भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 750, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 750

[ 16/86-97 कविताकी रचना होती है और उसमें अलङ्कारोंके प्रयोगसे उसका अर्थ झलमल करता है अर्थात् स्पष्टरूपसे प्रकाशित होता है॥” 86॥ दिग्विजयीका विस्मित होकर मन-ही-मन विचार :- शुनिया प्रभुर वाक्य दिग्विजयी विस्मित। मुखे ना निःसरे वाक्य, प्रतिभा—स्तम्भित॥ 87॥ कहिते चाहये किछु ना आइसे उत्तर। तबे विचारये मने हइया फाँफर॥ 88॥ अनुवाद—महाप्रभुके वाक्योंको सुनकर दिग्विजयी बहुत विस्मित हुए। उनके मुखसे वाक्य नहीं निकल रहा था और उनकी प्रतिभा स्तम्भित हो गई। वे कुछ कहना चाहते थे, परन्तु कुछ उत्तर नहीं दे पाये। तब वे किंकर्त्तव्य-विमूढ़ होकर मनमें विचार करने लगे॥ 87-88॥ 'पडुया बालक कैल मोर बुद्धि लोप। जानि—सरस्वती मोरे करियाछेन कोप॥ 89॥ महाप्रभुकी अलौकिक व्याख्याको सरस्वतीकी व्याख्या समझना :- ये व्याख्या करिल, से मनुष्येर नहे शक्ति। निमाञि-मुखे रहिं' बले आपने सरस्वती॥'90॥ अनुवाद—'एक विद्यार्थी बालकने मेरी बुद्धिका नाश कर दिया है। ऐसा लगता है कि सरस्वतीदेवी मुझसे रुष्ट हो गयी हैं। इसने जो व्याख्याकी है, ऐसी व्याख्या करनेकी शक्ति किसी मनुष्यकी तो नहीं हो सकती। निमाइके मुखसे स्वयं सरस्वती ही बोल रही हैं॥'90॥ महाप्रभुके प्रति कविकी उक्ति :- एत भावि' कहे,—“शुन, निमाञि पण्डित। तव व्याख्या शुनि' आमि हइलाङ् विस्मित॥ 91॥ अलङ्कार नाहि पड़, नाहि शास्त्राभ्यास। केमने ए सब अर्थ करिले प्रकाश॥”92॥ अनुवाद—इस भावनासे दिग्विजयीने कहा,—“सुनो, निमाइ पण्डित ! तुम्हारी व्याख्या सुनकर मैं विस्मित हो गया हूँ। तुमने न तो अलङ्कार पढ़ा है और न ही शास्त्रोंका अभ्यास किया है। फिर तुमने किस प्रकारसे इन सब अर्थोंको प्रकाशित किया है॥”91-92॥ इहा शुनि' महाप्रभु अति बड़ रङ्गी। ताँहार हृदय जानि' कहे करि' भङ्गी॥ 93॥ महाप्रभुका सरस्वतीको ही व्याख्या- नैपुण्यका कारण बताना :- “शास्त्रेर विचार भाल-मन्द नाहि जानि। सरस्वती याहा बलाय, सेइ बलि वाणी॥”94॥ अनुवाद—यह सुनकर महान् कौतुकी महाप्रभुने उनके हृदयके भावोंको जानकर परिहासपूर्वक कहा—“मैं शास्त्रोंके गुण और दोषके विचारोंको नहीं जानता, सरस्वतीदेवीने मुझसे जो बुलवाया है, मैंने वही कहा है॥”94॥ सरस्वतीके ऊपर दिग्विजयीका अभिमान :- इहा शुनि' दिग्विजयी करिल निश्चय। 'शिशुद्वारे देवी मोरे करिल पराजय॥ 95॥ आजि ताँरे निवेदिब, करि' जप-ध्यान। शिशुद्वारे कैल मोरे एत अपमान॥'96॥ अनुवाद—यह सुनकर दिग्विजयीने निश्चय किया कि 'स्वयं देवीने ही मुझे इस बालकके द्वारा पराजित करवाया है। आज ही मैं जप-ध्यान करके उनसे पूछूँगा कि एक छोटेसे बालकके द्वारा क्यों मेरा इतना अपमान करवाया है?'॥ 95-96॥ ग्रन्थकारके द्वारा घटनाके मूल कारणका निर्देश :- वस्तुतः सरस्वती अशुद्ध श्लोक कराइल। विचार-समय ताँर बुद्धि आच्छादिल॥ 97॥ अनुवाद—वास्तवमें सरस्वतीदेवीने विचार करते समय 214 | श्रीचैतन्यचरितामृत

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