श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें17/188-197 ] कहाँसे आगका एक उल्का मेरे मुखपर आ गिरा। उससे मेरी सारी दाढ़ी जल गयी और मुखपर छाले पड़ गये।' जो भी पियादा [कीर्त्तनके विरोधमें] जाता, उसके साथ भी ऐसा ही होता॥188-190॥ अनुभाष्य—'पियादा'—निम्न श्रेणीका सेवक, संवाद अथवा पत्र लेकर जानेवाला। साधारण भाषामें जिसे 'चपरासी' कहते हैं॥188॥ ताहा देखि' रहिनु मुञि महाभय पाञा। कीर्त्तन ना वर्ज्जिया घरे रहौं त' बसिया॥191॥ तबे त' नगरे हइबे स्वच्छन्दे कीर्त्तन। शुनि' सब म्लेच्छ आसि' कैल निवेदन॥192॥ 'नगरे हिन्दुर धर्म बाड़िल अपार। 'हरि' 'हरि' ध्वनि बइ नाहि शुनि आर॥'193॥ अनुवाद—ऐसा देखकर मैं बहुत भयभीत हो गया। मैंने सभी पियादोंको कीर्त्तन बन्द करानेके लिये कहीं भी जानेसे मना किया और उन्हें कहा कि वे केवल अपने घरोंमें बैठे रहें। यह सुनकर सब म्लेच्छ आकर निवेदन करने लगे—'तब तो नगरमें स्वच्छन्द रूपसे कीर्त्तन होगा। नगरमें हिन्दुओंका धर्म बहुत बढ़ गया है और 'हरि' 'हरि' के अतिरिक्त और कोई ध्वनि सुनायी नहीं देती॥'192-193॥ अनुभाष्य—'म्लेच्छ'— “गो-मांस-खादको यस्तु विरुद्धं बहु भाषते। सर्वाचारविहीनश्च म्लेच्छ इत्यभिधीयते॥” “जो गो-मांसको खानेवाला हो, शास्त्रके विरुद्ध बहुत बोलनेवाला हो तथा सम्पूर्ण आचारसे विहीन हो, उसे म्लेच्छ कहा जाता है॥”192॥ आर म्लेच्छ कहे,—'हिन्दु 'कृष्ण' 'कृष्ण' बलि'। हासे, कान्दे, नाचे, गाय, गड़ि याय धूलि॥194॥ 'हरि' 'हरि' करि' हिन्दु करे कोलाहल। पातसाह शुनिले तोमार करिबेक फल॥'195॥ अनुवाद—एक और म्लेच्छने कहा,—'हिन्दू तो 'कृष्ण' 'कृष्ण' बोलकर कभी हँसते, रोते, नाचते, गाते हैं और कभी भूमिपर लोटपोट करते हैं। 'हरि' 'हरि' कहकर हिन्दू कोलाहल कर रहे हैं। यदि बादशाह (पातसाह) यह सुनेगा, तो वह तुम्हें इसका फल चखायेगा॥194-195॥ अमृतप्रवाह भाष्य—बादशाह तुम्हारा स्वजन होनेपर भी तुम्हें दण्ड दे सकता है। बादशाह अर्थात् गौड़देशका बादशाह 'हुसैन' शाह॥195॥ अनुभाष्य—'पातसाह'—आलाउद्दीन सैयद हुसैन शाह (सन् 1498 ई. से 1521 ई. तक) बङ्गालका स्वाधीन राजा था। अपने संरक्षक और स्वामी हाब्सी-वंशके भीषण अत्याचारी नवाब मुज़फ़्फ़र खाँको मारकर वह स्वयं बङ्गालके सिंहासनपर बैठ गया। बङ्गालके सिंहासनपर बैठकर उसने 'सैयद हुसैन आलाउद्दीन शरीफ मक्का'-नाम धारण किया। 'रियाज उस्-सलातिन' नामक इतिहासके प्रणेता गुलाम हुसैनका कहना हैं कि नवाब हुसैन शाहके कोई पूर्वज मक्का-शरीफमें रहते थे, इसलिये लगता है कि अपने वंशके गौरवको स्मरण करके उसने यह नाम ग्रहण किया, तो भी गौड़के इतिहासमें वह 'हुसैन शाह' के नामसे ही परिचित है। उसकी मृत्युके बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र नसरत् शाह सन् 1521 ई. से 1533 ई. तक बङ्गालका नवाब बना। वह निष्ठुर प्रकृतिका नवाब वैष्णवोंपर निर्दयतापूर्वक अत्याचार करता था और अपने पापोंके फलस्वरूप अपने ही एक नपुंसक कर्मचारीके हाथों मस्जिदमें मारा गया॥195॥ तबे सेइ यवनेरे आमि त' पुछिल। 'हिन्दु 'हरि' बोले, तार स्वभाव जानिल॥196॥ तुमिह यवन हञा केने अनुक्षण। हिन्दुर देवतार नाम लह कि कारण॥'197॥ अनुवाद—तब मैंने उस यवनसे पूछा,—'हिन्दू तो 'हरि' बोलते हैं, यह उनका स्वभाव है। तुम यवन सतरहवाँ अध्याय | 249