकर श्रीगौरराय सन्ध्याके समय चले और उन्होंने कीर्तन करनेवालोंके तीन मण्डलियाँ बना दीं। सबसे आगेवाली मण्डलीमें श्रीहरिदास नृत्य कर रहे थे। बीचवाली मण्डलीमें श्रीअद्वैताचार्य परमोल्लासके साथ नृत्य कर रहे थे और पीछेवाली मण्डलीमें स्वयं श्रीगौरचन्द्र नृत्य कर रहे थे। श्रीनित्यानन्द प्रभु भी महाप्रभुके साथ चलते हुए नृत्य कर रहे थे॥ 135-137 ॥ वृन्दावन-दास इहा 'चैतन्यमङ्गले'। विस्तारि' वर्णियाछेन, चैतन्य-कृपाबले ॥ 138 ॥ अनुवाद—श्रीवृन्दावन-दासने महाप्रभुकी कृपाके बलपर इसका 'चैतन्यमङ्गल' में विस्तारसे वर्णन किया है॥ 138 ॥ कीर्तन करते-करते नवद्वीप-नगर भ्रमण :- एइमत कीर्त्तन करि' नगरे भ्रमिला। भ्रमिते भ्रमिते प्रभु काजीद्वारे गेला ॥ 139 ॥ अनुवाद—इस प्रकार वे नगरमें भ्रमण करते हुए कीर्तन करने लगे। समस्त नगरमें भ्रमण करते-करते महाप्रभु काजीके द्वार तक जा पहुँचे ॥ 139 ॥ अनुभाष्य—चैःभाः तेइसवाँ अध्याय— “तुया चरणे मन लागहुँ रे। (शार्ङ्गधर) तुया चरणे मन लागहुँ रे ॥ 241 ॥ चैतन्यचन्द्रेर एइ आदि सङ्कीर्त्तन। भक्तगण गाय नाचे श्रीशचीनन्दन ॥ 242 ॥ 'गङ्गातीरे तीरे पथ आछे नदीयाय। आगे सेइ पथे नाचि' याय गौरराय ॥ 298 ॥ आपनार घाटे आगे बहु नृत्य करि'। तबे माधाइर घाटे गेला गौरहरि ॥ 299 ॥ 'नाचे विश्वम्भर, सबार ईश्वर, भागीरथी-तीरे तीरे'। (ध्रु) ॥ 271 (क) ॥ वारकोणा-घाटे नागरिया-घाटे गिया। गङ्गानगर दिया प्रभु गेला 'सिमुलिया' ॥ 300 ॥ नदीयार एकान्ते नगर 'सिमुलिया'। नाचिते नाचिते प्रभु उत्तरिल गिया ॥ 348 ॥ काजिर बाड़ीर पथ धरिला ठाकुर ॥ 359 (क) ॥ आइला नाचिया यथा काजिर नगर ॥ 379 ॥” 242 | श्रीचैतन्यचरितामृत

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