श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 760, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 17/18-22 उनका अभिषेक किया और विविधोपचारोंसे उनकी पूजा की तथा अनेक प्रकारके खाद्य-द्रव्य उन्हें भोजनके लिये निवेदित किये। महाप्रभु उस समय भक्तोंके द्वारा दी गयी सारी खाद्य-सामग्री खाने लगे। उस दिन महाप्रभु सात प्रहरतक उस भावके आवेशमें रहे और उन्होंने सब अवतारोंके भावोंको दिखलाया। उन्होंने भक्तोंके पूर्व गुह्य समस्त सम्वादोंको व्यक्त करके सबके सन्देहको दूर करके सबको वरदान दिये। इस भावको कोई-कोई 'सातप्रहरिया भाव' और कोई-कोई 'महाप्रकाश' भी कहते हैं॥18॥ अनुभाष्य—श्रीवास पण्डितके घरमें जब महाप्रभु सातप्रहरिया-भावमें थे, तब उस समय उनके अभिषेकके लिये जल लानेवाली 'दुःखी'-नामक एक भाग्यवती स्त्रीको प्रभुने 'सुखी' नाम प्रदान किया। खोलाबेचा (केलेके तने आदि बेचने वाले) श्रीधरको महाप्रकाश-दर्शन, मुरारि गुप्तको श्रीराम रूपके दर्शन, श्रीहरिदास ठाकुरके प्रति कृपा, श्रीअद्वैताचार्यको गीताका सत्यपाठ-कथन और मुकुन्दके प्रति कृपा आदिके लिये चैःभाः मध्यखण्ड, नौवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥18॥ मुरारिके घरमें वराहका आवेश :- वराह-आवेशे हैला मुरारि-भवने। ताँर स्कन्धे चड़ि' प्रभु नाचिला अङ्गने॥19॥ अनुवाद—एकदिन महाप्रभु वराह-आवेशमें मुरारि गुप्तके घरमें आये। (किसी और दिन) महाप्रभु मुरारि गुप्तके कन्धेपर चढ़कर आङ्गनमें नाचने लगे॥19॥ अमृतप्रवाह भाष्य—एकदिन महाप्रभुने 'शूकर!' 'शूकर!' कहकर चिल्लाते हुए स्वयं वराहरूप धारण करके मुरारि गुप्तके घरमें प्रवेश किया। उन्होंने जलसे भरे एक पात्र (सुराही) को पृथ्वीको उठानेकी भाँति अपने दाँतोंसे उठाकर जलपान किया। किसी और दिन महाप्रभुने मुरारि गुप्तके कन्धेपर चढ़कर बहुत नृत्य किया॥19॥ अनुभाष्य—'मुरारि गुप्तके घरमें महाप्रभुका वराहावेश'-चैःभाः मध्यखण्ड, तीसरा अध्याय द्रष्टव्य है।॥19॥ शुक्लाम्बरको माधुकरी-भिक्षासे प्राप्त चावलका भोजन :- तबे शुक्लाम्ररेर कैल तण्डुल भक्षण। 'हरेर्नाम' श्लोकेर कैल अर्थ विवरण॥20॥ अनुवाद—महाप्रभुने शुक्लाम्रर ब्रह्मचारीके भिक्षाके चावल छीनकर खाये। बादमें उन्होंने 'हरेर्नाम' श्लोककी व्याख्या की॥20॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'शुक्लाम्बर ब्रह्मचारी'-ये गङ्गाके तटपर नवद्वीपमें रहते थे। एक समय जब महाप्रभु नृत्य कर रहे थे, तब ये भिक्षा करके लाये चावलकी झोलीके साथ वहाँ पहुँचे। भक्तवात्सल्यके कारण महाप्रभुने उनके हाथसे वह झोली ले [छीन] ली और सारे चावल महाप्रेमके साथ खाने लगे॥20॥ अनुभाष्य—'महाप्रभुके द्वारा शुक्लाम्ररके भिक्षासे प्राप्त चावलका खाना'-चैःभाः मध्यखण्ड, सोलहवाँ अध्याय द्रष्टव्य है।॥20॥ हरिनामके बिना जीवकी गति नहीं :- बृहन्नारदीय पुराण (38/126)— हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्। कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा॥21॥ अनुवाद—कलियुगमें हरिनाम ही, हरिनाम ही, हरिनाम ही एकमात्र साधन है, इसके अतिरिक्त अन्य कोई गति नहीं है, नहीं है, नहीं है॥21॥ अनुभाष्य—चैःचः आदिलीला, 7/76 संख्या द्रष्टव्य है॥21॥ 'हरेर्नाम'-श्लोककी व्याख्या :- कलिकाले नामरूपे कृष्ण-अवतार। नाम हैते हय सर्वजगत्-निस्तार॥22॥ 224 | श्रीचैतन्यचरितामृत