श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें17/222–229 ] काजीकी प्रतिज्ञा :- काजी कहे,–“मोर वंशे यत उपजिवे। ताहाके ‘तालाक’ दिब,—कीर्त्तन ना बाधिबे॥” 222॥ अनुवाद—काजीने कहा,—“मेरे वंशमें जो भी उत्पन्न होंगे, मैं उन सबको प्रतिज्ञा करवा दूँगा कि वे कीर्त्तनमें किसी भी प्रकारकी बाधा उत्पन्न नहीं करेंगे॥” 222॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘तालाक’—गम्भीररूपसे की गयी जो प्रतिज्ञा॥ 222॥ अनुभाष्य—आज भी काजीके वंशधर श्रीकृष्णसङ्कीर्त्तनमें योगदान करते हैं, वे किसी भी प्रकारकी कोई आपत्ति नहीं करते हैं॥ 222॥ महाप्रभु और भक्तोंमें हर्ष :- शुनि प्रभु ‘हरि’ बलि’ उठिला आपनि। उठिल वैष्णव सब करि’ हरिध्वनि॥ 223॥ भक्तोंके साथ महाप्रभुका घर लौटना :- कीर्त्तन करिते प्रभु करिला गमन। सङ्गे चलि’ आइसे काजी उल्लसित मन॥ 224॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभु ‘हरि-हरि’ बोलते हुए उठकर खड़े हो गये। सभी वैष्णव भी ‘हरि-हरि’ ध्वनि करते हुये उठ गये। कीर्त्तन करते हुए महाप्रभु वहाँसे चले और काजी भी बड़े उल्लासके साथ उनके सङ्ग चलने लगा॥ 223-224॥ काजीरे विदाय दिल शचीर नन्दन। नाचिते नाचिते आइला आपन भवन॥ 225॥ अनुवाद—थोड़ी दूर चलनेपर शचीनन्दन श्रीगौरहरिने काजीको विदायी दी। काजी नाचते-नाचते अपने भवनमें लौट आया॥ 225॥ एइ मते काजीरे प्रभु करिला प्रसाद। इहा येइ शुने तार खण्डे अपराध॥ 226॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने काजीपर कृपा की। जो व्यक्ति इस कथाको श्रद्धापूर्वक सुनता है, उसके सभी अपराध नष्ट हो जाते हैं॥ 226॥ श्रीवास-भवनमें महाप्रभुके कीर्त्तनके समय श्रीवास पण्डितके पुत्रका देहत्याग :- एक दिन श्रीवासेर मन्दिरे गोसाञि। नित्यानन्द-सङ्गे नृत्य करे दुइ भाइ॥ 227॥ श्रीवास-पुत्रेरे ताँहा हैल परलोक। तबु श्रीवासेर चित्ते ना जन्मिल शोक॥ 228॥ अनुवाद—एक दिन श्रीचैतन्य गोसाईं और श्रीनित्यानन्द प्रभु, दोनों भाई श्रीवास पण्डितके मन्दिरमें नृत्य कर रहे थे। उसी समय श्रीवास पण्डितका पुत्र परलोक सिधार गया। ऐसा होनेपर भी श्रीवास पण्डितके चित्तमें किसी प्रकारका शोक उत्पन्न नहीं हुआ॥ 227-228॥ मृतपुत्रके मुखसे तत्त्वकथा :- मृतपुत्र-मुखे कैल ज्ञानेर कथन। आपने दुइ भाइ हैला श्रीवास-नन्दन॥ 229॥ अनुवाद—महाप्रभुने उस मृत पुत्रके मुखसे ज्ञानकी कथा कहलवायी। तब महाप्रभुने श्रीवास पण्डितसे कहा कि हम दोनों भाइयों (मुझे और नित्यानन्द प्रभु) को अपना पुत्र ही समझो॥ 229॥ अमृतप्रवाह भाष्य—एक रात महाप्रभु श्रीवास-अङ्गनमें कीर्त्तन कर रहे थे, उसी समय श्रीवास पण्डितके एक पुत्र परलोक सिधार गये। श्रीवास पण्डितने कीर्त्तनका रसभङ्ग होनेके भयसे सभीको शोक प्रकाशित करनेसे निषेध किया और महाप्रभु बहुत रात तक कीर्त्तन करते रहे। कीर्त्तन समाप्त होनेपर महाप्रभु समझ गये कि इस घरपर कोई विपत्ति आयी है। श्रीवासके पुत्रकी मृत्युका संवाद सुनकर पहले तो महाप्रभुने देरीसे संवाद देनेके लिये दुःख प्रकट किया और मृत बालकसे सभीके सम्मुखस्थ करवाकर पूछा,—“ओहे बालक ! तुमने श्रीवासका क्यों परित्याग किया ?” मृत बालकने कहा,—“मेरा सतरहवाँ अध्याय | 253