श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 747, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें16/62-74 ] पति', इस उक्तिको सुननेपर इसमें विरोधी अर्थका भान होता है, इसलिये 'विरुद्धमति' शब्द शास्त्रमें कभी शुद्ध नहीं माना गया है। 'ब्राह्मणकी पत्नीके पतिके हाथमें दान दो', ऐसा सुननेसे ही उनका कोई दूसरा पति है, ऐसा ज्ञान होता है॥62-65॥ चौथे दोषकी व्याख्या :- 'विभवति' क्रियार वाक्य-साङ्ग, पुनः विशेषण। 'अद्भुतगुणा'-एइ पुनराय दूषण॥66॥ पाँचवें दोषकी व्याख्या :- तिन पादे अनुप्रास देखि अनुपम। एक पादे नाहि, एइ दोष 'भग्नक्रम'॥67॥ पाँच दोषोंके कारण श्लोककी महिमामें हानि :- यद्यपि एइ श्लोके आछे पञ्च अलङ्कार। एइ पञ्चदोषे श्लोक कैल छारखार॥68॥ अनुवाद-'विभवति' क्रियापर वाक्य सम्पूर्ण होता है, किन्तु पुनः विशेषण 'अद्भुतगुणा' का प्रयोग करना पुनरात्त दोष है। श्लोकके तीन पादोंमें-प्रथम पादमें 'त'कार, तृतीय पादमें 'र'कार और चतुर्थ पादमें 'भ'कार, ये अनुपम अनुप्रास देखता हूँ, किन्तु द्वितीय पादमें अनुप्रास नहीं है, यह 'भग्नक्रम' दोष है। यद्यपि इस श्लोकमें पाँच अलङ्कार हैं, तथापि इन पाँच दोषोंने श्लोकको नष्ट कर दिया है॥66-68॥ दश अलङ्कारे यदि एक श्लोक हय। एक दोषे सब अलङ्कार हय क्षय॥69॥ उपमा :- सुन्दर शरीर यैछे भूषणे भूषित। एक श्वेतकुष्ठे यैछे करये विगीत॥70॥ अनुवाद-एक श्लोकमें यदि दस अलङ्कार भी हों, तो भी केवलमात्र एक दोषके कारण सभी अलङ्कार नष्ट हो जाते हैं। भूषणोंसे भूषित सुन्दर शरीरमें जैसे एक श्वेतकुष्ठका दाग पूरे शरीरको निन्दित कर देता है॥70॥ अनुभाष्य-'विगीत'-निन्दित॥70॥ भरतमुनि-वाक्य :- रसालङ्कारवत् काव्यं दोषयुक्त चेद्विभूषितम्। स्याद्वपुः सुन्दरमपि श्वित्रेणैकेन दुर्भगम्॥71॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥71॥ अमृतप्रवाह भाष्य-विभूषित सुन्दर शरीर कुष्ठयुक्त होनेपर जिस प्रकार निन्दनीय होता है, रसालङ्कारयुक्त काव्य भी दोषयुक्त होनेपर वैसे ही निन्दित होता है॥71॥ अनुभाष्य-विभूषितं (समलङ्कृतं) सुन्दरं (मनोहरम्) अपि वपुः (शरीरं) यथा एकेन श्वित्रेण (श्वेताख्यकुष्ठरोगेण) दुर्भगं (श्री-रहितं मलिनं) स्यात्, तथा रसालङ्कारवत् (रसः शृङ्गारादिः अलङ्कारः अनुप्रासोपमादिः, ताभ्यां युक्तं) काव्यं (रसात्मकं वाक्यं) चेत् (यदि) दोषयुक्तं भवति, तथा दुर्भगं (श्रीहीनं) ज्ञेयम्। श्लोक भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥71॥ श्लोकके पाँच गुण :- पञ्च अलङ्कारेरे एबे शुनह विचार। दुइ शब्दालङ्कार, तिन अर्थ-अलङ्कार॥72॥ अनुवाद-अब आप इन पाँच अलङ्कारोंका विचार सुनिये, इसमें दो शब्दालङ्कार और तीन अर्थालङ्कार हैं॥72॥ पहला और दूसरा गुण-दोनों ही शब्दालङ्कार :- शब्दालङ्कारे-तिनपदे आछे अनुप्रास। 'श्रीलक्ष्मी'-शब्दे 'पुनरुक्तवदाभास'॥73॥ अनुवाद-तीन पदोंमें जो अनुप्रास हैं और 'श्रीलक्ष्मी' शब्दमें जो 'पुनरुक्तवदाभास' है, ये दो शब्दालङ्कार हैं॥73॥ प्रथम-चरणे पञ्च 'त'-कारेरे पाँति। तृतीय-चरणे हय पञ्च 'रेफ'-स्थिति॥74॥ सोलहवाँ अध्याय | 211