श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 779, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें17/139–147 ] “चैतन्यचन्द्रका यह आदि कीर्तन है—'तुम्हारे चरणोंमें मेरा मन लग जाये, हे शार्ङ्गधर ! तुम्हारे चरणोंमें मेरा मन लग जाये।' (नगर-कीर्तनमें) भक्त लोग गा रहे थे और श्रीशचीनन्दन नृत्य कर रहे थे। 'नदियामें गङ्गाके किनारे जो मार्ग था, उसपर श्रीगौरसुन्दर आगे-आगे नृत्य करते हुए जा रहे थे। पहले 'अपने-घाट' पर बहुत नृत्य किया और तब श्रीगौरहरि 'माधाइ-घाट' पर गये। 'नाचे विश्वम्भर, सर्वेश्वर, भागीरथीके तीरे-तीरे। (ध्रु०)। फिर 'बारकोणा-घाट' और 'नगरिया-घाट' से 'गङ्गानगर' होते हुए महाप्रभु 'सिमुलिया' पहुँचे। नदीयाके एक प्रान्त भागमें 'सिमुलिया' नगर है, नाचते-नाचते महाप्रभु वहाँ पहुँच गये। तब ठाकुर (महाप्रभु) काजीके घरकी ओर चल पड़े। नाचते-नाचते वे काजीके नगरमें पहुँचे॥” 139 ॥ तर्ज-गर्ज करे लोक, करे कोलाहल। गौरचन्द्र-बले लोक प्रश्रय-पागल ॥ 140 ॥ अनुवाद—श्रीगौरसुन्दरके बलके आश्रयके कारण लोग पागलसे हो गये और वे तर्जन-गर्जन करते हुए कोलाहल करने लगे॥ 140 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीश्रीगौरचन्द्रके बलसे लोग तब उनके आश्रय प्राप्तकर पागल हो गये॥ 140 ॥ काजीका अपनेको छिपाना :– कीर्त्तनेर ध्वनिते काजी लुकाइल घरे। तर्ज्जन गर्ज्जन शुनि' ना हय बाहिरे ॥ 141 ॥ अभद्र व्यक्तियोंका काण्ड :– उद्धत लोक भाङ्गे काजीर घर-पुष्पवन। विस्तारि' वर्णिला इहा दास-वृन्दावन ॥ 142 ॥ अनुवाद—कीर्तनकी ध्वनि सुनकर काजी अपने घरमें छिप गया और तर्जन-गर्जन सुनकर भयसे बाहर नहीं आया। कुछ अभद्र लोग उत्तेजित होकर काजीके घरमें घुसकर उसके घर और वाटिकाको नष्ट करने लगे। इस प्रसङ्गको श्रीवृन्दावनदासने विस्तारसे कहा है॥ 141-142 ॥ अनुभाष्य—चैःभाः तेइसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥ 138-142 ॥ भद्र सज्जन व्यक्तियोंके द्वारा काजीका आह्वान :– तबे महाप्रभु तार द्वारेते बसिला। भव्यलोक पाठाइया काजी बोलाइला ॥ 143 ॥ काजीको लौकिकी मर्यादा-दान :– दूर हइते आइला काजी माथा नोडाइया। काजीरे बसाइला प्रभु सम्मान करिया ॥ 144 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभु काजीके द्वारपर बैठ गये और उन्होंने कुछ शिष्ट लोगोंको भीतर भेजकर काजीको बुलवाया। काजीने बाहर आकर दूरसे महाप्रभुको अपना शीश नवाया। महाप्रभुने काजीको सम्मानपूर्वक वहाँ बैठाया॥ 143-144 ॥ काजीके आचरणसे महाप्रभुकी विस्मयसूचक उक्ति :– प्रभु बलेन, — “आमि तोमार आइलाम अभ्यागत। आमा देखि' लुकाइला, – ए धर्म केमत ॥” 145 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, – “मैं तुम्हारा अतिथि बनकर आया हूँ और मुझे देखकर तुम छुप रहे हो, यह कैसा धर्मका आचरण है?” ॥ 145 ॥ काजीका प्रत्युत्तर :– काजी कहे, – “तुमि आइस क्रु तोमा शान्त कराइते रहिनु लुकाइया ॥ 146 ॥ एबे तुमि शान्त हैले, आसि' मिलिलाङ। भाग्य मोर, – तुमि-हेन अतिथि पाइलाङ ॥ 147 ॥ अनुवाद—काजीने कहा, – “आप तो क्रोधित होकर आये हो, आपके क्रोधको शान्त करनेके लिये ही मैं छुपा हुआ था। अब आप शान्त हो गये हो, इसलिये मैं आपसे आकर मिल रहा हूँ। यह तो मेरा सौभाग्य है कि आप मेरे अतिथि बने हैं॥ 146-147 ॥ सतरहवाँ अध्याय | 243