श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें17/168–177 ] उसके मुखसे वाणी नहीं निकल पायी। तब विचार करके काजीने अपनी पराजय स्वीकार करते हुए कहा,–"हे पण्डित ! आप जो कह रहे हैं, वह सत्य है। हमारे शास्त्र आधुनिक हैं और नित्य-वास्तव सत्यके प्रतिपादक नहीं हैं ॥ 168-169 ॥ अनुभाष्य–‘आधुनिक’—नवीन, कालके अन्तर्गत हैं, वेदोंके समान अपौरुषेय (किसी मनुष्यके द्वारा नहीं रचित) नहीं हैं। ‘विचार-सह नय’—नित्य-वास्तव सत्यके प्रतिपादक नहीं हैं और इसका युक्तिके द्वारा सहज ही खण्डन किया जा सकता है ॥ 169 ॥ कल्पित आमार शास्त्र, —आमि सब जानि। जाति-अनुरोधे तबु सेइ शास्त्र मानि ॥ 170 ॥ सहजे यवन-शास्त्रे अदृढ़ विचार।” हासि' ताहे महाप्रभु पुछेन आरबार ॥ 171 ॥ अनुवाद–मैं यह सब जानता हूँ कि हमारे शास्त्र कल्पित हैं, परन्तु सम्प्रदायमें निष्ठासे तब भी उन्हीं शास्त्रोंको मानता हूँ। यवन-शास्त्रका विचार स्वाभाविक रूपसे दृढ़ सिद्धान्तपर आधारित नहीं है।” यह सुनकर महाप्रभु हँसे और फिर पूछने लगे ॥ 170-171 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यवनशास्त्र तीन प्रकारके हैं—यहूदियोंकी पुरानी पोथी, कुरान और बाइबल। इन समस्त ग्रन्थोंके आदिकालका ज्ञान होता है, कोई भी वेदवाक्यके समान अनादि नहीं है। इसलिये इन सब शास्त्रोंमें जो विचार हैं, उनका मूल दृढ़ नहीं होकर सन्देहास्पद है ॥ 169-171 ॥ अनुभाष्य–‘कल्पित’—मनोधर्मसे प्रकटित, इसलिये नित्य सत्य नहीं है। ‘जाति’—सम्प्रदाय और उसमें निष्ठा। ‘अदृढ़ विचार’—जिसका युक्तिके द्वारा खण्डन किया जा सके ॥ 170-171 ॥ महाप्रभुके द्वारा पुनः प्रश्न :– “आर एक प्रश्न करि, शुन, तुमि मामा। यथार्थ कहिबे, छले ना वञ्चिबे आमा ॥ 172 ॥ तोमार नगरे हय सदा सङ्कीर्त्तन। वाद्यगीत-कोलाहल, सङ्गीत, नर्त्तन ॥ 173 ॥ तुमि काजी-हिन्दु-धर्म-विरोधे अधिकारी। एबे ये ना कर माना, बुझिते ना पारि ॥” 174 ॥ अनुवाद–“सुनो मामा ! मैं एक और प्रश्न कर रहा हूँ, उसका उत्तर सत्य-सत्य देना, कोई छल करके मुझे ठगना नहीं। वाद्य-गीतके कोलाहल, सङ्गीत और नृत्यके साथ तुम्हारे नगरमें सदा कीर्तन हो रहा है। तुम हिन्दू धर्मका विरोध करनेके लिये नियुक्त अधिकारी काजी हो, परन्तु तुम इस सबको निषेध क्यों नहीं करते हो, यह मैं समझ नहीं पा रहा हूँ॥” 172-174 ॥ उत्तरमें काजीकी अपने स्वप्नकी कहानी :– काजी बोले,—“सबे तोमाय बोले 'गौरहरि'। सेइ नामे आमि तोमाय सम्बोधन करि ॥ 175 ॥ शुन, गौरहरि, एइ प्रश्नेर कारण। निभृत हओ यदि, तबे करि निवेदन ॥” 176 ॥ अनुवाद–काजीने कहा,—“सब आपको 'गौरहरि' कहते हैं, मैं भी आपको उसी नामसे सम्बोधन करूँगा। हे गौरहरि ! इस प्रश्नका उत्तर यदि आप एकान्तमें मेरे साथ हों, तो मैं उसे निवेदन करूँ ॥” 175-176 ॥ महाप्रभुके द्वारा आश्वासन-दान :– प्रभु बोले,—“ए लोक आमार अन्तरङ्ग हय। स्फुट करि' कह तुमि, ना करिह भय ॥” 177 ॥ अनुवाद–महाप्रभुने कहा,—“ये लोग मेरे अन्तरङ्ग हैं, इसलिये तुम्हें जो कुछ कहना है, उसे स्पष्ट कहो, कोई भी भय मत करो॥” 177 ॥ अनुभाष्य–‘स्फुट’—स्पष्ट ॥ 177 ॥ सतरहवाँ अध्याय | 247