श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 761, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें17/22-30 ] अनुवाद-कलिकालमें नामरूपमें श्रीकृष्णका अवतार हुआ है। इस नामसे समस्त जगत्का उद्धार हो सकता है॥ 22 ॥ दार्ढ्य लागि' 'हरेर्नाम'-उक्ति तिनबार। जड़लोक बुझाइते पुनः 'एव'-कार ॥ 23 ॥ अनुवाद-तीन बार 'हरेर्नाम' का प्रयोग इस सिद्धान्तमें दृढ़ता दिखानेके लिये है। [तो भी यदि किसीका इसमें विश्वास नहीं हो, तो ऐसे] जड़बुद्धि व्यक्तिके लिये एव-कार (ही) का प्रयोग किया गया है॥ 23 ॥ 'केवल'-शब्दे पुनरपि निश्चय-करण। ज्ञान-योग-तप आदि कर्म-निवारण ॥ 24 ॥ अनुवाद-इस सिद्धान्तको पुनः सुनिश्चित करनेके लिये और ज्ञान-योग-तपादि कर्मोंकी अनुपयोगिता दिखानेके लिये 'केवल' शब्दका प्रयोग किया गया है॥ 24 ॥ अन्यथा ये माने, तार नाहिक निस्तार। नाहि, नाहि, नाहि, -तिन उक्त 'एव'-कार ॥ 25 ॥ अनुवाद-इस सिद्धान्तका जो अन्य अर्थ मानता है, उसका कभी भी उद्धार नहीं हो सकता, यह दर्शानेके लिये 'नहीं' शब्द तीन बार कहकर 'एव'-कार अर्थात् 'ही' भी कहा गया है॥ 25 ॥ नाम ग्रहण करनेकी प्रणाली :- तृण हैते नीच हञा सदा लबे नाम। आपनि निरभिमानी, अन्ये दिबे मान ॥ 26 ॥ अनुवाद-स्वयंको तृणसे भी नीच मानकर, स्वयं निरभिमानी होकर अन्योंको मान देते हुए सदा श्रीकृष्णका नाम लेना चाहिये ॥ 26 ॥ तरुसम सहिष्णुता वैष्णव करिबे। भर्त्सना-ताड़ने काके किछु ना बलिबे ॥ 27 ॥ काटिलेइ तरु येन किछु ना बलय। शुकाइया मरे, तबु जल ना मागय ॥ 28 ॥ एइमत वैष्णव कारे किछु ना मागिबे। अयाचित-वृत्ति, किम्बा शाक-फल खाइबे ॥ 29 ॥ अनुवाद-वैष्णवोंको वृक्षके समान सहनशील होना चाहिये। किसीके द्वारा भर्त्सना अथवा ताड़ना किये जानेपर भी प्रतिकारमें कुछ नहीं बोलना चाहिये। वृक्ष जैसे काटे जानेपर भी कुछ नहीं बोलता और सूखकर मरनेपर भी किसीसे जल नहीं माँगता, वैसे ही वैष्णवको किसीसे कुछ नहीं माँगना चाहिये। अयाचक-वृत्ति (किसीसे भिक्षा नहीं करना) का अवलम्बन करते हुए अथवा शाक-फल जो भी स्वतः मिल जाँय, उन्हें खाकर जीवन धारण करना चाहिये ॥ 27-29 ॥ अमृतानुकणिका-वैष्णवको वृक्षके समान सहनशील होना चाहिये, यह साधक भक्तोंके लिये शिक्षा है। फलदार वृक्ष साधारणतः पत्थर मारनेवालेको फल प्रदान करते हैं, परन्तु कभी-कभी आँधी-तूफानसे गिरकर नीचे बैठे व्यक्तिको कुचलकर मार भी डालते हैं। उत्तम वैष्णव वृक्षसे भी अधिक सहनशील और उपकारी होते हैं। वे किसी भी परिस्थितिमें किसीका भी अपकार नहीं करते हैं। यदि वे किसीको शाप भी देते हैं, तो उसमें भी उस व्यक्तिका कल्याण निहित होता है। जैसे नारदजीने कुबेरके पुत्रोंको वृक्ष बननेका शाप दिया था, वह उनके पक्षमें वरदान ही था, उन्हें वृक्षयोनिसे मुक्त करके श्रीकृष्णने भी उनसे ऐसा ही कहा था। इसी शापके फलस्वरूप श्रीकृष्णके चरणकमलोंके स्पर्शसे उन्हें गोलोक धामकी प्राप्ति हुई, जो कोटि-कोटि जन्मोंकी तपस्या आदिके द्वारा भी सम्भव नहीं है॥ 27-29 ॥ सदा नाम लइबे, यथा-लाभेते सन्तोष। एइमत आचार करे भक्तिधर्म-पोष ॥ 30 ॥ अनुवाद-सदा नाम लेते हुए स्वतः जो कुछ प्राप्त सतरहवाँ अध्याय | 225