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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

17/188-197 ] कहाँसे आगका एक उल्का मेरे मुखपर आ गिरा। उससे मेरी सारी दाढ़ी जल गयी और मुखपर छाले पड़ गये।' जो भी पियादा [कीर्त्तनके विरोधमें] जाता, उसके साथ भी ऐसा ही होता॥188-190॥ अनुभाष्य—'पियादा'—निम्न श्रेणीका सेवक, संवाद अथवा पत्र लेकर जानेवाला। साधारण भाषामें जिसे 'चपरासी' कहते हैं॥188॥ ताहा देखि' रहिनु मुञि महाभय पाञा। कीर्त्तन ना वर्ज्जिया घरे रहौं त' बसिया॥191॥ तबे त' नगरे हइबे स्वच्छन्दे कीर्त्तन। शुनि' सब म्लेच्छ आसि' कैल निवेदन॥192॥ 'नगरे हिन्दुर धर्म बाड़िल अपार। 'हरि' 'हरि' ध्वनि बइ नाहि शुनि आर॥'193॥ अनुवाद—ऐसा देखकर मैं बहुत भयभीत हो गया। मैंने सभी पियादोंको कीर्त्तन बन्द करानेके लिये कहीं भी जानेसे मना किया और उन्हें कहा कि वे केवल अपने घरोंमें बैठे रहें। यह सुनकर सब म्लेच्छ आकर निवेदन करने लगे—'तब तो नगरमें स्वच्छन्द रूपसे कीर्त्तन होगा। नगरमें हिन्दुओंका धर्म बहुत बढ़ गया है और 'हरि' 'हरि' के अतिरिक्त और कोई ध्वनि सुनायी नहीं देती॥'192-193॥ अनुभाष्य—'म्लेच्छ'— “गो-मांस-खादको यस्तु विरुद्धं बहु भाषते। सर्वाचारविहीनश्च म्लेच्छ इत्यभिधीयते॥” “जो गो-मांसको खानेवाला हो, शास्त्रके विरुद्ध बहुत बोलनेवाला हो तथा सम्पूर्ण आचारसे विहीन हो, उसे म्लेच्छ कहा जाता है॥”192॥ आर म्लेच्छ कहे,—'हिन्दु 'कृष्ण' 'कृष्ण' बलि'। हासे, कान्दे, नाचे, गाय, गड़ि याय धूलि॥194॥ 'हरि' 'हरि' करि' हिन्दु करे कोलाहल। पातसाह शुनिले तोमार करिबेक फल॥'195॥ अनुवाद—एक और म्लेच्छने कहा,—'हिन्दू तो 'कृष्ण' 'कृष्ण' बोलकर कभी हँसते, रोते, नाचते, गाते हैं और कभी भूमिपर लोटपोट करते हैं। 'हरि' 'हरि' कहकर हिन्दू कोलाहल कर रहे हैं। यदि बादशाह (पातसाह) यह सुनेगा, तो वह तुम्हें इसका फल चखायेगा॥194-195॥ अमृतप्रवाह भाष्य—बादशाह तुम्हारा स्वजन होनेपर भी तुम्हें दण्ड दे सकता है। बादशाह अर्थात् गौड़देशका बादशाह 'हुसैन' शाह॥195॥ अनुभाष्य—'पातसाह'—आलाउद्दीन सैयद हुसैन शाह (सन् 1498 ई. से 1521 ई. तक) बङ्गालका स्वाधीन राजा था। अपने संरक्षक और स्वामी हाब्सी-वंशके भीषण अत्याचारी नवाब मुज़फ़्फ़र खाँको मारकर वह स्वयं बङ्गालके सिंहासनपर बैठ गया। बङ्गालके सिंहासनपर बैठकर उसने 'सैयद हुसैन आलाउद्दीन शरीफ मक्का'-नाम धारण किया। 'रियाज उस्-सलातिन' नामक इतिहासके प्रणेता गुलाम हुसैनका कहना हैं कि नवाब हुसैन शाहके कोई पूर्वज मक्का-शरीफमें रहते थे, इसलिये लगता है कि अपने वंशके गौरवको स्मरण करके उसने यह नाम ग्रहण किया, तो भी गौड़के इतिहासमें वह 'हुसैन शाह' के नामसे ही परिचित है। उसकी मृत्युके बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र नसरत् शाह सन् 1521 ई. से 1533 ई. तक बङ्गालका नवाब बना। वह निष्ठुर प्रकृतिका नवाब वैष्णवोंपर निर्दयतापूर्वक अत्याचार करता था और अपने पापोंके फलस्वरूप अपने ही एक नपुंसक कर्मचारीके हाथों मस्जिदमें मारा गया॥195॥ तबे सेइ यवनेरे आमि त' पुछिल। 'हिन्दु 'हरि' बोले, तार स्वभाव जानिल॥196॥ तुमिह यवन हञा केने अनुक्षण। हिन्दुर देवतार नाम लह कि कारण॥'197॥ अनुवाद—तब मैंने उस यवनसे पूछा,—'हिन्दू तो 'हरि' बोलते हैं, यह उनका स्वभाव है। तुम यवन सतरहवाँ अध्याय | 249

[ 17/196-203 होकर सदा हिन्दुओंके देवताका नाम ले रहे हो, इसका क्या कारण है?'॥ 196-197॥ म्लेच्छ कहे,–'हिन्दुरे आमि करि परिहास। केह केह–कृष्णदास, केह–रामदास॥ 198॥ केह–हरिदास, सदा बले 'हरि' 'हरि'। जानि कार घरे धन करिबेक चुरि॥ 199॥ सेइ हैते जिह्वा मोर बले 'हरि' 'हरि'। इच्छा नाहि, तबु बले,–कि उपाय करि॥' 200॥ अनुवाद–म्लेच्छने कहा,–'मैंने हिन्दुओंसे परिहासमें कहा कि तुम लोग कोई कृष्णदास हो, कोई रामदास हो और कोई हरिदास हो। तुम सदा 'हरि' 'हरि' बोलते हो। लगता है कि किसीके घरमें चोरी करोगे? तबसे मेरी जिह्वा भी 'हरि' 'हरि' बोलने लगी। मेरी इच्छा नहीं है, तो भी यह बोलना नहीं छोड़ती है, मैं क्या उपाय करूँ?'॥ 198-200॥ आर म्लेच्छ कहे, शुन–'आमि त' एइमते। हिन्दुके परिहास कैनु से दिन हइते॥ 201॥ जिह्वा कृष्णनाम करे, ना माने वर्ज्जन। ना जानि, कि मन्त्रौषधि जाने हिन्दुगण॥' 202॥ अनुवाद–और एक म्लेच्छ कहने लगा,–'सुनो! मैंने भी जिस दिनसे इसी प्रकार हिन्दुओंसे परिहास किया था, उसी दिनसे मेरी जिह्वा भी कृष्णनाम करने लगी है और अब यह मेरे बहुत रोकनेपर भी रुकती नहीं है। न जाने ये हिन्दू कौनसी मन्त्रौषधि जानते हैं?'॥ '201-202॥ अमृतप्रवाह भाष्य–काजीने कहा,–"हे गौरहरि! मैंने जिस भी म्लेच्छ पियादेसे पूछा, उसने यही उत्तर दिया,–मैंने हिन्दुओंको कहा, 'तुम लोग कोई कोई 'कृष्णदास', 'रामदास', 'हरिदास'–इस नामके परिचयसे 'हरि' 'हरि' बोलते हो, किन्तु 'हरि' 'हरि' शब्दका अर्थ तो 'चोरी करता हूँ' 'चोरी करता हूँ' होता है। ऐसा लगता है कि दूसरोंके घरोंसे धन चोरी करनेके अभिप्रायसे 'हरि' 'हरि' ('हरण करूँ' 'हरण करूँ') ऐसा कहते हो।' मैंने जिस दिनसे उनके साथ यह परिहास किया, उस दिनसे मेरी जिह्वा इच्छा न होनेपर भी 'हरि' 'हरि' बोल रही है, मैं इसे रोकनेका कोई उपाय नहीं कर पा रहा हूँ॥" 196-202॥ अनुभाष्य–'परिहास'–चार प्रकारके नामाभासोंमें एक। जैसे, (भाः 6/2/14)– “साङ्केत्यं पारिहास्यं वा स्तोभं हेलनमेव वा। वैकुण्ठनामग्रहणमशेषाघहरं विदुः॥” “सङ्केत (दूसरी वस्तुको लक्ष्य करके भगवन्नाम उच्चारण), परिहास (उपहासपूर्वक नामोच्चारण), स्तोभ (तिरस्कारपूर्वक नामोच्चारण) और हेला (अनादरपूर्वक नामोच्चारण), ये चार छाया नामाभास हैं, विद्वान लोग ऐसे नामाभासको समस्त पापोंका नाशक मानते हैं।” क्योंकि इनका उच्चारण जड़ीय अक्षर-उच्चारणमात्र नहीं है। नामाभास नित्य-वास्तव वस्तुको लक्ष्य करके विष्णुकी स्मृति जाग्रत कराता है, यह जीवोंकी विषय-वासनाओंका विनाश करता है और इसके फलस्वरूप सेवोनमुख मुक्तजीवोंके द्वारा उच्चारित शुद्ध नाममें बद्धजीवका अधिकार उदित होता है॥ 198-202॥ काजीसे स्मार्त्त पाखण्डियोंका अभियोग :– एत शुनि' ता सभारे घरे पाठाइल। हेनकाले पाषण्डी हिन्दु पाँच-सात आइल॥ 203॥ अनुवाद–यह सुनकर मैंने उन सबको अपने घरोंमें भेज दिया। तब पाँच-सात पाषण्डी हिन्दू मेरे पास आये॥ 203॥ अनुभाष्य–'पाषण्डी'–सांसारिक कर्मोंमें श्रद्धा रखनेवाले, अनेक ईश्वरोंको माननेवाले और विष्णु-वैष्णव-द्वेषी मूर्त्तिपूजक (श्रीविग्रहमें काष्ठ-पत्थरकी बुद्धि रखनेवाले)॥ 203॥ 250 | श्रीचैतन्यचरितामृत

