श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 790, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 17/228-237 जितने दिन तक श्रीवासके घरमें रहना निर्धारित था, वह समाप्त होनेपर अब मैं आपकी इच्छासे अन्य स्थानपर जा रहा हूँ। मैं आपका नित्य अनुगत परतन्त्र जीव हूँ—आपकी इच्छाके अतिरिक्त और कुछ करनेका मुझे अधिकार नहीं है।” मृत बालकके मुखसे इन वचनोंको सुनकर श्रीवास पण्डितके परिवारवालोंको दिव्य ज्ञानकी प्राप्ति हुई और उनको कोई शोक नहीं रहा। इसके बाद उन्होंने मृत बालकका संस्कार किया। महाप्रभुने श्रीवासको कहा, —‘जो तुम्हारा पुत्र था, वह तुम्हें छोड़कर चला गया। मैं और नित्यानन्द–तुम्हारे नित्यपुत्र हैं, हम तुम्हें कभी भी नहीं छोड़ पायेंगे।'॥ 229॥ अनुभाष्य—चैःभाः मध्यखण्ड, पच्चीसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥ 228-229॥ श्रीवासकी भतीजी नारायणीको अपना उच्छिष्ट-प्रदान :- तबे त' करिला सब भक्ते वर दान। उच्छिष्ट दिया नारायणीर करिल सम्मान॥ 230॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने सभी भक्तोंको वरदान दिया और नारायणीको अपना उच्छिष्ट प्रदान करके कृतार्थ किया॥ 230॥ अनुभाष्य—चैःभाः मध्यखण्ड, दसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है। कोई-कोई चरित्रहीन पाषण्ड-प्रकृतिके प्राकृतसहजिया लोग प्राकृत बुद्धि होनेके कारण श्रील वृन्दावनदासकी निन्दा और उनसे द्वेष करनेके कारण ऐसा कहते हैं,—'महाप्रभुके उच्छिष्ट अथवा ताम्बुल खानेके फलस्वरूप विधवा अवस्थामें श्रीमती नारायणीदेवीसे श्रीवृन्दावनदास ठाकुरका जन्म हुआ था।' ऐसी निन्दनीय बात नितान्त अपराधमय है, इसलिये यह कभी भी सुनने योग्य नहीं है॥ 230॥ यवनकुलमें उत्पन्न दर्जीका महाप्रभुका रूपदर्शन और उन्माद :- श्रीवासेर वस्त्र सिये दरजी यवन। प्रभु तारे कराइल निजरूप दर्शन॥ 231॥ 'देखिनु' 'देखिनु' बलि' हइल पागल। प्रेमे नृत्य करे, हैल वैष्णव आगल॥ 232॥ अनुवाद—श्रीवासके वस्त्र सिलनेवाला दर्जी यवन था, उसे महाप्रभुने अपने रूपके दर्शन कराये। 'मैंने देखा है', 'मैंने देखा है', यह कहते-कहते वह पागलसा हो गया। प्रेममें पागल होकर वह नृत्य करने लगा और वह श्रेष्ठ वैष्णव बन गया॥ 231-232॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीवासके घरके निकट रहनेवाला कोई एक यवन दर्जी उनके वस्त्र सिलता था। वह श्रद्धापूर्वक महाप्रभुका नृत्य देखकर मन्त्र-मुग्ध हो गया, महाप्रभुने उसे अपने रूपके चिन्मय-भावका दर्शन कराया। वह दर्जी 'मैंने देखा है! मैंने देखा है!' ऐसा कहते हुए प्रेममें पागल होकर नृत्य करने लगा। 'आगल' - अग्रगण्य॥ 231-232॥ महाप्रभुकी इच्छानुसार श्रीवासका मधुर श्रीकृष्णलीला-वर्णन :- आवेशेते महाप्रभु वंशी त' मागिल। श्रीवास कहे, —“वंशी तोमार गोपी हरि' निल॥" 233॥ अनुवाद—एक समय व्रजभावके आवेशमें महाप्रभुने अपनी वंशी माँगी, तब श्रीवास पण्डितने कहा,—“आपकी वंशी तो गोपियोंने चुरा ली है॥" 233॥ शुनि' प्रभु 'बल' 'बल' बलेन आवेशे। श्रीवास वर्णन वृन्दावन-लीलारसे॥ 234॥ प्रथमेते वृन्दावन-माधुर्य वर्णिल। शुनिया प्रभुर चित्ते आनन्द बाड़िल॥ 235॥ तबे 'बल' 'बल' प्रभु बले बारबार। पुनः पुनः कहे श्रीवास करिया विस्तार॥ 236॥ वंशीवाद्ये गोपीगणेरे वने आकर्षण। ताँ-सबार सङ्गे यैछे वन-विहरण॥ 237॥ 254 | श्रीचैतन्यचरितामृत