भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 749, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 749

और पाँच अलङ्कार दिखलायी पड़ते हैं, परन्तु यदि सूक्ष्म रूपसे विचार किया जाये, तो इसमें अपार गुण और दोष हैं॥84॥ अमृतप्रवाह भाष्य—“महत्त्वं गङ्गायाः”, इस श्लोकमें जो पाँच अलङ्कार हैं, वे गुण हैं; और इसमें पाँच दोष हैं अर्थात् दो स्थानोंपर ‘अविमृष्ट-विधेयांश’ दोष, तथा तीन स्थानोंपर ‘विरुद्धमति’, ‘पुनरुक्ति’ और ‘भग्नक्रम’ नामक दोष हैं। पहला ‘अविमृष्ट-विधेयांश’ दोष यह है कि इस श्लोकमें ‘गङ्गाका महत्त्व’ ही मूल विधेय है और ‘इदं’ शब्द अनुवाद है; इस स्थानपर ‘गङ्गाका महत्त्व’ पहले लिखकर ‘इदं’ शब्द बादमें लिखना अवैध है। अनुवाद अर्थात् पूर्व ज्ञात विषय पहले नहीं लिखनेपर अर्थकी हानि होती है। दूसरा ‘अविमृष्ट-विधेयांश’ दोष यह है कि ‘द्वितीय-श्रीलक्ष्मीरिव’ (द्वितीय श्रीलक्ष्मीके समान), इसमें प्रयुक्त ‘द्वितीयत्व’—विधेय अर्थात् पूर्व अज्ञात विषय है, उसको पहले लिखकर समास करनेसे अर्थ गौण होकर नष्ट हो जाता है, अर्थात् लक्ष्मीके समान कहनेका जो तात्पर्य था, वह समास-दोषसे नष्ट हो गया। तीसरा दोष जो ‘विरुद्धमति-कृत’ है, वह ‘भवानीभर्तुः’ शब्दमें दिखेगा; ऐसे प्रयोगसे ‘भवानी’ शब्दसे महादेवकी पत्नीको समझा जाता है, ‘भवानीभर्तुः’ शब्दसे ‘भवानीके दूसरे पति’—इस प्रकार द्वितीय-मति उदित होती है। ऐसे शब्द-व्यवहारसे काव्य ‘विरुद्धमति-कृत’ दोषसे दूषित हो जाता है। चौथा दोष यह है कि ‘विभवति’ क्रियामें वाक्य समाप्त होनेपर, उस स्थानपर ‘अद्भुतगुण’ विशेषणके प्रयोग करनेसे ‘पुनरुक्ति’-दोष हुआ है। पाँचवाँ दोष ‘भग्नक्रम’ है; पहले, तीसरे और चौथे, इन तीन पदोंमें ‘त’कार, ‘र’कार और ‘भ’कारका अनुप्रास है, दूसरे पदमें अनुप्रास नहीं है, यही ‘भग्नक्रम’ दोष है। पाँच अलङ्कार गुण होनेपर भी इन पाँच दोषोंके कारण इस श्लोकका महत्त्व नष्ट हो गया। दस अलङ्कारोंसे युक्त श्लोकमें यदि एक भी दोष रहे, तो वह श्वेतकुष्ठयुक्त भूषणोंसे भूषित सुन्दर शरीरके समान निन्दित होता है। अब गुणोंकी बात बतला रहा हूँ,—तुम्हारे इस श्लोकमें दो शब्दालङ्कार और तीन अर्थालङ्कार हैं। (1) तीन पादोंमें जो अनुप्रास हैं, वे शब्दालङ्कार हैं। (2) ‘श्रीलक्ष्मी’ इसके प्रयोगसे पुनरुक्ति दोष नहीं होता, अपितु ‘पुनरुक्तिवदाभास’रूप शब्दालङ्कार होता है। ‘श्री’ और ‘लक्ष्मी’ को एक वस्तु माननेपर किसी प्रकारका दोष नहीं होता। ‘श्रीयुत लक्ष्मी’—इस प्रकार अर्थ करनेपर अर्थका विभेद अवश्य होता है, परन्तु इससे जो पुनरुक्त्याभास होता है, वह एक विशेष शब्दालङ्कार है। (3) ‘लक्ष्मीरिव’ इस शब्दके प्रयोगमें उपमालङ्काररूप अर्थालङ्कार है। (4) और एक विरोधाभास-रूप अर्थालङ्कार है, वह विष्णुचरण-कमलसे उत्पन्न गङ्गाके सम्बन्धमें है। जलसे ही कमलकी उत्पत्ति होती है, किन्तु कमलसे जलकी उत्पत्ति होना—ऐसी विरुद्ध बातसे ‘विरोधाभास’ उत्पन्न होता है। ईश्वरकी अचिन्त्य शक्तिसे गङ्गाका प्रकाश होनेके कारण इसमें विरोधमात्र नहीं है, केवल ‘विरोधाभास’ है, वही अलङ्कार है। (5) जो वाक्य गङ्गाके महत्त्व-रूप साध्यवस्तुको साधन कर रहा है अर्थात् विष्णुपादोत्पत्ति-वाक्य, वह वाक्य ही ‘अनुमान’ अलङ्कार है॥54-84॥ अदोषदर्शी महाप्रभुके द्वारा कविको उत्साह-प्रदान :— प्रतिभा, कवित्व तोमार देवता-प्रसादे। अविचार काव्ये अवश्य पड़े दोष बाधे॥85॥ **अनुवाद—**देवताओंकी कृपासे आपने कविता रचनेकी प्रतिभा तो प्राप्तकी है, परन्तु अविचारपूर्वक कविता रचनेसे अवश्य ही उसमें दोष रहता है॥85॥ **अनुभाष्य—**काव्यका यदि विचार न किया जाये, तो अवश्य ही उसके दोष सहजमें दिखायी नहीं देते॥85॥ विचार करिले कवित्व हय सुनिर्मल। सालङ्कार हैले अर्थ करे झलमल॥” 86॥ **अनुवाद—**विचार करनेपर सुनिर्मल (दोषरहित)