17/204-212 ] आसि' कहे, - 'हिन्दुर धर्म भाङ्गिला निमाञि। ये कीर्त्तन प्रवर्त्ताइल, कभु शुनि नाइ॥ 204 ॥ मङ्गलचण्डी, विषहरि करि जागरण। तांते नृत्य, गीत, वाद्य - योग्य आचरण॥ 205 ॥ पूर्वे भाल छिल एइ निमाइ पण्डित। गया हैते आसिया चालाय विपरीत॥ 206 ॥ उच्च करि' गाय गीत, देय करतालि। मृदङ्ग-करताल-शब्दे कर्णे लागे तालि॥ 207 ॥ न जानि, -कि खाञा मत्त हञा नाचे, गाय। हासे, कान्दे, पड़े, उठे, गड़ागड़ि याय॥ 208 ॥ नगरिया पागल कैल सदा सङ्कीर्त्तन। रात्रे निद्रा नाहि याइ, करि जागरण॥ 209 ॥ अनुवाद - उन्होंने आकर कहा, - 'निमाइने हिन्दुओंके धर्मको नष्ट कर दिया है। उसने जिस प्रकारका कीर्त्तन प्रारम्भ किया है, उसे तो हमने पहले कभी सुना नहीं है। हम जो मङ्गलचण्डी, शङ्करादिका जागरण करते हैं, उसमें तो वाद्यादिके साथ नृत्य-गीत हिन्दुओंके लिये उचित है। निमाइ पण्डित पहले तो बहुत अच्छा था, परन्तु गयासे आनेके बाद यह विपरीत चाल चलने लगा है। निमाइ और उसके सङ्गी हाथोंसे ताली बजाते हुए ऊँचे स्वरमें गीत गाते हैं और साथमें मृदङ्ग-करतालादि भी बजते हैं। उनके शोरसे तो कानमें कुछ और सुनायी ही नहीं देता। न जाने क्या खाकर (क्या किसी मादक द्रव्यका पानकर) मत्त होकर नाचते, गाते हैं, हँसते हैं, रोते हैं, गिरते हैं, उठते हैं और भूमिपर लोट-पोट होते हैं। निमाइके सङ्कीर्त्तनने तो सारे नगरवासियोंको पागल बना दिया है। उनके सङ्कीर्त्तनसे हमें रातमें नींद नहीं आती, हम तो जागरण करते हैं॥ 204-209 ॥ 'निमाञि' नाम छाड़ि' एबे बोलाय 'गौरहरि'। हिन्दुर धर्म नष्ट कैल पाषण्डी सञ्चारि' ॥ 210 ॥ कृष्णेर कीर्त्तन करे नीच बाड़ बाड़। एइ पापे नवद्वीप हइबे उजाड़॥ 211 ॥ अनुवाद - अब वह अपना 'निमाइ' नाम छोड़कर अपनेको 'गौरहरि' कहता है और पाषण्डताका प्रचारकर हिन्दू धर्मको नष्ट कर रहा है। अब तो इसके साथ श्रीकृष्णनामके कीर्त्तनमें (जिनका कीर्त्तनमें अधिकार नहीं है, ऐसे) नीच जातिके लोग बढ़ रहे हैं, इस पापसे तो नवद्वीप उजड़ जायेगा॥ 210-211 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'नीच बाड़बाड़'-अनेक नीच जातिके लोगोंको लेकर श्रीकृष्णकीर्त्तन कर रहा है, इससे नीच जातिकी बाढ़ अर्थात् वृद्धि हो रही है॥ 211 ॥ हिन्दुशास्त्रे 'ईश्वर' नाम - महामन्त्र जानि। सर्वलोक शुनिले मन्त्रेर वीर्य हय हानि॥ 212 ॥ अनुवाद - हिन्दू शास्त्रोंमें ईश्वरके नामको महामन्त्र बतलाया गया है, [उच्च स्वरसे कीर्त्तन करनेपर] सभी लोगोंके द्वारा मन्त्र सुननेपर मन्त्रकी शक्ति लुप्त हो जाती है॥ 212 ॥ अनुभाष्य - अनेक ईश्वरोंको माननेवाले ईश्वरको और ईश्वरके नामको 'कर्मका अङ्ग' समझते हैं, इसलिये वे 'पाषण्डी' कहलाते हैं। श्रीकृष्णनामकी महान् औदार्यमयी महिमाको न जाननेके कारण सांसारिक उच्च-कुलमें जन्म और सामाजिक पदवीके मोहमें भूलकर वे सोचते हैं कि नीच अर्थात् नीच-कुलमें उत्पन्न व्यक्तिके द्वारा श्रीकृष्णनाम ग्रहण करना विशेष पापका कार्य है। इसलिये सत्कुल अथवा उच्चकुलमें जन्में व्यक्तिका ही श्रीकृष्णनाम ग्रहण करनेमें अधिकार है। ये सब बहु-ईश्वरवादी सदा कीर्त्तनीय श्रीकृष्णनाम-महामन्त्रको अन्यान्य जप्यमन्त्रोंके समान मानते हैं। जो अपने अद्वितीय परमैश्वर्यको प्रकाशित करके ब्रह्मासे लेकर चींटीतकका उद्धार करनेकी शक्ति रखता है, ऐसे महामन्त्रका उच्च-स्वरसे कीर्त्तन करनेपर सतरहवाँ अध्याय | 251

[ 17/211-221 उसके हठात् ही जिह्वा और कानोंपर अवतीर्ण होनेपर वह स्वयं निष्फल हो जाता है—इन लोगोंका ऐसा मानना है। अहो! प्रत्यक्ष ज्ञानको ही सर्वोच्च ज्ञान माननेवाले ये लोग श्रौतपन्थाके इतने अधिक विरोधी हैं!!॥ 211-212॥ ग्रामेर ठाकुर तुमि, सब तोमार जन। निमाइ बोलाइया तारे करह वर्ज्जन॥'213॥ अनुवाद—आप तो इस ग्रामके स्वामी हैं और हम सभी आपकी प्रजा हैं। इसलिये आप कृपाकर निमाइको बुलाकर उसे निष्कासित कर दीजिये॥'213॥ अनुभाष्य—इसके बाद उन्होंने काजीसे कहा, —'आप इस स्थानके सर्वस्व कर्त्ता-धर्त्ता हैं, ग्रामके सभी लोग आपके अधीन हैं, इसलिये आप निमाइ पण्डितको अपने पास बुलाकर उसे निष्कासित कर दो॥'213॥ काजीके द्वारा उनको सान्त्वना-प्रदान :— तबे आमि प्रीतिवाक्य कहिल सबारे। 'सबे घरे याह, आमि निषेधिव तारे॥'214॥ अनुवाद—उनकी प्रार्थना सुनकर मैंने उन सबसे प्रीतिपूर्वक कहा, —'आप सभी अपने-अपने घर जाँय, मैं निमाइको सङ्कीर्त्तनके लिये मना कर दूँगा॥'214॥ महाप्रभुके प्रति काजीकी उक्ति :— हिन्दुर ईश्वर बड़ येइ नारायण। सेइ तुमि हओ,—हेन लय मोर मन॥'215॥ अनुवाद—हिन्दुओंके सबसे बड़े ईश्वर जो नारायण हैं, मेरा मन कहता है कि तुम वही हो॥'215॥ महाप्रभुकी कृपापूर्ण उक्ति :— एत शुनि' महाप्रभु हासिया हासिया। कहिते लागिला प्रभु काजीरे छुँइया॥ 216॥ नामाभाससे पापक्षय :— “तोमार मुखे कृष्णनाम,—ए बड़ विचित्र। पापक्षय गेल, हैला परम पवित्र॥ 217॥ 'हरि' 'कृष्ण' 'नारायण'—लैले तिन नाम। बड़ भाग्यवान् तुमि, बड़ पुण्यवान्॥'218॥ अनुवाद—ऐसा सुनकर महाप्रभु हँसते-हँसते काजीको स्पर्श करके कहने लगे, —“यह बड़ी ही विचित्र बात है कि तुम्हारे मुखसे कृष्णनाम निकल रहा है। इस कृष्णनामसे तुम्हारे समस्त पाप नष्ट हो गये हैं तथा तुम परम पवित्र हो गये हो। तुमने 'हरि', 'कृष्ण' और 'नारायण'—इन तीन नामोंका उच्चारण किया है। तुम बहुत ही भाग्यवान् और पुण्यवान् हो॥"216-218॥ अनुभाष्य—काजीके मुखमें नामाभास उदित हुआ था॥217-218॥ काजीकी दैन्योक्ति :— एत शुनि' काजीर दुइ चक्षे पड़े पानि। प्रभुर चरण छुँइ बले प्रियवाणी॥ 219॥ “तोमार प्रसादे मोर घुचिल कुमति। एइ कृपा कर,—येन तोमाते रहु भक्ति॥"220॥ अनुवाद—ऐसा सुनकर काजीके दोनों नेत्रोंसे अश्रु प्रवाहित होने लगे और वह महाप्रभुके चरणकमलोंको स्पर्श करके प्रियवाणी कहने लगा, —“आपकी कृपासे मेरी कुमति दूर हो गयी है। अब आप मुझपर ऐसी कृपा करें जिससे मेरे हृदयमें आपके प्रति भक्ति रहे॥"220॥ महाप्रभुकी उक्ति :— प्रभु कहे, —“एक दान मागिये तोमाय। सङ्कीर्त्तन बाद यैछे नहे नदीयाय॥"221॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, —“मैं आपसे एक दान माँगता हूँ कि नदियामें सङ्कीर्त्तनमें कभी भी बाधा न हो॥'221॥ अनुभाष्य—जिससे नवद्वीपमें श्रीकृष्णनाम-कीर्त्तनमें कोई बाधा न हो॥ 221॥ 252 | श्रीचैतन्यचरितामृत

17/222–229 ] काजीकी प्रतिज्ञा :- काजी कहे,–“मोर वंशे यत उपजिवे। ताहाके ‘तालाक’ दिब,—कीर्त्तन ना बाधिबे॥” 222॥ अनुवाद—काजीने कहा,—“मेरे वंशमें जो भी उत्पन्न होंगे, मैं उन सबको प्रतिज्ञा करवा दूँगा कि वे कीर्त्तनमें किसी भी प्रकारकी बाधा उत्पन्न नहीं करेंगे॥” 222॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘तालाक’—गम्भीररूपसे की गयी जो प्रतिज्ञा॥ 222॥ अनुभाष्य—आज भी काजीके वंशधर श्रीकृष्णसङ्कीर्त्तनमें योगदान करते हैं, वे किसी भी प्रकारकी कोई आपत्ति नहीं करते हैं॥ 222॥ महाप्रभु और भक्तोंमें हर्ष :- शुनि प्रभु ‘हरि’ बलि’ उठिला आपनि। उठिल वैष्णव सब करि’ हरिध्वनि॥ 223॥ भक्तोंके साथ महाप्रभुका घर लौटना :- कीर्त्तन करिते प्रभु करिला गमन। सङ्गे चलि’ आइसे काजी उल्लसित मन॥ 224॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभु ‘हरि-हरि’ बोलते हुए उठकर खड़े हो गये। सभी वैष्णव भी ‘हरि-हरि’ ध्वनि करते हुये उठ गये। कीर्त्तन करते हुए महाप्रभु वहाँसे चले और काजी भी बड़े उल्लासके साथ उनके सङ्ग चलने लगा॥ 223-224॥ काजीरे विदाय दिल शचीर नन्दन। नाचिते नाचिते आइला आपन भवन॥ 225॥ अनुवाद—थोड़ी दूर चलनेपर शचीनन्दन श्रीगौरहरिने काजीको विदायी दी। काजी नाचते-नाचते अपने भवनमें लौट आया॥ 225॥ एइ मते काजीरे प्रभु करिला प्रसाद। इहा येइ शुने तार खण्डे अपराध॥ 226॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने काजीपर कृपा की। जो व्यक्ति इस कथाको श्रद्धापूर्वक सुनता है, उसके सभी अपराध नष्ट हो जाते हैं॥ 226॥ श्रीवास-भवनमें महाप्रभुके कीर्त्तनके समय श्रीवास पण्डितके पुत्रका देहत्याग :- एक दिन श्रीवासेर मन्दिरे गोसाञि। नित्यानन्द-सङ्गे नृत्य करे दुइ भाइ॥ 227॥ श्रीवास-पुत्रेरे ताँहा हैल परलोक। तबु श्रीवासेर चित्ते ना जन्मिल शोक॥ 228॥ अनुवाद—एक दिन श्रीचैतन्य गोसाईं और श्रीनित्यानन्द प्रभु, दोनों भाई श्रीवास पण्डितके मन्दिरमें नृत्य कर रहे थे। उसी समय श्रीवास पण्डितका पुत्र परलोक सिधार गया। ऐसा होनेपर भी श्रीवास पण्डितके चित्तमें किसी प्रकारका शोक उत्पन्न नहीं हुआ॥ 227-228॥ मृतपुत्रके मुखसे तत्त्वकथा :- मृतपुत्र-मुखे कैल ज्ञानेर कथन। आपने दुइ भाइ हैला श्रीवास-नन्दन॥ 229॥ अनुवाद—महाप्रभुने उस मृत पुत्रके मुखसे ज्ञानकी कथा कहलवायी। तब महाप्रभुने श्रीवास पण्डितसे कहा कि हम दोनों भाइयों (मुझे और नित्यानन्द प्रभु) को अपना पुत्र ही समझो॥ 229॥ अमृतप्रवाह भाष्य—एक रात महाप्रभु श्रीवास-अङ्गनमें कीर्त्तन कर रहे थे, उसी समय श्रीवास पण्डितके एक पुत्र परलोक सिधार गये। श्रीवास पण्डितने कीर्त्तनका रसभङ्ग होनेके भयसे सभीको शोक प्रकाशित करनेसे निषेध किया और महाप्रभु बहुत रात तक कीर्त्तन करते रहे। कीर्त्तन समाप्त होनेपर महाप्रभु समझ गये कि इस घरपर कोई विपत्ति आयी है। श्रीवासके पुत्रकी मृत्युका संवाद सुनकर पहले तो महाप्रभुने देरीसे संवाद देनेके लिये दुःख प्रकट किया और मृत बालकसे सभीके सम्मुखस्थ करवाकर पूछा,—“ओहे बालक ! तुमने श्रीवासका क्यों परित्याग किया ?” मृत बालकने कहा,—“मेरा सतरहवाँ अध्याय | 253

