भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 784

[ 17/178-190 काजीके द्वारा स्वप्न-वृत्तान्तका वर्णन :- काजी कहे,—“यबे आमि हिन्दुर घरे गिया। कीर्त्तन करिलुँ माना मृदङ्ग भाङ्गिया॥ 178 ॥ स्वप्नमें नृसिंहदेवसे भय प्राप्ति :- सेइ रात्रे एक सिंह महाभयङ्कर। नरदेह, सिंहमुख, गर्ज्जये विस्तर ॥ 179 ॥ शयने आमार उपर लाफ दिया चड़ि'। अट्ट अट्ट हासे, करे दन्त-कड़मड़ि ॥ 180 ॥ मोर बुके नख दिया घोर-स्वरे बले। 'फाड़िमु तोमार बुक मृदङ्ग-बदले ॥ 181 ॥ मोर कीर्त्तन माना करिस्, करिमु तोर क्षय।' आँखि मुदि' काँपि आमि पाञा बड़ भय ॥ 182 ॥ अनुवाद—काजीने कहा, - “जिस दिन मैं हिन्दूके घर गया और कीर्त्तनके लिये मना किया तथा उसके मृदङ्गको भी तोड़ा था, उस रात्रिमें एक बहुत भयङ्कर सिंह, जिसका शरीर मनुष्यका था और मुख सिंहका था, बहुत जोरसे गर्जन करते हुए मेरे ऊपर कूदकर चढ़ गया। वह जोर-जोरसे हँसते हुए और दाँतोंको कड़कड़ाते हुए मेरी छातीपर अपने नख रखकर गम्भीर स्वरमें बोला, - 'मैं मृदङ्गके बदले तेरी छातीको फाड़ दूँगा। मेरे कीर्त्तनके लिये मना करता है, मैं तेरा सर्वनाश कर दूँगा।' मैंने डरकर आँखें मूँद लीं ॥ 178-182 ॥ अनुभाष्य- 'नरदेह, सिंहमुख'- श्रीनृसिंहदेव; ये भक्त, भक्ति और भगवान्‌के विद्वेष और विद्वेषियोंका विनाश करते हैं। 'फाड़िमु'-विदीर्ण करके फेंक दूँगा ॥ 179-181 ॥ भीत देखि' सिंह बले हइया सदय। 'तोरे शिक्षा दिते कैलु तोर पराजय ॥ 183 ॥ से दिन बहुत नाहि कैलि उत्पात। तेञि क्षमा करि, ना करिनु प्राणघात ॥ 184 ॥ ऐछे यदि पुनः कर, तबे ना सहिमु। सवंशे तोमारे आर यवन नाशिमु ॥ '185 ॥ अनुवाद-मुझे भयभीत देखकर सिंहको दया आ गयी और बोले, -'तुम्हें शिक्षा देनेके लिये मैंने तुम्हें पराजित किया है। उस दिन तुमने अधिक उत्पात नहीं किया था, इसलिये मैंने तुम्हें क्षमा करके तुम्हारे प्राण नहीं लिये हैं। ऐसे यदि तुम पुनः करोगे, तो मैं उसे सहन नहीं करूँगा और वंशसहित तुम्हारा और सभी यवनोंको नाश कर दूँगा ॥' 183-185 ॥ एत कहि' सिंह गेल, आमार हैल भय। एइ देख, नखचिह्न आमार हृदय ॥ ”186 ॥ अनुवाद-यह कहकर वह सिंह चला गया, परन्तु मैं बहुत डर गया हूँ। यह देखो, मेरे वक्षस्थलपर उसके नखचिह्न हैं॥”186 ॥ एत बलि' काजी निज-बुक देखाइल। शुनि' देखि' सर्वलोक आश्चर्य मानिल ॥ 187 ॥ अनुवाद-यह कहकर काजीने अपना वक्षस्थल दिखलाया। इस बातको सुनकर और नखचिह्न देखकर सभी आश्चर्यचकित हो गये॥ 187 ॥ काजी कहे,—“इहा आमि कारे ना कहिल। सेइ दिन एक आमार पियादा आइल ॥ 188 ॥ आसि' कहे, - 'गेलुँ मुञि कीर्त्तन निषेधिते। अग्नि उल्का मोर मुखे लागे आचम्बिते ॥ 189 ॥ पुड़िल सकल दाड़ि, मुखे हैल व्रण। येइ पेयादा याय, तार एइ विवरण ॥' 190 ॥ अनुवाद-काजीने कहा, - “इस बातको मैंने किसीसे नहीं कहा। उस दिन मेरा एक पियादा (सेवक) आया और आकर बोला, - 'मैं एक स्थानपर कीर्त्तनके लिये मना करनेके लिये गया था, तो अचानक ना जाने 248 | श्रीचैतन्यचरितामृत