भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 762

[ 17/30-34 हो जाये, उसीमें सन्तोष करना चाहिये। इस प्रकारका आचरण भक्तिधर्मका पोषक है॥30॥ अनुभाष्य-चैःचः अन्त्यलीला, 20/22-26 संख्या द्रष्टव्य है॥30॥ श्रीमुखकी वाणी :- श्रीकृष्णचैतन्यचन्द्रोक्त शिक्षाष्टकके अन्तर्गत एक पद्य- तृणादपि सुनीचेन तरोरिव सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्त्तनीयः सदा हरिः ॥31॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥31॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो अपनेको तृणसे भी छोटा मानते हैं, जो वृक्षके समान सहनशील हैं, अपने लिये मानशून्य हैं और दूसरोंको सम्मान प्रदान करते हैं, वे ही सदा हरिकीर्त्तन करनेके अधिकारी हैं॥31॥ अनुभाष्य-तृणादपि (सर्वपददलित-गुरुभावरहितात् तृणादपि) सुनीचेन (सर्वतोभावेन नीचेन प्राकृतमर्यादा-रहितभाव-समन्वितेन जनेन) तरोरपि (वृक्षादपि) सहिष्णुना (सहनगुणयुक्तेन जनेन) अमानिना (स्वयं मननीयोऽपि तादृश-प्राकृत-मर्यादा-परित्यागेन) मानदेन (अन्यebhyah: मानरहितेभ्यः अयोग्येभ्यः अपि मानं गौरवं प्रदेन, एवम्भूतेन जनेन) सदा (नित्यकालं) हरिः [एव] कीर्त्तनीयः (अधरोष्ठजिह्वादौ उच्चारणीयः) । श्लोक भावानुवाद-स्वयंको सभीके पाँवोंके नीचे रौंदे जानेपर भी कोई प्रतिरोध नहीं करनेवाले तृणसे भी अपनेको नीचा माननेवाले, वृक्षसे भी अधिक सहनशीलता-गुणयुक्त, समस्त सांसारिक अभिमानसे रहित, अन्य सभीको (योग्य अथवा अयोग्यको) मान प्रदान करनेवाले जन, निरन्तर हरि-कीर्त्तन (अधर-ओष्ठ-जिह्वासे हरिनाम उच्चारण) कर सकते हैं॥31॥ इस श्लोकके अनुसार चलनेके लिये कविराज गोस्वामीका सभीको सविनय अनुरोध :- उर्द्धबाहु करि' कहौं, शुन, सर्वलोक। नाम-सूत्रे गाँथि' पर कण्ठे एइ श्लोक ॥ 32 ॥ प्रभु-आज्ञाय कर एइ श्लोक आचरण। अवश्य पाइबे तबे श्रीकृष्णचरण॥33॥ अनुवाद-मैं अपनी भुजाएँ उठाकर कह (विनती कर) रहा हूँ,-“सब लोग सुनो ! इस श्लोकको श्रीकृष्णनामके धागेपर पिरोकर सदा स्मरण करनेके लिये अपने कण्ठमें धारण करो।” महाप्रभुकी आज्ञा है कि इस श्लोककी शिक्षाका अपने जीवनमें आचरण करो, तब अवश्य ही तुम्हें श्रीकृष्णके चरणोंकी प्राप्ति होगी ॥ 32-33 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-ग्रन्थकार कह रहे हैं,-“ओहे सर्वजनगण! मैं अपनी भुजाएँ उठाकर कह रहा हूँ, तुम इसे सुनो। श्रीकृष्णनाम-मालामें इस श्लोकको गून्थकर कण्ठमें धारण करो। तात्पर्य यह है कि अधिकारी नहीं होनेपर नाम जप करनेसे 'नामाभास' अथवा 'नामापराध' होता है। इससे जीवको नामका फल जो 'श्रीकृष्णप्रेम' है, वह प्राप्त नहीं होता है। महाप्रभुके द्वारा रचित इस 'तृणादपि' श्लोकमें जो उपदेश दिया गया है, उसके अनुसार आचरण करते-करते हरिनाम करो, ऐसा करनेसे तुम अवश्य ही श्रीकृष्णचरणोंको प्राप्त करोगे॥”32-33॥ अनुभाष्य-'नामसूत्रे गाँथि'-प्राकृत अभिमानसे रहित ये चार भाव-(1) सुनीचता, (2) सहिष्णुता, (3) अमानी होना और (4) सबको मान प्रदान करना, श्रीहरिनामरूपी सूत्रसे माला अथवा रक्षाकवच पिरोनेकी वस्तु हैं। प्राकृत अभिमान रहनेपर निरन्तर हरिनाम कीर्त्तन करना सम्भव नहीं है। जड़्रीय अभिमानादि हरिनाममें बाधक हैं। चार प्रकारके अभिमानोंसे रहित होनेके उपरान्त ही शुद्धजीव सदैव हरिनाम कीर्त्तन कर पाते हैं। इस प्रकार साधन-भक्तिकी (उपरोक्त चार भावोंको धारण करनेकी) अनुशासनरूपी इस आज्ञाका सुचारु रूपसे पालन करनेपर हरिनाम-कीर्त्तनके फलस्वरूप श्रीकृष्णचरणोंकी अवश्य ही प्राप्ति होगी ॥ 32-33 ॥ एक वर्षतक श्रीवासके घरमें सङ्कीर्त्तन :- तबे प्रभु श्रीवासेर गृहे निरन्तर। रात्रे सङ्कीर्त्तन कैल एक सम्वत्सर ॥ 34 ॥ 226 | श्रीचैतन्यचरितामृत