[ 17/228-237 जितने दिन तक श्रीवासके घरमें रहना निर्धारित था, वह समाप्त होनेपर अब मैं आपकी इच्छासे अन्य स्थानपर जा रहा हूँ। मैं आपका नित्य अनुगत परतन्त्र जीव हूँ—आपकी इच्छाके अतिरिक्त और कुछ करनेका मुझे अधिकार नहीं है।” मृत बालकके मुखसे इन वचनोंको सुनकर श्रीवास पण्डितके परिवारवालोंको दिव्य ज्ञानकी प्राप्ति हुई और उनको कोई शोक नहीं रहा। इसके बाद उन्होंने मृत बालकका संस्कार किया। महाप्रभुने श्रीवासको कहा, —‘जो तुम्हारा पुत्र था, वह तुम्हें छोड़कर चला गया। मैं और नित्यानन्द–तुम्हारे नित्यपुत्र हैं, हम तुम्हें कभी भी नहीं छोड़ पायेंगे।'॥ 229॥ अनुभाष्य—चैःभाः मध्यखण्ड, पच्चीसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥ 228-229॥ श्रीवासकी भतीजी नारायणीको अपना उच्छिष्ट-प्रदान :- तबे त' करिला सब भक्ते वर दान। उच्छिष्ट दिया नारायणीर करिल सम्मान॥ 230॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने सभी भक्तोंको वरदान दिया और नारायणीको अपना उच्छिष्ट प्रदान करके कृतार्थ किया॥ 230॥ अनुभाष्य—चैःभाः मध्यखण्ड, दसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है। कोई-कोई चरित्रहीन पाषण्ड-प्रकृतिके प्राकृतसहजिया लोग प्राकृत बुद्धि होनेके कारण श्रील वृन्दावनदासकी निन्दा और उनसे द्वेष करनेके कारण ऐसा कहते हैं,—'महाप्रभुके उच्छिष्ट अथवा ताम्बुल खानेके फलस्वरूप विधवा अवस्थामें श्रीमती नारायणीदेवीसे श्रीवृन्दावनदास ठाकुरका जन्म हुआ था।' ऐसी निन्दनीय बात नितान्त अपराधमय है, इसलिये यह कभी भी सुनने योग्य नहीं है॥ 230॥ यवनकुलमें उत्पन्न दर्जीका महाप्रभुका रूपदर्शन और उन्माद :- श्रीवासेर वस्त्र सिये दरजी यवन। प्रभु तारे कराइल निजरूप दर्शन॥ 231॥ 'देखिनु' 'देखिनु' बलि' हइल पागल। प्रेमे नृत्य करे, हैल वैष्णव आगल॥ 232॥ अनुवाद—श्रीवासके वस्त्र सिलनेवाला दर्जी यवन था, उसे महाप्रभुने अपने रूपके दर्शन कराये। 'मैंने देखा है', 'मैंने देखा है', यह कहते-कहते वह पागलसा हो गया। प्रेममें पागल होकर वह नृत्य करने लगा और वह श्रेष्ठ वैष्णव बन गया॥ 231-232॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीवासके घरके निकट रहनेवाला कोई एक यवन दर्जी उनके वस्त्र सिलता था। वह श्रद्धापूर्वक महाप्रभुका नृत्य देखकर मन्त्र-मुग्ध हो गया, महाप्रभुने उसे अपने रूपके चिन्मय-भावका दर्शन कराया। वह दर्जी 'मैंने देखा है! मैंने देखा है!' ऐसा कहते हुए प्रेममें पागल होकर नृत्य करने लगा। 'आगल' - अग्रगण्य॥ 231-232॥ महाप्रभुकी इच्छानुसार श्रीवासका मधुर श्रीकृष्णलीला-वर्णन :- आवेशेते महाप्रभु वंशी त' मागिल। श्रीवास कहे, —“वंशी तोमार गोपी हरि' निल॥" 233॥ अनुवाद—एक समय व्रजभावके आवेशमें महाप्रभुने अपनी वंशी माँगी, तब श्रीवास पण्डितने कहा,—“आपकी वंशी तो गोपियोंने चुरा ली है॥" 233॥ शुनि' प्रभु 'बल' 'बल' बलेन आवेशे। श्रीवास वर्णन वृन्दावन-लीलारसे॥ 234॥ प्रथमेते वृन्दावन-माधुर्य वर्णिल। शुनिया प्रभुर चित्ते आनन्द बाड़िल॥ 235॥ तबे 'बल' 'बल' प्रभु बले बारबार। पुनः पुनः कहे श्रीवास करिया विस्तार॥ 236॥ वंशीवाद्ये गोपीगणेरे वने आकर्षण। ताँ-सबार सङ्गे यैछे वन-विहरण॥ 237॥ 254 | श्रीचैतन्यचरितामृत

17/234-244 ] ताहि मध्ये छयऋतुर लीलार वर्णन। मधुपान, रासोत्सव, जलकेलि कथन॥ 238 ॥ ‘बल’ ‘बल’ बले प्रभु शुनिते उल्लास। श्रीवास कहेन तबे रास-विलास॥ 239 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभु आवेशमें ‘बोलो’, ‘बोलो’ कहने लगे। श्रीवास पण्डित वृन्दावनकी रसमयी लीलाओंका वर्णन करने लगे। उन्होंने पहले वृन्दावनके माधुर्यका वर्णन किया। जिसे सुनकर महाप्रभुका चित्त अत्यधिक आनन्दित हो गया। तब महाप्रभु बार-बार ‘बोलो’, ‘बोलो’ कहने लगे। श्रीवास पण्डित पुनः-पुनः विस्तारपूर्वक वृन्दावनकी कथाका वर्णन करने लगे। श्रीकृष्णने कैसे वंशीकी ध्वनिके द्वारा गोपियोंको वनमें आकर्षण करके उनके साथ किस प्रकार वनमें विहार किया। उस विहारके समय छह ऋतुओंमें की गयी लीलाओंका श्रीवासने वर्णन किया [श्रीकृष्णकी इच्छानुसार वृन्दादेवीकी आज्ञासे लीलारसके वर्धनके लिये छहों ऋतुओंने भिन्न-भिन्न वनोंमें एक ही समयमें अपने-अपने प्रभावका विस्तार किया। इस प्रकार श्रीकृष्णने गोपियोंके साथ एक वनसे दूसरे वनमें विहार करते हुए उन सभी ऋतुओंके अनुरूप लीलाओंका रसास्वादन किया]। और मधुपान, रासोत्सव तथा जलकेलिकी लीलाओंका भी गान किया। महाप्रभुके मनमें ये लीलाएँ सुनकर बहुत उल्लास हुआ और उन्होंने श्रीवाससे रास-विलासका वर्णन करनेके लिये कहा॥ 234-239 ॥ अनुभाष्य—श्रीवास पण्डितके द्वारा व्रजकी गोपियोंके साथ श्रीकृष्णके मधुर (शृंगार) रसका वर्णन विशेषरूपसे लक्ष्य करनेका विषय है॥ 235-239 ॥ कहिते, शुनिते ऐछे प्रातःकाल हैल। प्रभु श्रीवासेरे तोषि’ आलिङ्गन कैल॥ 240 ॥ अनुवाद—इस प्रकार कहते-सुनते प्रातःकाल हो गया। महाप्रभुने परम प्रसन्न होकर श्रीवास पण्डितका आलिङ्गन किया॥ 240 ॥ आचार्यरत्नके घर महाप्रभुका लक्ष्मीवेशमें नृत्य :— तबे आचार्येर घरे कैल कृष्णलीला। रुक्मिण्यादि-रूप प्रभु याते आपने हैला॥ 241 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने श्रीचन्द्रशेखर आचार्यके घरमें श्रीकृष्णलीलाका अभिनय किया। महाप्रभुने स्वयं ही श्रीरुक्मिणी आदिके रूपको धारण किया॥ 241 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—एक रात्रि श्रीचन्द्रशेखर आचार्यरत्नके घरमें महाप्रभुने रुक्मिणी आदिके रूपको धारण करके एक लीलाका अभिनय किया था। उसमें श्रीअद्वैताचार्य, श्रीहरिदासादि अनेकोंको नाना वेशोंमें सजाया था॥ 241 ॥ अनुभाष्य—रुक्मिणीभावमें और वेशमें महाप्रभुका प्रसङ्ग चैःभाः मध्यखण्ड, अठारहवें अध्यायमें द्रष्टव्य है॥ 241 ॥ कभु दुर्गा, लक्ष्मी हय, कभु वा चिच्छक्ति। खाटे बसि’ भक्तगणे दिल प्रेमभक्ति॥ 242 ॥ अनुवाद—महाप्रभु कभी दुर्गा, कभी लक्ष्मी और कभी चित्शक्ति बन जाते। तब महाप्रभुने सिंहासनपर बैठकर सभी भक्तोंको प्रेमदान किया॥ 242 ॥ अनुभाष्य—आद्याशक्तिके वेशमें महाप्रभुके द्वारा भक्तोंको स्तनपान कराना और प्रेमभक्ति प्रदान करनेका प्रसङ्ग चैःभाः मध्यखण्ड, अठारहवें अध्यायमें द्रष्टव्य है॥ 242 ॥ ब्राह्मणीके द्वारा महाप्रभुके चरणस्पर्श करनेपर महाप्रभुका गङ्गामें स्नान :— एकदिन महाप्रभुर नृत्य-अवसाने। एक ब्राह्मणी आसि’ धरिल चरणे॥ 243 ॥ चरणेर धूलि सेइ लय बार बार। देखिया प्रभुर दुःख हइल अपार॥ 244 ॥ सतरहवाँ अध्याय | 255

[ 17/243-255 सेइक्षणे धाञा प्रभु गङ्गाते पड़िल। नित्यानन्द-हरिदास धरि' उठाइल ॥ 245 ॥ विजय आचार्येर घरे से रात्रे रहिला। प्रातःकाले भक्त सबे घरे लञा गेला ॥ 246 ॥ अनुवाद-एक दिन महाप्रभुके नृत्यके अन्तमें एक ब्राह्मणीने आकर उनके चरणोंको पकड़ लिये। वह ब्राह्मणी बार-बार उनके चरणोंकी धूलिको लेने लगी, उसको ऐसा करते देखकर महाप्रभुको बहुत दुःख हुआ। उसी समय महाप्रभु दौड़कर गङ्गामें जाकर कूद पड़े। श्रीनित्यानन्द प्रभु तथा श्रीहरिदास ठाकुरने जाकर उन्हें बाहर निकाला। उस रात्रि महाप्रभु विजय आचार्यके घर पर ही रहे। प्रातःकाल सभी भक्त उन्हें घर ले गये॥ 243-246 ॥ अनुभाष्य-इस घटनाका चैतन्यभागवतमें वर्णन नहीं है॥ 243-246 ॥ उच्चस्वरमें 'गोपी' 'गोपी' पुकारते हुए महाप्रभु :- एकदिन गोपीभावे गृहेते बसिया। 'गोपी' 'गोपी' नाम लय विषण्ण हञा ॥ 247 ॥ अनुवाद-एक दिन अपने घरमें बैठे हुए महाप्रभु गोपीभावमें आविष्ट होकर दुःखित हृदयसे 'गोपी' 'गोपी' पुकार रहे थे॥ 247 ॥ मर्म-अनभिज्ञ पाषण्डी छात्रका महाप्रभुको मना करना :- एक पड़ुया आइल प्रभुके देखिते। 'गोपी' 'गोपी' नाम शुनि' लागिल बलिते ॥ 248 ॥ “कृष्णनाम ना लओ केने, कृष्णनाम-धन्य। 'गोपी' 'गोपी' बलिले वा किवा हय पुण्य ॥"249 ॥ अनुवाद-उस समय एक छात्र महाप्रभुसे मिलने आया और महाप्रभुके मुखसे 'गोपी' 'गोपी' नाम सुनकर वह कहने लगा,- “आप कृष्णनाम क्यों नहीं लेते? कृष्णनाम तो परम धन्य है। 'गोपी' 'गोपी' कहनेसे क्या कोई पुण्य होता है? ॥" 249 ॥ प्रहार करनेके लिये महाप्रभुका उसके पीछे दौड़ना; छात्रका भागना :- शुनि' प्रभु क्रोधे कैल कृष्णे दोषोद्गार। ठेङ्गा लञा उठिला प्रभु पड़ुया मारिबार ॥ 250 ॥ अनुवाद-उसकी बात सुनकर महाप्रभु क्रोधित होकर श्रीकृष्णके दोषोंका वर्णन करने लगे और लाठी लेकर छात्रको मारनेके लिये उठ खड़े हुए॥ 250 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'दोषोद्गार' - परिहासपूर्वक दोषारोपण ॥ 250 ॥ भये पलाय पड़ुया, प्रभु पाछे पाछे धाय। आस्ते व्यस्ते भक्तगण प्रभुरे रहाय ॥ 251 ॥ अनुवाद-वह छात्र डरकर भागा और महाप्रभु उसके पीछे दौड़े। जैसे-तैसे करके भक्तोंने महाप्रभुको रोका ॥ 251 ॥ महाप्रभुको सान्त्वना :- प्रभुरे शान्त करि' आनिल निज घरे। पड़ुया पलाया गेल पड़ुया-सभारे ॥ 252 ॥ छात्रसमाजमें महाप्रभुके प्रति कटु बातें और क्रोध :- पड़ुया सहस्र याहाँ पड़े एकठाञि। प्रभुर वृत्तान्त द्विज कहे ताहाँ याइ ॥ 253 ॥ अनुवाद-भक्त महाप्रभुको शान्त करके उनके घरपर ले आये। वह छात्र भागकर छात्रोंकी सभांमें जा पहुँचा जहाँ एक साथ सैकड़ों छात्र पढ़ रहे थे। उस ब्राह्मण छात्रने उस सभामें महाप्रभुका वृत्तान्त सुनाया ॥ 252-253 ॥ शुनि' क्रोध कैल सब पड़ुयार गण। सबे मेलि' करे तब प्रभु निन्दन ॥ 254 ॥ “सब देश भ्रष्ट कैल एकला निमाञि। ब्राह्मण मारिते चाहे, धर्मभय नाञि ॥ 255 ॥ 256 | श्रीचैतन्यचरितामृत

