भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 748, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 748

[ 16/74-84 चतुर्थ-चरणे चारि 'भ'-कार-प्रकाश। अतएव शब्दालङ्कार अनुप्रास ॥ 75 ॥ अनुवाद—प्रथम चरणमें पाँच बार 'त'-कार का, तीसरे पदमें पाँच बार 'र'-कार का और चौथे चरणमें चार बार 'भ'-कार का प्रयोग हुआ है। इसलिये यह अनुप्रास नामक शब्दालङ्कार है॥ 74-75 ॥ 'श्री'-शब्दे, 'लक्ष्मी'-शब्दे—एक वस्तु उक्त। पुनरुक्तवदाभासे, नहे पुनरुक्त ॥ 76 ॥ 'श्रीयुत लक्ष्मी' अर्थे अर्थेर विभेद। पुनरुक्तवदाभासे शब्दालङ्कार-भेद ॥ 77 ॥ अनुवाद—'श्री' और 'लक्ष्मी' शब्द एक ही वस्तुका नाम है, इससे पुनरुक्तिका आभास होता है, किन्तु यह पुनरुक्ति नहीं है। 'श्रीयुत लक्ष्मी' अर्थमें अर्थका विभेद है अर्थात् 'श्री' का अर्थ यहाँ शोभा है, इसलिये 'श्रीलक्ष्मी' का अर्थ 'शोभायुक्त लक्ष्मी' होनेसे यह पुनरुक्ति दोष नहीं है। इसी प्रकार पुनरुक्तवदाभास शब्दालङ्कारका एक भेद है॥ 76-77 ॥ तीसरा, चौथा और पाँचवाँ गुण—तीनों अर्थालङ्कार :- 'लक्ष्मीरिव' अर्थालङ्कार—उपमा-प्रकाश। आर अर्थालङ्कार आछे, नाम—'विरोधाभास' ॥ 78 ॥ 'गङ्गाते कमल जन्मे'—सबार सुबोध। 'कमले गङ्गार जन्म'—अत्यन्त विरोध ॥ 79 ॥ 'इहाँ विष्णुपादपद्मे गङ्गार उत्पत्ति'। विरोद्धालङ्कार इहार महा-चमत्कृति ॥ 80 ॥ ईश्वर-अचिन्त्यशक्त्ये गङ्गार प्रकाश। इहाते विरोध नाहि, विरोध-आभास ॥ 81 ॥ अनुवाद—'लक्ष्मीरिव' में 'उपमा' अर्थालङ्कार है। श्लोकमें एक और अर्थालङ्कार है जिसका नाम 'विरोधाभास' है। 'गङ्गासे कमलकी उत्पत्ति' होती है, यह सभी भली-भाँति जानते हैं, किन्तु 'कमलसे गङ्गाकी उत्पत्ति' जो कहा गया है—इसमें अत्यन्त विरोध है। यहाँ श्रीविष्णुके चरणकमलोंसे गङ्गाकी उत्पत्ति कही गयी है, यह महाचमत्कारी विरोद्धालङ्कार है। ईश्वरकी अचिन्त्य शक्तिके प्रभावसे गङ्गाकी उत्पत्ति हुई है, इसमें कोई भी विरोध नहीं है; अपितु यह विरोधाभास अलङ्कार है॥ 78-81 ॥ श्रीकृष्णकी अचिन्त्य शक्तिका परिचय :- श्रीभगवत्-श्रीकृष्णचैतन्यपादोक्त श्लोक— अम्बुजमम्बुनि जातं क्वचिदपि न जातमम्बुजादम्बु। मुरभिदि तद्विपरीतं पादाम्भोजान्महानदी जाता ॥ 82 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 82 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जलमें ही कमल उत्पन्न होता है, कमलसे कभी भी जल उत्पन्न नहीं होता। किन्तु आश्चर्यका विषय यह है कि श्रीकृष्णमें इसके विपरीत देखा जाता है, उनके श्रीचरणकमलोंसे महानदी गङ्गाका जन्म हुआ है॥ 82 ॥ अनुभाष्य—अम्बुनि (जले) अम्बुजं (पद्मं) जातम् (उत्पन्नम्); क्वचित् (कुत्र) अपि अम्बुजात् (पद्मात्) अम्बु (जलं) न जातम्; किन्तु मुरभिदि (मुरारौ कृष्णे) तद्विपरीतं (कार्य-कारण-भावयोर्वैषम्यं) दृश्यते, यतः (कृष्णपादपद्मात्) महानदी (गङ्गा) जाता (निःसृता)। श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 82 ॥ गङ्गार महत्त्व—साध्य, साधन ताहार। विष्णुपादोत्पत्ति—'अनुमान'—अलङ्कार ॥ 83 ॥ अनुवाद—इस श्लोकमें गङ्गाका महत्त्व वर्णन करना साध्य है और महिमाका साधन अर्थात् कारण उनका श्रीविष्णुके चरणकमलोंसे उत्पन्न होना है। यह अनुमान-अलङ्कार है॥ 83 ॥ स्थूल एइ पञ्च दोष, पञ्च अलङ्कार। सूक्ष्म विचारिये यदि आछये अपार ॥ 84 ॥ अनुवाद—स्थूलरूपसे विचार करनेपर ये पाँच दोष 212 | श्रीचैतन्यचरितामृत