भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 751, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 751

16/97-106 ] उनकी बुद्धिको आच्छादित करके ही उनसे अशुद्ध श्लोककी रचना करवायी थी॥97॥ कविके पराजित होनेपर शिष्योंके द्वारा हँसना और महाप्रभुके द्वारा उसका निषेध :- तबे शिष्यगण सब हासिते लागिल। ताँ-सबा निषेधि' प्रभु कविके कहिल ॥ 98 ॥ कविको महाप्रभुके द्वारा सम्मान प्रदान :- “तुमि महापण्डित हओ, कवि-शिरोमणि। याँर मुखे बाहिराय ऐछे काव्यवाणी ॥ 99 ॥ तोमार कवित्व येन गङ्गाजल-धार। तोमासम कवि कोथा नाहि देखि आर ॥ 100 ॥ जयदेव, कालिदास और भवभूतिके काव्यमें भी दोष :- भवभूति, जयदेव आर कालिदास। ताँ-सबार कवित्वे हय दोषेर प्रकाश ॥ 101 ॥ अनुवाद-दिग्विजयी पण्डितकी पराजयको देखकर तब महाप्रभुके सभी शिष्य हँसने लगे। महाप्रभुने उन सबको हँसनेसे रोका और उन्होंने कविसे कहा-“आप तो महापण्डित हैं और कवियोंमें शिरोमणि हैं, जिनके मुखसे ऐसी सुन्दर कविता निकलती है। आपकी कविता तो गङ्गाजलकी धाराके समान है। मैंने आपके समान कवि कहीं नहीं देखा है। भवभूति, जयदेव और कालिदास जैसे महान कवियोंकी कविताओंमें भी कुछ दोष रहते हैं॥ 98-101 ॥ अनुभाष्य-'भवभूति अथवा श्रीकण्ठ' - ये 'मालतीमाधव', 'उत्तर-चरित', 'वीरचरित' आदि संस्कृत नाटकोंके रचयिता हैं। भोजराजाके राज्यकालमें इनका जन्म हुआ था। ये पद्मनगर-निवासी भट्टगोपाल नामक काश्यप-गोत्रीय श्रोत्रिय ब्राह्मणके पौत्र नीलकण्ठके पुत्र थे। 'कालिदास' -सम्राट् विक्रमादित्यकी सभामें नवरत्नोंमें अन्यतम महाकवि थे। इन्होंने 'रघुवंश', 'कुमारसम्भव', 'अभिज्ञान-शकुन्तल', 'मेघदूत' आदि लगभग तीस-चालीस संस्कृत महाकाव्य, नाटक और अन्यान्य विषयक ग्रन्थोंकी रचना की थी। 'जयदेव' - चैःचः आदिलीला, 13/42 संख्या द्रष्टव्य है ॥ 101 ॥ इति अनुभाष्ये षोडश परिच्छेद। सोलहवें अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ। श्लोक-रचना ही वास्तविक गुण :- दोष-गुण-विचारे एइ अल्प करि' मानि। कवित्व-करणे शक्ति, ताँहा से बाखानि ॥ 102 ॥ महाप्रभुकी दैन्योक्ति :- शैशव-चापल्य किछु ना लबे आमार। शिष्येर समान मुञि ना हङ तोमार ॥ 103 ॥ महाप्रभुके द्वारा उनको सविनय-वाक्यसे विदायी-दान :- आजि बासा' याह, कालि मिलन आबार। शुनिब तोमार मुखे शास्त्रेर विचार ॥ " 104 ॥ अनुवाद-दोष और गुणोंके विचारसे यह तो बहुत साधारण सी बात है, किन्तु आपकी कविता रचनाकी शक्ति प्रशंसनीय है। मेरी बाल्य-चपलताको आप अपने हृदयमें मत रखना, मैं तो आपके शिष्यके भी समान नहीं हो सकता। आज आप अपने वास स्थानपर जाइये, हम कल पुनः मिलेंगे। तब मैं आपके मुखसे शास्त्रोंके विचार श्रवण करूँगा॥" 104 ॥ रात्रिमें कविके द्वारा सरस्वतीकी आराधना :- एइमते निज-घरे गेला दुइ जन। कवि रात्रे कैल सरस्वती-आराधन ॥ 105 ॥ सरस्वतीके उपदेशसे महाप्रभुमें ईश्वर-बुद्धि :- सरस्वती रात्रे ताँरे उपदेश कैल। साक्षात् ईश्वर करि' प्रभुरे जानिल ॥ 106 ॥ अनुवाद-इस प्रकार दोनों अपने-अपने घर चले गये और दिग्विजयी ब्राह्मण रात्रिमें सरस्वतीदेवीकी आराधना करने लगे। सरस्वतीदेवीने रात्रिमें दिग्विजयीको उपदेश दिया कि निमाइ पण्डित साक्षात् ईश्वर हैं॥ 105-106 ॥ सोलहवाँ अध्याय | 215