17/254-259 ] महाप्रभुपरे प्रहार करनेके लिये षड्यन्त्र :- पुनः यदि ऐछे करे, मारिब ताहारे। कोन् वा मानुष हय, कि करिते पारे ॥ "256 ॥ अनुवाद-ऐसा सुनकर सभी छात्र क्रोधित हो गये और सभी मिलकर महाप्रभुकी निन्दा करने लगे, - "अकेले निमाइने सारे देशको भ्रष्ट कर दिया है। वह ब्राह्मणको मारना चाहता है, उसे धर्मका कोई भी भय नहीं है। यदि फिर कभी वह ऐसा करनेका प्रयास करेगा, तो हम भी उसे मारेंगे। वह कोई भी हो, वह हमारा क्या बिगाड़ लेगा? ॥ "254-256 ॥ महाप्रभुसे ईर्ष्या करनेके फलस्वरूप उनकी विद्या-बुद्धि-लुप्त :- प्रभुर निन्दाय सबार बुद्धि हैल नाश। सुपठित विद्या कारओ ना हय प्रकाश ॥ 257 ॥ अनुवाद-महाप्रभुकी निन्दा करनेसे उन सबकी बुद्धि नष्ट हो गयी और उनकी भली-भाँति पढ़ी हुई विद्या विस्मृत हो गयी ॥ 257 ॥ अनुभाष्य-क्योंकि, (श्वेताश्वर उपनिषद्में)— “यस्य देवे पराभक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥” “जिसकी, परदेवता विष्णुके प्रति जैसी, उनके प्रिय श्रीगुरुदेवके प्रति भी वैसी परमा (अहैतुकी और निरन्तर) भक्ति है, उसी महात्माके शुद्धचित्तमें ही सभी श्रुतियोंके वास्तविक हरिभक्ति तात्पर्यमय अर्थ प्रकाशित होते हैं, अन्य किसीके हृदयमें नहीं।” श्रीप्रह्लाद महाराजकी उक्ति (भाः 7/5/24)- “इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेत्रवलक्षणा। क्रियते भगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम् ॥” “जो भगवान् श्रीविष्णुके प्रति आत्मसमर्पणपूर्वक ये नौ प्रकारकी भक्ति करते हैं, उन्होंने ही उत्तमरूपसे शास्त्र अध्ययन किया है- ऐसा कहा जाता है।" इस श्लोककी श्रीधर स्वामीकी टीका- “सा चार्पिंतैव सती यदि क्रियते, न तु कृता सती पश्चादर्प्येत, तदुत्तममधीतं मन्ये, न त्वस्माद्दुरोर्धीतं शिक्षितं वा तथाविधं किञ्चिदस्तीति भावः।" “पहले आत्मसमर्पण, बाद में हरिभजन-क्रिया-यही विधि है। ऐसा होनेपर ही उत्तम शास्त्र अध्ययन हुआ है, ऐसा विचार है। आत्मसमर्पणपूर्वक विष्णुपूजाकी अपेक्षा और कुछ भी श्रेष्ठ शिक्षा अथवा अध्ययन नहीं हो सकता।" अविद्याके वशमें होकर उन जड़विद्या-अभिमानी (छात्रों) ने परविद्यारूपी वधूके जीवन-स्वरूप विष्णुकी अवज्ञा की और नित्य वास्तववस्तु विष्णुके चरणोंमें आत्मसमर्पणके अभावके कारण उन दाम्भिकोंके कलुषित-मलिन हृदयमें विद्याकी स्फूर्ति नहीं हुई। इसलिये (भाः 11/11/18)- “शब्दब्रह्मणि निष्णातो न निष्णायात् परे यदि। श्रमस्तस्य श्रमफलो ह्यधेनुमिव रक्षतः ॥” “यदि कोई वेदादि शास्त्रोंमें पारदर्शी होनेपर भी परब्रह्म विष्णुमें भक्तिपरायण न हो, तो उसका समस्त शास्त्रानुशीलन-श्रम केवल व्यर्थके परिश्रममें ही समाप्त होता है ॥ "257 ॥ तथापि दाम्भिक पडुया नम्र नाहि हय। याहाँ ताहाँ प्रभुर निन्दा हासि' से करय ॥ 258 ॥ अनुवाद-तब भी वे दाम्भिक छात्र नम्र नहीं हुए। जहाँ-तहाँ सभी स्थानोंपर वे हँसी उड़ाते हुए महाप्रभुकी निन्दा करने लगे॥ 258 ॥ पाखण्डियोंकी दुर्गति देख महाप्रभुकी करुणा :- सर्वज्ञ गोसाञि जानि' सबार दुर्गति। घरे बसि' चिन्तेन ता'-सबार अव्याहति ॥ 259 ॥ अनुवाद-सर्वज्ञ महाप्रभु उन सबकी उस अपराधके फलस्वरूप दुर्गति को जानकर घरमें बैठकर उनके उद्धारकी चिन्ता करने लगे॥ 259॥ सत्रहवाँ अध्याय | 257

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[ 17/260-266 [बायाँ स्तम्भ / Left Column] अभक्त व्यक्तियोंका परिचय :- 'यत अध्यापक, आर ताँर शिष्यगण। धर्मी, कर्मी, तपोनिष्ठ, निन्दक, दुर्जन॥ 260 ॥ श्रीकृष्णविद्वेष-अपराधसे मुक्त करनेके उपायकी चिन्ता :- एइ सब मोर निन्दा-अपराध हैते। आमि ना लओयाइले भक्ति, ना पारे लइते ॥ 261 ॥ निस्तारिते आइलाम आमि, हैल विपरीत। एसब दुर्जनेर कैछे हइबेक हित ॥ 262 ॥ अनुवाद—'जितने भी अध्यापक और उनके शिष्य हैं, वे सभी धर्मी-कर्मी (वर्णाश्रम धर्म और कर्मकाण्डमें रत) अथवा तपादिको मुख्य धर्म माननेवाले हैं और वैष्णवोंके निन्दक हैं, इसलिये ये दुर्जन हैं। ये सब मेरी निन्दारूपी अपराधके कारण स्वयं भक्ति नहीं कर सकते, जब तक मैं इन्हें भक्ति प्रदान न करूँ। मैं तो सभीका उद्धार करनेके लिये आया था, किन्तु सब विपरीत हो रहा है। इन सभी दुर्जनोंका कैसे कल्याण होगा ? ॥ 260-262 ॥ अनुभाष्य—गोपीभावमें आविष्ट होनेके कारण महाप्रभुका श्रीकृष्णके प्रति क्रोध और दोषारोपणको अप्राकृत न समझनेके कारण एक कर्मजड़ स्मार्त्त छात्रका महाप्रभुके साथ वादानुवाद और गोपीभावमय महाप्रभुका उसको श्रीकृष्णका पक्षपाती समझकर क्रोधित होकर उसके पीछे दौड़ना; ऐसा देखकर कर्मजड़ हरिविमुख नाम मात्रके ब्राह्मणोंके द्वारा मोहवशतः महाप्रभुको पीटनेका परामर्श; उनकी दुर्गति और दुर्दशा दूर करनेके लिये प्राकृत समाजकी दृष्टिमें श्रेष्ठ जन्म और वर्णके अभिमानी लोगोंके गुरुका संन्यास आश्रम स्वीकार करनेकी अभिलाषा— चैःभाः मध्यखण्ड, छब्बीसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है।॥ 247-262 ॥ आमाके प्रणति करे, हय पापक्षय। तबे से इहारे भक्ति लओयाइले लय ॥ 263 ॥ [दायाँ स्तम्भ / Right Column] पाषण्डियोंके उद्धारकी इच्छा :- मोरे निन्दा करे ये, ना करे नमस्कार। एसब जीवेरे अवश्य करिब उद्धार ॥ 264 ॥ अनुवाद—यदि ये मुझे नमस्कार करेंगे, तो इनके पाप नष्ट हो जायेंगे। तब मेरे द्वारा इनको भक्ति प्रदान करनेपर ये उसे धारण कर सकेंगे। जो मेरी निन्दा करते हैं, मुझे नमस्कार भी नहीं करते, तो भी मैं उन सभी जीवोंका अवश्य ही उद्धार करूँगा ॥ 263-264 ॥ लौकिक मर्यादामय संन्यास-लीलाभिनयका सङ्कल्प :- अतएव अवश्य आमि संन्यास करिब। संन्यासि-बुद्धये मोरे प्रणत हइब ॥ 265 ॥ अनुवाद—इसलिये मैं अवश्य ही संन्यास ग्रहण करूँगा। तब ये सभी मुझे संन्यासी जानकर प्रणाम करेंगे ॥ 265 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—शास्त्रोंके मतानुसार यदि कोई ब्राह्मण संन्यास ग्रहण करे, तो संन्यासी-बुद्धिसे अर्थात् संन्यासीको प्रणामके योग्य समझकर गृहस्थ और ब्राह्मणादि सभी प्रणाम करते हैं। मेरे संन्यास लेनेपर निन्दक ब्राह्मण अवश्य ही प्रणाम करके मुझसे सुबुद्धि लाभ करेंगे ॥ 265 ॥ संन्यासी जानकर महाप्रभुको नमस्कारके फलस्वरूप पाषण्ड ब्राह्मणादि उच्चजातिके व्यक्तियोंमें भी शुद्धचित्तसे सेवा-प्रवृत्तिका उदय :- प्रणतिते ह'बे इहार अपराध-क्षय। निर्मल हृदये भक्ति कराइब उदय ॥ 266 ॥ अनुवाद—मुझे प्रणाम करनेसे जब इनके अपराध नष्ट हो जायेंगे, तब इनके निर्मल हृदयमें मैं भक्ति उदय कराऊँगा ॥ 266 ॥ अनुभाष्य—पाषण्डी ब्राह्मणब्रुव अर्थात् नाम मात्रके ब्राह्मण जो ब्राह्मण जातिके विहित कर्त्तव्योंका पालन नहीं करते, वे भी वैष्णव-संन्यासीको दण्डवत् प्रणाम 258 | श्रीचैतन्यचरितामृत

17/265-272 ] करेंगे—यही श्रीमन्महाप्रभुकी धारणा थी; उस समयमें सदाचार भी ऐसा ही था। इस समय जो इन सभी नाम मात्रके ब्राह्मणोंकी अपेक्षा और भी अधिक दाम्भिकता दिखाते हुए वैष्णव-संन्यासीको दण्डवत् प्रणाम नहीं करते, उनके सम्बन्धमें शास्त्रोंकी विधि,— “देवता-प्रतिमां दृष्ट्वा यतिञ्चैव त्रिदण्डिनम्। नमस्कारं न कुर्याद् यः प्रायश्चित्तीयते नरः॥” (पाठान्तरमें, नमस्कारं न कुर्याच्चेदुपवासेन शुद्धयति॥”) “परमदेवता श्रीविष्णुके विग्रह और वैष्णव-त्रिदण्डी-संन्यासीको देखकर यदि कोई ब्राह्मण (चाहे वह नाम मात्रका ब्राह्मण हो) प्रणाम न करे, तो इस दोषके कारण उसे प्रायश्चित करना पड़ता है, अथवा उपवास करके शुद्ध होना पड़ता है॥” 265-266॥ एसब पाषण्डी तबे हइबे निस्तार। आर कोन उपाय नाहि, एइ युक्ति सार॥'267॥ अनुवाद—यही युक्ति ठीक है, क्योंकि इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है, तभी इन सब पाषण्डियोंका उद्धार होगा॥'267॥ उसी समय केशव भारतीका नवद्वीपमें महाप्रभुके घरमें भिक्षा ग्रहण :- एइ दृढ़ युक्ति करि' प्रभु आछे घरे। केशव भारती आइला नदिया-नगरे॥268॥ अनुवाद—ऐसा दृढ़ निश्चय कर जब महाप्रभु घरमें विराजमान थे, तभी श्रीकेशव भारती नदिया-नगरमें पधारे॥268॥ प्रभु ताँरे नमस्करि' कैल निमन्त्रण। भिक्षा कराइया ताँरे कैल निवेदन॥269॥ भारतीके निकट महाप्रभुका निवेदन :- “तुमि त' ईश्वर वट,—साक्षात् नारायण। कृपा करि' कर मोर संसार-मोचन ॥” 270 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने जाकर उन्हें नमस्कार करके अपने घर निमन्त्रित किया और भिक्षा करानेके उपरान्त उनसे निवेदन किया,—“आप कृपा करके मेरे संसार-बन्धनको काट दीजिये, आप यह करनेमें समर्थ हैं। आप ईश्वर हैं, साक्षात् नारायण ही हैं॥”269-270॥ भारतीकी उक्ति :- भारती कहेन,—“तुमि ईश्वर, अन्तर्यामी। ये कहे, से करिब,—स्वतन्त्र नहि आमि॥” 271 ॥ अनुवाद—श्रीकेशव भारतीने कहा,—“आप तो ईश्वर हो, अन्तर्यामी हो। आप जो कहेंगे, मैं वही करूँगा, क्योंकि मैं स्वतन्त्र नहीं, आपके परतन्त्र हूँ॥”271॥ भारतीका काटोया लौटकर आना और महाप्रभुका उनसे संन्यास ग्रहण :- एत बलि' भारती गोसाञि काटोयाते गेला। महाप्रभु ताहा याइ' संन्यास करिला ॥ 272 ॥ अनुवाद—यह कहकर श्रीकेशव भारती कटोया चले गये। महाप्रभुने वहीं जाकर उनसे संन्यास ग्रहण किया॥272॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुकी चौबीस वर्षकी आयुके अन्तमें जो माघी शुक्लपक्ष पड़ा, उस उत्तरायणके समय संक्रमणके दिन महाप्रभुने रात्रिके अन्तमें श्रीनवद्वीपको त्यागकर ‘नदियार घाट’से तैरते हुये गङ्गा पारकर कण्टकनगर या कटोया-ग्राममें पहुँचकर श्रीकेशव भारतीसे (एक) दण्ड ग्रहण किया। चन्द्रशेखर आचार्य रत्नने महाप्रभुकी आज्ञानुसार संन्यासके सभी कृत्योंका अनुष्ठान किया। सारा दिन कीर्त्तन करते-करते लगभग सन्ध्याके समय क्षौरकार्य (मुण्डन) समाप्त हुआ। अगले दिन प्रातःकाल दण्डधारी संन्यासीका वेश धारण किये हुये श्रीकृष्णचैतन्यने राढ़देशमें भ्रमण करना आरम्भ किया। श्रीकेशवभारती भी कुछ दूरी तक उनके साथ-साथ गये थे॥272॥ सतरहवाँ अध्याय | 259

[ 17/273–278 महाप्रभुके संन्यासके समय निताइ, आचार्यरत्न और मुकुन्द :— सङ्गे नित्यानन्द, चन्द्रशेखर आचार्य। मुकुन्ददत्त,—एइ तिन कैल सर्व कार्य॥ 273 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीचन्द्रशेखर आचार्य और श्रीमुकुन्ददत्त, इन तीनोंने संन्यास ग्रहण करनेके सभी अनुष्ठानादि आवश्यक कार्योंको किया॥ 273 ॥ एइ आदिलीलार कैल सूत्र गणन। विस्तारि वर्णिला इहा दास वृन्दावन॥ 274 ॥ अनुवाद—यहाँ तक आदि-लीलाकी सूत्ररूपमें मैंने गणना की है। इन समस्त लीलाओंका श्रीवृन्दावनदासने विस्तारपूर्वक वर्णन किया है॥ 274 ॥ अनुभाष्य—चैःभाः मध्यखण्ड, अठाइसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥ 274 ॥ महाप्रभुकी शान्तको छोड़कर दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर भावमें उक्त चित्तवृत्ति :— यशोदानन्दन हैला शचीर नन्दन। चतुर्विध भक्त-भाव करे आस्वादन॥ 275 ॥ अनुवाद—श्रीयशोदानन्दन अब श्रीशचीनन्दनके रूपमें अवतीर्ण हुये हैं और उन्होंने चार प्रकारके भक्तोंके भावोंका आस्वादन किया॥ 275 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'चतुर्विध भक्त-भाव'—दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर रसके आश्रित चार प्रकारके भक्तोंके भाव॥ 275 ॥ आश्रयजातीय भावमय विषयविग्रह ही गौरसुन्दर— “गौरनागरी”-वादका खण्डन :— माधुर्य राधा-प्रेमरस आस्वादिते। राधाभाव अङ्गीकार करियाछे भालमते॥ 276 ॥ अनुवाद—अपने माधुर्य और राधाके प्रेम रसका आस्वादन करनेके लिये श्रीकृष्ण श्रीराधाके भाव और अङ्गकान्तिको अङ्गीकार करके श्रीगौरसुन्दरके रूपमें अवतीर्ण हुए॥ 276 ॥ गोपी-भाव याते प्रभु करियाछे एकान्त। व्रजेन्द्रनन्दने माने आपनार कान्त॥ 277 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने ऐकान्तिक रूपसे गोपीभावको ग्रहण किया है, इसलिये वे श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णको अपने कान्तके रूपमें मानते हैं॥ 277 ॥ गोपिका-भावेर एइ सुदृढ़ निश्चय। व्रजेन्द्रनन्दन बिना अन्यत्र ना जानय॥ 278 ॥ अनुवाद—गोपी-भावका यही सुदृढ़ निश्चय है कि व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण ही उनके एकमात्र प्राण-प्रियतम हैं और वे उनके अतिरिक्त किसी औरको नहीं जानती हैं॥ 278 ॥ अनुभाष्य—'श्रीगौरसुन्दर'—श्रीराधाभावद्युति-सुवलित श्रीकृष्ण हैं, इसलिये श्रीकृष्णकी सेवाके लिये आश्रय-जातीय श्रीमती राधिकादि गोपियोंके हृदयमें जो भाव है, महाप्रभु सदा उसी भावमें ही स्थित रहते थे। उसे त्यागकर कभी भी उन्होंने स्वयं श्रीकृष्णके समान विषय-जातीय चेष्टाएँ अर्थात् भोक्ताके अभिमानसे परस्त्री-दर्शनादिके द्वारा 'लम्पट नागर' की वृत्तिका परिचय नहीं दिया। परन्तु प्राकृत कामुक परस्त्री लम्पट सहजिया-सम्प्रदायके लोग निज-निज घृणित काम-पिपासा और व्यभिचारको जगद्गुरु आचार्यकी लीलाका प्रदर्शन करने वाले श्रीगौरसुन्दरके कन्धेपर आरोपित करके वैष्णवाचार्य शिरोमणि श्रीस्वरूप-दामोदर और ठाकुर वृन्दावनदासके श्रीचरणोंमें केवलमात्र अपराधकी ही वृद्धि करते हैं। चैःभाः पन्द्रहवाँ अध्याय— “सबे पर-स्त्री प्रति नाहि परिहास। स्त्री देखिले दूरे प्रभु हन एकपाश॥ 27 ॥ एइमत चापल्य करेन सबा-सने। सबे स्त्री-मात्र नाहि देखेन दृष्टिकोणे॥ 28 ॥ 260 | श्रीचैतन्यचरितामृत

17/276–283 ] 'स्त्री' हेन नाम प्रभु एइ अवतारे। श्रवणो ना करिला-विदित संसारे॥29॥ अतएव यत महामहिम सकले। 'गौराङ्ग-नागर' हेन स्तव नाहि बले॥30॥ यद्यपि सकल स्तव सम्भव ताहाने। तथापिह स्वभावे से गाय बुधगणे॥31॥" "सबके साथ परिहास करनेपर भी महाप्रभु पर-स्त्रीके साथ कभी परिहास नहीं करते थे, स्त्रीको देखकर वे दूरसे ही एक ओर हट जाते थे। इस प्रकार महाप्रभु सबके साथ चपलता करते रहते, किन्तु किसी भी स्त्रीकी ओर आँख उठाकर भी नहीं देखते थे। संसारमें प्रसिद्ध है कि इस अवतारमें महाप्रभुने 'स्त्री' नामका भी श्रवण नहीं किया। इसलिये जितने भी महिमाशाली महापुरुष हैं, उनमेंसे किसीने भी महाप्रभुकी स्तुति 'गौराङ्ग-नागर' कहकर नहीं की है। यद्यपि महाप्रभुके लिये सभी प्रकारकी स्तुति सम्भव है, तथापि विद्वान लोग महाप्रभुके तत्त्वके अनुकूल ही उनकी लीलाका कीर्तन करते हैं।" इन तीन पद्योंमें सुस्पष्ट रूपसे भक्तिसिद्धान्त विरोधी दुराचार-पुष्ट कल्पित 'गौराङ्गनागरीवाद' का खण्डन हुआ है।॥276-278॥ स्वयंरूप श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य रूपोंमें गोपियोंकी प्रीति नहीं :- श्यामसुन्दर, शिखिपिच्छ-गुञ्जा-विभूषण। गोप-वेश, त्रिभङ्गिम, मुरली-वदन॥279॥ इहा छाड़ि' कृष्ण यदि हय अन्याकार। गोपिकार भाव नाहि याय निकट ताहार॥280॥ अनुवाद-जिनका परम सुन्दर रूप श्याम वर्णका है, सिरपर मयूर-पंख है, गलेमें गुञ्जाकी माला है, गोप-वेश है और अधरोंपर मुरली धारणकर त्रिभङ्ग ललित मुद्रामें खड़े हैं-ऐसे रूपको छोड़कर श्रीकृष्णका यदि कोई अन्य आकार हो, तो गोपियोंका उनके प्रति कान्त-भाव स्फुरित नहीं होता॥279-280॥ ललितमाधव (6/14)- गोपीनां पशुपेन्द्रनन्दनजुषो भावस्य कस्तां कृती विज्ञातुं क्षमते दुरूहपदवीसञ्चारिणः प्रक्रियाम्। आविष्कुर्वति वैष्णवीमपि तनुं तस्मिन् भुजैर्जिष्णुभि- र्यासां हन्त चतुर्भिरद्भुतरुचिं रागोदयः कुञ्चति॥281॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥281॥ अमृतप्रवाह भाष्य-किसी समय श्रीकृष्णने कौतुकवशतः अद्भुत-रुचियुक्त चतुर्भुज नारायणरूप प्रकाश किया, जिसे देखकर गोपियोंके रागका उदय सङ्कुचित हो गया। इसलिये नन्दनन्दनमें अनन्य-भजनशील दुर्गम-पारकीय- पथका अवलम्बन करनेवाली गोपियोंकी भाव-क्रियाको कौन पण्डित समझ सकता है?॥281॥ अनुभाष्य-सूर्यपत्नी सवर्णाके प्रति विशाखाके वचन,- गोपीनां दुरूहपदवीसञ्चारिणः (दुरूहायां पदव्यां सञ्चरितुं शीलं यस्य तस्य) पशुपेन्द्र-नन्दनजुषः (पशुपेन्द्रस्य गोपराजस्य नन्दस्य नन्दनं सूनुं जुषते सेवते यस्तस्य कृष्णसेवापरस्य) भावस्य तां प्रक्रियां विज्ञातुं (बोद्धुं) कः कृति क्षमते (समर्थवान् भवति)? [यतः] हन्त! जिष्णुभिः (जयशीलैः) चतुर्भिः भुजैः (धृतनारायण विग्रहैः) अद्भुतरुचिं (अद्भुत-रुचिः शोभा यस्याः ताम् अलौकिकीं कान्तिमयीं) वैष्णवीं तनुं आविष्कुर्वति (प्रकटयति सति) तस्मिन् (कृष्णे) अपि यासां (गोपीनां) रागोदयः कुञ्चति (विकाशं न लभते)। श्लोक भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥281॥ रासके समय आत्मगोपनकी इच्छासे श्रीकृष्णके द्वारा गोपियोंको चतुर्भुज प्रदर्शन और संरक्षण :- वसन्तकाले रासलीला करे गोवर्धने। अन्तर्धान कैला सङ्केत करि' राधा-सने॥282॥ निभृतनिकुञ्जे बसि' देखे राधार बाट। अन्वेषिते आइला ताहाँ गोपिकार ठाट॥283॥ अनुवाद-वसन्त ऋतुमें गोवर्धनमें रासके मध्य श्रीकृष्ण श्रीमती राधिकाके साथमें एकान्तमें विहारकी इच्छासे उन्हें सङ्केत करके अन्तर्धान हो गये। श्रीकृष्ण सतरहवाँ अध्याय | 261

[ 17/283-293 निभृतनिकुञ्जमें बैठकर राधाजीकी बाट जोहने लगे। श्रीकृष्णको रासमें न देखकर सब गोपियाँ श्रीकृष्णको ढूँढ़ती हुई तभी वहाँ आयीं ॥ 283 ॥ अनुभाष्य—'बाट'—वर्त्म अथवा पथ। 'ठाट'—श्रेणीबद्ध सैन्य॥ 283 ॥ दूर हैते देखि' ताँरे बोले गोपीगण। “एइ देख कुञ्जेर भितर व्रजेन्द्रनन्दन ॥"284 ॥ अनुवाद—दूरसे देखकर ही गोपियोंने कहा,—“वह देखो, व्रजेन्द्रनन्दन इसी कुञ्जके भीतर हैं॥"284॥ गोपीगण देखि' कृष्णेर हइल साधवस। लुकाइते नारिल, ताहे हैला विरस ॥ 285 ॥ चतुर्भुज मूर्त्ति करि' आछेन बसिया। कृष्ण देखि' गोपी कहे निकटे आसिया ॥ 286 ॥ अनुवाद—गोपियोंको देखकर श्रीकृष्ण भयभीत हो गये और उनसे छिपना चाहते थे, परन्तु छिपनेको कोई स्थान न देखकर वे विवश हो गये। वे कहीं और जा नहीं सकते थे, इसलिये वहीं चतुर्भुजरूप धारण करके बैठ गये। उन्हें देखकर गोपियाँ उनके निकट आकर कहने लगीं ॥ 285-286॥ अनुभाष्य—'साध्वस'—भय, त्रास, शङ्का, मनका आवेग, सम्भ्रम ॥ 285 ॥ गोपियोंका नारायण-स्तव :- 'इहों कृष्ण नहे, इहों नारायण-मूर्त्ति।' एत बलि' सबे ताँरे करे नति-स्तुति ॥ 287 ॥ “नमो नारायण, देह' करह प्रसाद। कृष्णसङ्ग देह' मोरे, घुचाह विषाद ॥" 288 ॥ एत बलि नमस्करि' गेला गोपीगण। हेनकाले राधा आसि' दिला दरशन ॥ 289 ॥ अनुवाद—'अरे ! ये तो श्रीकृष्ण नहीं हैं, ये तो भगवान् नारायण हैं।' यह कहकर वे सब उन्हें प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगीं,—“हे नारायण ! आपको हम नमस्कार करती हैं। आप कृपा करें और हमें श्रीकृष्णका सङ्ग प्रदान करके हमारे हृदयकी विरह-वेदनाको दूर करें।" यह कहकर गोपियोंने उन्हें नमस्कार किया और तभी राधाजी वहाँ उपस्थित हुईं ॥ 287-289 ॥ अनुभाष्य—'मोरे'—हमें ॥ 288 ॥ श्रीमती राधिकाके आगमन-मात्रसे ही चतुर्भुजका अन्तर्धान, द्विभुज-मूर्ति अथवा स्वयंरूप :- राधा देखि' कृष्ण ताँरे हास्य करिते। सेइ चतुर्भुज-मूर्त्ति चाहेन राखिते ॥ 290 ॥ लुकाइला दुइ भुज राधार अग्रेते। बहु यत्न कैला कृष्ण, नारिल राखिते ॥ 291 ॥ अनुवाद—राधाजीको देखकर श्रीकृष्ण अपने चतुर्भुज रूपमें रहकर उनसे परिहास करना चाहते थे, परन्तु बहुत प्रयास करनेपर भी राधाजीके सामने वे उस रूपकी रक्षा नहीं कर सके और उनकी दो भुजाएँ अन्तर्हित हो गयीं ॥ 290-291 ॥ श्रीराधाका अचिन्त्य कृष्णप्रेम :- राधार विशुद्ध-भावेर अचिन्त्य-प्रभाव। ये कृष्णेरे कराइला द्विभुज-स्वभाव ॥ 292 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके प्रति राधाजीके विशुद्ध-भावका यह अचिन्त्य प्रभाव है कि उसने श्रीकृष्णको उनके मूल द्विभुजरूपमें आनेपर विवश कर दिया ॥ 292 ॥ श्रीराधाके सामने कृष्ण-चातुर्यकी पराजय, नित्य स्वयंरूप श्यामसुन्दर :- उज्ज्वलनीलमणिमें नायिकाभेद-प्रकरणमें छठे अङ्कमें— रासारम्भाविधौ निलीयवसता कुञ्जे मृगाक्षीगणै- दृष्टं गोपयितुं स्वमुद्धुरधिया या सुष्ठु सन्दर्शिता। राधायाः प्रणयस्य हन्त महिमा यस्य श्रिया रक्षितुं सा शक्या प्रभविष्णुनापि हरिणा नासीच्चतुर्बाहुता ॥ 293 ॥ 262 | श्रीचैतन्यचरितामृत

17/293-299 ] अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ 293 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—रासके आरम्भमें कौतुकवशतः श्रीकृष्ण कुञ्जमें छिपकर बैठे थे। मृगनयनी गोपियोंको उधर आते देखकर उन्होंने शङ्कित होकर अपना मनोहर चतुर्भुजरूप उन्हें प्रदर्शित किया। साधारण गोपियोंने केवल यही कहा, - 'ये हमारे प्रेमके विषय श्रीकृष्ण नहीं हैं।' किन्तु राधाजीके प्रेमकी आश्चर्यमयी महिमा! श्रीराधाके आगमन-मात्रसे ही श्रीकृष्ण चेष्टा करके भी उस चतुर्भुज रूपको नहीं रख पाये ॥ 293 ॥ अनुभाष्य-[गोवर्द्धनोपत्यकायां परासौलीति ख्यातानाम्नां रासस्थल्यां वसन्तकाले] रासारम्भविधौ (रासस्य आरम्भविधौ प्रवृत्तिकल्पे) कुञ्जे निलोयवसता (संलग्नावस्थितेन) हरिणा (श्रीकृष्णेन) मृगाक्षिगणैः (कुरङ्गनयनाभिः गोपीभिः) [प्रविष्टक-नामारण्ये पेठाख्ये] दृष्टं स्वम् (आत्मानं) गोपयितुं (बह्वीभिस्ताभिः सर्वतः आवृतात् तस्मात् कुञ्जात् सहसापसर्पणासम्भवात्) उद्बुद्धधिया (उत्कृष्टबुद्ध्या) या चतुर्बाहुता सुष्ठु सन्दर्शिता, यस्य (कृष्णप्रणयमहिम्नः) श्रिया प्रहविष्णुना (कृष्णेन) अपि या चतुर्बाहुता रक्षितुं न शक्या आसीत्-हन्त! (भोः!) राधायाः प्रणयस्य महिमा (माहात्म्यम्)- [एतादृगचिन्त्यम्!] (गौतमीये—'गोवर्द्धनगिरौ रम्ये स्थितं रासरसोत्सुकम्।' भगवतोऽपि प्रेमाधीनत्वात् प्रेमणोऽग्रे ऐश्वर्यं न तिष्ठतीति न शक्यते वक्तु तस्य नित्यत्वात्, किन्तु तिरोभवति)। श्लोक भावानुवाद-वसन्तकालमें गोवर्धनके प्रान्तमें रसौली नामक रास-स्थलीमें रासके आरम्भमें कौतुकवशतः श्रीकृष्ण पेठा नामक वनमें एक कुञ्जमें छिपकर बैठे थे। मृगनयनी गोपियोंको उधर आते देखकर उन्होंने शङ्कित होकर चातुर्यपूर्वक अपना मनोहर चतुर्भुजरूप उन्हें प्रदर्शित किया। साधारण गोपियोंने यही कहा,-'ये हमारे प्रेमके विषय श्रीकृष्ण नहीं हैं।' किन्तु राधाजीके प्रेमकी अचिन्त्य महिमा! श्रीराधाके आगमन-मात्रसे ही श्रीकृष्ण चेष्टा करके भी उस चतुर्भुज रूपको नहीं रख पाये। (गौतमीय-तन्त्रमें-रम्य गोवर्धनमें स्थित रासरसोत्सुक भगवान् श्रीकृष्ण भी प्रेमके अधीन हैं, प्रेमके आगे वे भी अपने नित्य ऐश्वर्यको धारण करनेमें असमर्थ हैं) ॥ 293 ॥

नन्द-जगन्नाथ मिश्र, यशोदा-शची :- सेइ व्रजेश्वर-इहाँ जगन्नाथ पिता। सेइ व्रजेश्वरी-इहाँ शचीदेवी माता ॥ 294 ॥ व्रजके कानाइ-बलाइ-गौड़के गौर-निताइ :- सेइ नन्दसुत-इहँ चैतन्य-गोसाञि। सेइ बलदेव-इहँ नित्यानन्द-भाइ ॥ 295 ॥ अनुवाद-वे व्रजेश्वर नन्द महाराज इनके (महाप्रभुके) पिता श्रीजगन्नाथ हैं और वे व्रजेश्वरी यशोदा इनकी माता शचीदेवी हैं। वे नन्दनन्दन ही ये चैतन्य-महाप्रभु हैं और वे श्रीबलदेव ही उनके भाई श्रीनित्यानन्द प्रभु हैं ॥ 294-295 ॥ मधुररसके अतिरिक्त अन्य रसोंमें श्रीनित्यानन्द-रामकी श्रीगौरकृष्णसेवा :- वात्सल्य, दास्य, सख्य-तिन भावमय। सेइ नित्यानन्द-कृष्णचैतन्य-सहाय ॥ 296 ॥ प्रेमभक्ति दिया तैं हो भासाल जगते। ताँर चरित्रचित्र लोके ना पारे बुझिते ॥ 297 ॥ अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभु वात्सल्य, दास्य और सख्य-ये तीन भाव महाप्रभुके प्रति रखते हैं और वे सदा महाप्रभुकी लीलाओंमें सहायक हैं। प्रेमाभक्ति प्रदान करके उन्होंने समस्त जगत्को उसमें डुबो दिया है। उनके अलौकिक चरित्रको साधारण लोग समझ नहीं पाते हैं ॥ 296-297 ॥ भक्तावतार श्रीअद्वैताचार्यका शुद्धभक्ति-प्रचार :- अद्वैत-आचार्य-गोसाञि भक्त-अवतार। कृष्ण अवतारिया कैला भक्तिर प्रचार ॥ 298 ॥ श्रीअद्वैताचार्यकी दो भावोंमें श्रीगौरकृष्णसेवा :- सख्य, दास्य,-दुइ भाव सहज ताँहार। कभु प्रभु करेन ताँरे गुरु-व्यवहार ॥ 299 ॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य गोसाई भक्तावतार हैं, उन्होंने श्रीकृष्णको अवतरित करवाकर जगत्में भक्तिका प्रचार सतरहवाँ अध्याय | 263

[ 17/298-302 किया है। सख्य और दास्य-ये दो उनके महाप्रभुके प्रति स्वाभाविक भाव हैं, परन्तु महाप्रभु कभी-कभी उन्हें गुरुके समान मानकर व्यवहार करते हैं॥298-299॥ श्रीवासादि शुद्धभक्तोंका दास्य :- श्रीवासादि यत महाप्रभुर भक्तगण। निज निज भावे करेन चैतन्य-सेवन॥300॥ श्रीगदाधर-स्वरूप-रामानन्द-श्रीरूपादि शक्तियोंकी मधुररसमें श्रीगौरकृष्णसेवा :- पण्डित-गोसाञि आदि याँर सेइ रस। सेइ सेइ रसे कृष्ण हय ताँर वश॥301॥ अनुवाद-श्रीवासादि जितने भी भक्त हैं, वे अपने-अपने भावोंके अनुरूप महाप्रभुकी सेवा करते हैं। श्रीवास पण्डित, श्रीगदाधर पण्डित, श्रीस्वरूप, श्रीरूप-सनातनादि गोस्वामीका श्रीकृष्णके प्रति जो-जो भाव है, श्रीकृष्ण उसी भावके द्वारा उन भक्तोंके वशीभूत होते हैं॥300-301॥ अनुभाष्य-इन सब (296-301) पद्योंमें श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैताचार्यकी परम चमत्कारमय गौरसेवा-भाव-वैचित्रीके तारतम्यका वर्णन हुआ है। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 11-13वें श्लोक)- “भक्तरूपो गौरचन्द्रो यतोऽसौ नन्दनन्दनः। भक्तस्वरूपो नित्यानन्दो व्रजे यः श्रीहलायुधः। भक्तावतार आचार्योऽद्वैतो यः श्रीसदाशिवः। भक्ताख्याः श्रीनिवासाद्या यतस्ते भक्तरूपिणः। भक्तशक्तिर्द्विजाग्रण्यः श्रीगदाधरपण्डितः॥11॥ श्रीमद्विश्वम्भराद्वैतनित्यानन्दावधूतकाः । अत्र त्रयः समुन्नेया विग्रहाः प्रभवश्च ते। एको महाप्रभुर्ज्ञेयः श्रीचैतन्यो दयाम्बुधिः। प्रभू द्वौ श्रियुतौ नित्यानन्दाद्वैतौ महाशयौ। गोस्वामिनो विग्रहाश्च ते द्विजश्च गदाधरः। पञ्चतत्त्वात्मका एते श्रीनिवासश्च पण्डितः॥12॥ यदुक्तं तत्र गोस्वामि श्रीस्वरूपपदाम्बुजैः। “त्रयोऽत्र विग्रहा ज्ञेयाः प्रभवश्चात्र ते त्रयः। एको महाप्रभुर्ज्ञेयो द्वौ प्रभु सम्मतौ सताम्॥”13॥ “यद्यपि श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने पञ्चतत्त्वके अर्थका विस्तृत वर्णन किया है, तथापि यहाँपर उसे संक्षेपमें लिखा जा रहा है- जो श्रीनन्दनन्दन हैं, वे ही भक्तरूपमें श्रीगौरचन्द्र हैं। जो व्रजमें श्रीहलधर (श्रीबलदेव) प्रभु हैं, वे ही भक्तस्वरूपमें श्रीनित्यानन्द प्रभु हैं। जो सदाशिव हैं, वे ही भक्तावतार श्रीअद्वैताचार्य हैं। श्रीवासादि भक्तवृन्द ही भक्ताख्य अर्थात् शुद्धभक्तके रूपमें प्रसिद्ध हैं। द्विजश्रेष्ठ श्रीगदाधर पण्डित ही भक्तशक्ति हैं। यद्यपि पञ्चतत्त्वके अन्तर्गत आनेवाले श्रीमान् विश्वम्भर, श्रीअद्वैताचार्य और अवधूत श्रीनित्यानन्द-तीनों ही भगवद्-विग्रह अर्थात् विष्णुत्तत्त्व और महाप्रभावशाली होनेके कारण प्रभु हैं, तथापि इन तीनोंमेंसे दयाके सागर श्रीचैतन्यदेव 'महाप्रभु' तथा श्रीनित्यानन्द और श्रीअद्वैताचार्य 'प्रभु' के नामसे प्रसिद्ध हैं। (भक्तोंके द्वारा) ये गोस्वामी (अर्थात् श्रीचैतन्य गोसाईं, श्रीनित्यानन्द गोसाईं तथा श्रीअद्वैत गोसाईं) के नाम से भी जाने जाते हैं। अन्य दो तत्त्वोंमेंसे श्रीगदाधर 'द्विज' और श्रीनिवास 'पण्डित' के नामसे प्रसिद्ध हैं। श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी पादने भी ऐसा ही कहा है कि यद्यपि भगवद्-विग्रह होनेके कारण ये तीनों ही 'प्रभु' हैं, तथापि साधुओंकी सम्मत रीतिके अनुसार उनमेंसे एक 'महाप्रभु' तथा अन्य दोनों 'प्रभु' हैं-ऐसा समझना चाहिये। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 23-24वाँ श्लोक)- “तस्य शिष्योऽभवच्च्छ कलयामास शृङ्गारं यः शृङ्गारफलात्मकः॥23॥ अद्वैतः कलयामास दास्यसख्ये फले उभे। श्रीमान् रङ्गपुरी ह्येष वात्सल्ये यः समाश्रितः॥24॥” “श्रीईश्वरपुरी शृङ्गाररसके, श्रीअद्वैतप्रभु दास्य और सख्यरसके एवं श्रीरङ्गपुरी शुद्धवात्सल्यरसके सेवक थे।” चैःचः आदिलीला, 7/10-17 संख्या द्रष्टव्य है॥296-301॥ व्रजमें मुरलीधारी गोपबालक श्यामलीला, गौड़में ब्राह्मण-संन्यासी वेशधारी कीर्तन-विग्रह गौरलीला :- तिँह श्याम,-वंशीमुख, गोपविलासी। इहँ गौर-कभु द्विज, कभु त' संन्यासी॥302॥ 264 | श्रीचैतन्यचरितामृत

17/302-308 ] अनुवाद-व्रजमें वे (श्रीकृष्ण) श्यामवर्णके हैं, उनके मुखपर वंशी सुशोभित होती है और वे गोपबालकके रूपमें विलास करते हैं। [वे ही श्रीकृष्ण] नवद्वीपमें [महाप्रभुके रूपमें] गौर वर्णके हुए हैं, ये कभी ब्राह्मण (गृहस्थ) और कभी संन्यासीकी लीला करते हैं॥ 302 ॥ गोपीभावयुक्त श्रीकृष्णका श्रीगौररूपमें श्रीकृष्णप्रेमास्वादन :- अतएव आपने प्रभु गोपीभाव धरि'। व्रजेन्द्रनन्दने कहे 'प्राणनाथ' करि' ॥ 303 ॥ अनुवाद-इसलिये स्वयं महाप्रभुने गोपीभावको अङ्गीकार किया है और वे व्रजेन्द्रनन्दनको अपना 'प्राणनाथ' मानते हैं॥ 303 ॥ रूपानुगजनोंके आनुगत्यके बिना श्रीगौरका विप्रलम्भरस सुदुर्लभ :- सेइ कृष्ण, सेइ गोपी, - परम विरोध। अचिन्त्य चरित्र प्रभुर अति सुदुर्बोध ॥ 304 ॥ अनुवाद-वे ही श्रीकृष्ण हैं और वे ही गोपी हैं, यह तो परस्पर परम विरोधी बात है, परन्तु महाप्रभुके अचिन्त्य चरित्रको समझना अत्यन्त कठिन है॥ 304 ॥ अनुभाष्य-चैःचः आदिलीला, 17/276-278 संख्या द्रष्टव्य है॥ 303-304 ॥ श्रीगौरके परमवैचित्र्य-चमत्कारमय अचिन्त्यभाव तर्कसे अतीत :- इथे तर्क करि' केह ना कर संशय। कृष्णेर अचिन्त्यशक्ति एइ मत हय ॥ 305 ॥ अनुवाद-इसमें तर्क करके कोई संशय मत करो, क्योंकि श्रीकृष्णकी अचिन्त्यशक्तिका प्रभाव इसी प्रकार है॥ 305 ॥ अचिन्त्य, अद्भुत कृष्णचैतन्य-विहार। चित्र भाव, चित्र गुण, चित्र व्यवहार ॥ 306 ॥ तार्किककी दुर्गति- “संशयात्मा विनश्यति" :- तर्के इहा नाहि माने, येइ दुराचार। कुम्भीपाके पचे सेइ, नाहिक निस्तार ॥ 307 ॥ अनुवाद- श्रीकृष्णचैतन्यकी लीलाएँ अचिन्त्य और अद्भुत हैं। उनके भाव, गुण और व्यवहार सभी आश्चर्यजनक हैं। जो दुराचारी कुतर्कसे इसको नहीं मानता, वह कुम्भीपाक नरकमें यातना भोगता है और वहाँसे उसका उद्धार नहीं होता है॥ 306-307 ॥ अनुभाष्य-'कुम्भीपाक'- एक विशेष प्रकारका नरक। पापी व्यक्तिको 'कुम्भी' नामके एक विशेषपात्र में पकाया जाता है। (भाः 5/26/13)- “यस्तिह वा उग्रः पशून् पक्षिणो वा प्राणत उपरन्धयति तमपकरुणं पुरुषादैरपि विगर्हितममुत्र यमानुचराः कुम्भीपाके तप्ततैल उपरन्धयन्ति ॥" “प्राणियोंका वध करनेवाले जीवको यमराज दण्डके रूपमें कुम्भीपाक नरकमें तप्त तेलमें राँधते हैं॥"307॥ महाभारतमें भीष्मपर्वमें (5/12)- अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्। प्रकृतिभ्यः परं यच्च तदचिन्त्यस्य लक्षणम् ॥ 308 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 308 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-प्रकृतिसे अतीत जो तत्त्व है, उसका लक्षण ही [प्राकृत इन्द्रियों, मन और बुद्धिके द्वारा वह] अचिन्त्य है। तर्क तो प्राकृत है, इसलिये वह तत्त्वको स्पर्श नहीं कर सकता। इसलिये अचिन्त्यभावोंको समझनेके लिये तर्क मत करो॥ 308 ॥ इति अमृतप्रवाह-भाष्ये सप्तदश परिच्छेद। सतरहवें अध्यायका अमृतप्रवाह-भाष्य पूर्ण हुआ। अनुभाष्य-नदी-पर्वत-वनादि भूतलपर स्थित पदार्थोंके नामोंको श्रवण करनेकी इच्छा होनेपर धृतराष्ट्र उत्तरमें सञ्जयने कहा,- ये भावाः अचिन्त्याः (प्राकृत-भोगमय-चिन्तातीताः) खलु (निश्चयं) तान् अचिन्त्यभावान् तर्केण न योजयेत् (ते हेतुभिः सतरहवाँ अध्याय | 265

[ 17/308-317 न हन्तव्याः इत्यर्थः); यत् च प्रकृतिभ्यः परं (भिन्नम् अतीतम् अप्राकृतमिति यावत्) तत् एव अचिन्त्यस्य लक्षणम्। श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥308॥ श्रद्धावान्‌को ही सेवा-प्राप्ति :- अद्भुत चैतन्यलीलाय याहार विश्वास। सेइ जन याय चैतन्येर पद-पाश॥309॥ अनुवाद—अद्भुत चैतन्यलीलामें जिसका दृढ़ विश्वास है, वही व्यक्ति श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंको प्राप्त कर सकता है॥309॥ प्रसङ्गे करिल एइ सिद्धान्तेर सार। इहा येइ शुने, शुद्धभक्ति हय तार॥310॥ अनुवाद—प्रसङ्गवश मैंने सभी सिद्धान्तोंके सारको कहा है। इसे जो श्रद्धापूर्वक सुनता है, उसके हृदयमें शुद्धभक्ति उदित होती है॥310॥ पुनरावृत्ति :- लिखित ग्रन्थेर यदि करि अनुवाद। तबे से ग्रन्थेर अर्थ पाइबे आस्वाद॥311॥ अनुवाद—लिखित ग्रन्थका यदि अन्तमें संक्षेपरूपमें वर्णन किया जाय, तो ग्रन्थके सभी विषयोंका एक साथ आस्वादन किया जा सकता है॥311॥ भागवतमें श्रीव्यास-रीतिके अनुसार अध्याय-वर्णन :- अतएव भागवते व्यासेर आचार। कथा कहि' अनुवाद करे बार बार॥312॥ अनुवाद—इसलिये श्रीमद्भागवतमें श्रीव्यासदेवका ऐसा ही आचरण देखा जाता है। उन्होंने श्रीमद्भागवतके शेषमें उसके विषयका पुनः संक्षेपमें वर्णन किया है॥312॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यासने श्रीमद्भागवतके अन्तमें बारहवें स्कन्धके बारहवें अध्यायमें बावन श्लोकोंमें प्रारम्भसे अन्त तक सम्पूर्ण भागवतको जिस प्रकार प्रतिछायारूपमें (संक्षेपमें) वर्णन करके ग्रन्थ समाप्त किया है, उन महाजनके द्वारा प्रदर्शित पथका अनुसरण करते हुये ग्रन्थकार (श्रीकृष्णदास) ने भी श्रीचैतन्य महाप्रभुकी आदिलीलाको संक्षेपरूपमें पुनः वर्णन किया है॥312॥ संक्षेपमें अध्यायोंमें वर्णित विषयोंकी पुनरावृत्ति :- ताते आदिलीलार करि परिच्छेद गणन। प्रथम परिच्छेदे कैलुँ 'मङ्गलाचरण'॥313॥ अनुवाद—इसलिये मैं भी आदिलीलाके सभी अध्यायोंके विषयोंकी सूची गणना कर रहा हूँ। पहले अध्यायमें मैंने 'मङ्गलाचरण' किया गया है॥313॥ द्वितीय परिच्छेदे 'चैतन्यतत्त्व-निरूपण'। स्वयं भगवान् येइ व्रजेन्द्रनन्दन॥314॥ तेंहो त' चैतन्य-कृष्ण-शचीर नन्दन। तृतीय परिच्छेदे जन्मेर् 'सामान्य' कारण॥315॥ तहिँ मध्ये प्रेमदान-'विशेष' कारण। युगधर्म-कृष्णनाम-प्रेम-प्रचारण॥316॥ अनुवाद—दूसरे अध्यायमें चैतन्यतत्त्वका निरूपण किया है। व्रजेन्द्रनन्दन जो स्वयं भगवान् हैं, वे ही तो शचीनन्दन श्रीकृष्णचैतन्यके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं। तीसरे अध्यायमें उनके जन्मका 'सामान्य' कारण कहा है, उसके मध्यमें प्रेमदानको विशेष कारण बतलाया है। श्रीकृष्णनाम और उसके द्वारा प्रेमका प्रचाररूपी युगधर्मका भी इस अध्यायमें वर्णन हुआ है॥314-316॥ चतुर्थे कहिलुँ जन्मेर् 'मूल' कारण। स्वमाधुर्य-प्रेमानन्दरस-आस्वादन॥317॥ अनुवाद—चौथे अध्यायमें महाप्रभुके जन्मका 'मूल' कारण अपने माधुर्य और प्रेमानन्दरसके आस्वादनको कहा है॥317॥ 266 | श्रीचैतन्यचरितामृत

17/318-327 ] पञ्चमे 'श्रीनित्यानन्द'-तत्त्व निरूपण। नित्यानन्द हैला राम रोहिणीनन्दन ॥ 318 ॥ अनुवाद—पाँचवें अध्यायमें 'श्रीनित्यानन्द'-तत्त्वका निरूपण हुआ है, रोहिणीनन्दन श्रीबलराम ही अब श्रीनित्यानन्द प्रभुके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं॥ 318 ॥ षष्ठ परिच्छेदे 'अद्वैत-तत्त्वे'र विचार। अद्वैत-आचार्य-महाविष्णु-अवतार ॥ 319 ॥ अनुवाद—छठे अध्यायमें 'श्रीअद्वैत-तत्त्व' का विचार हुआ है। श्रीअद्वैताचार्य महाविष्णुके अवतार हैं॥ 319 ॥ सप्तम परिच्छेदे 'पञ्चतत्त्वे'र आख्यान। पञ्चतत्त्व मिलि' यैछे कैला प्रेमदान ॥ 320 ॥ अनुवाद—सातवें अध्यायमें 'पञ्चतत्त्व' का वर्णन है। इन पाँच-तत्त्वोंने मिलकर कैसे सर्वत्र श्रीकृष्णप्रेमका दान किया, इसका वर्णन हुआ है॥ 320 ॥ अष्टमे 'चैतन्यलीला-वर्णन'-कारण। एक कृष्णनामेर महा-महिमा-कथन ॥ 321 ॥ अनुवाद—आठवें अध्यायमें श्रीकृष्णदास गोस्वामीने श्रीचैतन्यचरितामृत लिखनेका कारण कहा है। इसी अध्यायमें श्रीकृष्णनामकी महामहिमाकी कथा भी वर्णित है॥ 321 ॥ नवमेते 'भक्तिकल्पवृक्षे'र वर्णन'। श्रीचैतन्य-माली कैला वृक्ष आरोपण ॥ 322 ॥ अनुवाद—नौवें अध्यायमें 'भक्तिकल्पवृक्ष' का वर्णन है। श्रीचैतन्य महाप्रभुरूपी मालीने इस वृक्षका आरोपण किया है॥ 322 ॥ दशमेते मूल-स्कन्धेर 'शाखादि-गणन'। सर्वशाखागणेर यैछे फल-वितरण ॥ 323 ॥ अनुवाद—दसवें अध्यायमें इस भक्तिकल्पवृक्षके मूल स्कन्धकी शाखाओं-उपशाखाओंकी गणना हुई है और उनके द्वारा प्रेमरूपी फलके वितरणका वर्णन हुआ है॥ 323 ॥ एकादशे 'नित्यानन्दशाखा-विवरण'। द्वादशे 'अद्वैतस्कन्ध शाखार वर्णन' ॥ 324 ॥ अनुवाद—ग्यारहवें अध्यायमें 'श्रीनित्यानन्दशाखा' का विवरण और बारहवें अध्यायमें 'श्रीअद्वैतस्कन्धकी शाखा' का वर्णन हुआ है॥ 324 ॥ त्रयोदशे महाप्रभुर 'जन्म-विवरण'। कृष्णनाम-सह यैछे प्रभुर जनम ॥ 325 ॥ अनुवाद—तेरहवें अध्यायमें महाप्रभुके 'जन्मका विवरण' हुआ है और कैसे सर्वत्र श्रीकृष्णनामके कीर्तनके साथ महाप्रभुका जन्म हुआ॥ 325 ॥ चतुर्दशे 'बाल्यलीला'र किछु विवरण। पञ्चदशे 'पौगण्डलीला'र सङ्क्षेपे कथन ॥ 326 ॥ अनुवाद—चौदहवें अध्यायमें कुछ 'बाल्यलीला' का वर्णन हुआ है और पन्द्रहवें अध्यायमें महाप्रभुकी 'पौगण्डलीला' का संक्षेपमें वर्णन किया है॥ 326 ॥ षोड़शे कहिलुँ 'कैशोरलीला'र उद्देश। सप्तदशे 'यौवनलीला' कहिलुँ विशेष ॥ 327 ॥ अनुवाद—सोलहवें अध्यायमें मैंने महाप्रभुकी 'कैशोरलीला' के उद्देश्यको बतलाया है। सतरहवें अध्यायमें 'यौवनलीला' का विशेष वर्णन किया है॥ 327 ॥ अनुभाष्य—313से 327पयर संख्यामें अध्यायोंकी गणना लिखी है— पहले अध्यायमें-गुरु आदिके वन्दनरूपी मङ्गलाचरण। दूसरे अध्यायमें-गौरतत्त्वनिर्देश मङ्गलाचरण। तीसरे अध्यायमें-अवतारका सामान्य कारण; प्रेमदान। सतरहवाँ अध्याय | 267

[ 17/313–334 चौथे अध्यायमें—अवतारका मूलकारण। पाँचवें अध्यायमें—श्रीनित्यानन्दतत्त्व-निरूपण। छठे अध्यायमें—श्रीअद्वैततत्त्व-निर्देश। सातवें अध्यायमें—पञ्चतत्त्व-निर्देश और प्रचार। आठवें अध्यायमें—उपक्रमणिका और नाम-महिमा। नौवें अध्यायमें—भक्तिकल्पवृक्ष-वर्णन-प्रचार। दसवें अध्यायमें—गौरगणोंकी गणना। ग्यारहवें अध्यायमें—श्रीनित्यानन्द प्रभुके गणोंकी गणना। बारहवें अध्यायमें—श्रीअद्वैताचार्य और श्रीगदाधरगणोंकी गणना। तेरहवें अध्यायमें—गौरजन्मलीला। चौदहवें अध्यायमें—बाल्यलीला। पन्द्रहवें अध्यायमें—पौगण्डलीला। सोलहवें अध्यायमें—कैशोरलीला। सतरहवें अध्यायमें—यौवनलीला ॥ 313-327 ॥ एइ सप्तदश प्रकार 'आदि-लीला'र प्रबन्ध। द्वादश प्रबन्ध, ताते ग्रन्थ-मुखबन्ध ॥ 328 ॥ अनुवाद—इस प्रकार सतरह अध्यायोंमें 'आदिलीला' का वर्णन है, इनमेंसे पहले बारह अध्यायोंमें आदिलीलाकी भूमिका है॥ 328 ॥ पञ्चप्रबन्धे पञ्चवयस चरित। संक्षेपे कहिलुँ अति,—ना कैलुँ विस्तृत ॥ 329 ॥ वृन्दावनदास इहा 'चैतन्यमङ्गले'। विस्तारि' वर्णिला नित्यानन्द-आज्ञा-बले ॥ 330 ॥ अनुवाद—शेष पाँच अध्यायोंमें महाप्रभुकी पाँच विभिन्न अवस्थाके अनुरूप (जन्म, बाल्य, पौगण्ड, कैशोर और यौवन) लीला-चरित्रका वर्णन है। मैंने आदिलीला अति संक्षेपमें कही है, इसे विस्तारमें नहीं कहा है, क्योंकि श्रीनित्यानन्द प्रभुकी आज्ञाके बलपर श्रीवृन्दावनदासने 'चैतन्यमङ्गल' में इनका विस्तारसे वर्णन किया है॥ 329-330 ॥ अनुभाष्य—आदिलीलामें सतरह अध्याय अथवा प्रबन्ध हैं, उनमेंसे पहले बारह अध्याय ग्रन्थकी भूमिका अथवा उपक्रमणिका मात्र हैं। बादके तेरहसे सतरह अध्याय तक 'जन्म', 'बाल्य', 'पौगण्ड', 'कैशोर' और 'युवा',— पाँच प्रकारकी अवस्थाकी कथा पाँच प्रबन्धोंके रूपमें पाँच अध्याय हैं॥ 329 ॥ श्रीगौरलीला अपार :— श्रीकृष्णचैतन्यलीला—अद्भुत, अनन्त। ब्रह्मा-शिव-शेष याँर नाहि पाय अन्त ॥ 331 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्यलीला तो अद्भुत-अनन्त है, जिसका ब्रह्मा-शिव-शेषादि भी अन्त नहीं पा पाते ॥ 331 ॥ अनुभाष्य—चैःचः मध्यलीला, 21/10,12 संख्या और भागवत 2/7/41 एवं 10/14/7 आदि श्लोक द्रष्टव्य हैं ॥ 331 ॥ श्रीगौरलीलाके श्रवण-कीर्तनकारीको चरम मङ्गलकी प्राप्ति :— येइ येइ अंश कहे, येइ शुने धन्य। अचिरे मिलिबे तारे श्रीकृष्णचैतन्य ॥ 332 ॥ अनुवाद—जो उस अनन्त लीलाके जिस भी अंशको कहेगा अथवा जो उसे सुनेगा, उसे अति शीघ्र ही श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुके चरणोंकी प्राप्ति होगी॥ 332 ॥ श्रीकृष्णचैतन्य, अद्वैत, नित्यानन्द। श्रीवासादि गदाधरादि यत भक्तवृन्द ॥ 333 ॥ वृन्दावनवासी भक्तोंकी वन्दना :— यत यत भक्तगण कैसे/बैसे वृन्दावने। नम्र हञा शिरे धरौँ ताँहार चरणे ॥ 334 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीअद्वैताचार्य; तथा श्रीवासादि और श्रीगदाधरादि जितने भक्त हैं तथा जो-जो भक्त वृन्दावनमें वास कर रहे हैं, अति विनीत भावसे मैं उन सबके चरणकमलोंमें अपने शीशको नत करता हूँ॥ 333-334 ॥ 268 | श्रीचैतन्यचरितामृत