भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 800

[ 17/298-302 किया है। सख्य और दास्य-ये दो उनके महाप्रभुके प्रति स्वाभाविक भाव हैं, परन्तु महाप्रभु कभी-कभी उन्हें गुरुके समान मानकर व्यवहार करते हैं॥298-299॥ श्रीवासादि शुद्धभक्तोंका दास्य :- श्रीवासादि यत महाप्रभुर भक्तगण। निज निज भावे करेन चैतन्य-सेवन॥300॥ श्रीगदाधर-स्वरूप-रामानन्द-श्रीरूपादि शक्तियोंकी मधुररसमें श्रीगौरकृष्णसेवा :- पण्डित-गोसाञि आदि याँर सेइ रस। सेइ सेइ रसे कृष्ण हय ताँर वश॥301॥ अनुवाद-श्रीवासादि जितने भी भक्त हैं, वे अपने-अपने भावोंके अनुरूप महाप्रभुकी सेवा करते हैं। श्रीवास पण्डित, श्रीगदाधर पण्डित, श्रीस्वरूप, श्रीरूप-सनातनादि गोस्वामीका श्रीकृष्णके प्रति जो-जो भाव है, श्रीकृष्ण उसी भावके द्वारा उन भक्तोंके वशीभूत होते हैं॥300-301॥ अनुभाष्य-इन सब (296-301) पद्योंमें श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैताचार्यकी परम चमत्कारमय गौरसेवा-भाव-वैचित्रीके तारतम्यका वर्णन हुआ है। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 11-13वें श्लोक)- “भक्तरूपो गौरचन्द्रो यतोऽसौ नन्दनन्दनः। भक्तस्वरूपो नित्यानन्दो व्रजे यः श्रीहलायुधः। भक्तावतार आचार्योऽद्वैतो यः श्रीसदाशिवः। भक्ताख्याः श्रीनिवासाद्या यतस्ते भक्तरूपिणः। भक्तशक्तिर्द्विजाग्रण्यः श्रीगदाधरपण्डितः॥11॥ श्रीमद्विश्वम्भराद्वैतनित्यानन्दावधूतकाः । अत्र त्रयः समुन्नेया विग्रहाः प्रभवश्च ते। एको महाप्रभुर्ज्ञेयः श्रीचैतन्यो दयाम्बुधिः। प्रभू द्वौ श्रियुतौ नित्यानन्दाद्वैतौ महाशयौ। गोस्वामिनो विग्रहाश्च ते द्विजश्च गदाधरः। पञ्चतत्त्वात्मका एते श्रीनिवासश्च पण्डितः॥12॥ यदुक्तं तत्र गोस्वामि श्रीस्वरूपपदाम्बुजैः। “त्रयोऽत्र विग्रहा ज्ञेयाः प्रभवश्चात्र ते त्रयः। एको महाप्रभुर्ज्ञेयो द्वौ प्रभु सम्मतौ सताम्॥”13॥ “यद्यपि श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने पञ्चतत्त्वके अर्थका विस्तृत वर्णन किया है, तथापि यहाँपर उसे संक्षेपमें लिखा जा रहा है- जो श्रीनन्दनन्दन हैं, वे ही भक्तरूपमें श्रीगौरचन्द्र हैं। जो व्रजमें श्रीहलधर (श्रीबलदेव) प्रभु हैं, वे ही भक्तस्वरूपमें श्रीनित्यानन्द प्रभु हैं। जो सदाशिव हैं, वे ही भक्तावतार श्रीअद्वैताचार्य हैं। श्रीवासादि भक्तवृन्द ही भक्ताख्य अर्थात् शुद्धभक्तके रूपमें प्रसिद्ध हैं। द्विजश्रेष्ठ श्रीगदाधर पण्डित ही भक्तशक्ति हैं। यद्यपि पञ्चतत्त्वके अन्तर्गत आनेवाले श्रीमान् विश्वम्भर, श्रीअद्वैताचार्य और अवधूत श्रीनित्यानन्द-तीनों ही भगवद्-विग्रह अर्थात् विष्णुत्तत्त्व और महाप्रभावशाली होनेके कारण प्रभु हैं, तथापि इन तीनोंमेंसे दयाके सागर श्रीचैतन्यदेव 'महाप्रभु' तथा श्रीनित्यानन्द और श्रीअद्वैताचार्य 'प्रभु' के नामसे प्रसिद्ध हैं। (भक्तोंके द्वारा) ये गोस्वामी (अर्थात् श्रीचैतन्य गोसाईं, श्रीनित्यानन्द गोसाईं तथा श्रीअद्वैत गोसाईं) के नाम से भी जाने जाते हैं। अन्य दो तत्त्वोंमेंसे श्रीगदाधर 'द्विज' और श्रीनिवास 'पण्डित' के नामसे प्रसिद्ध हैं। श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी पादने भी ऐसा ही कहा है कि यद्यपि भगवद्-विग्रह होनेके कारण ये तीनों ही 'प्रभु' हैं, तथापि साधुओंकी सम्मत रीतिके अनुसार उनमेंसे एक 'महाप्रभु' तथा अन्य दोनों 'प्रभु' हैं-ऐसा समझना चाहिये। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 23-24वाँ श्लोक)- “तस्य शिष्योऽभवच्च्छ कलयामास शृङ्गारं यः शृङ्गारफलात्मकः॥23॥ अद्वैतः कलयामास दास्यसख्ये फले उभे। श्रीमान् रङ्गपुरी ह्येष वात्सल्ये यः समाश्रितः॥24॥” “श्रीईश्वरपुरी शृङ्गाररसके, श्रीअद्वैतप्रभु दास्य और सख्यरसके एवं श्रीरङ्गपुरी शुद्धवात्सल्यरसके सेवक थे।” चैःचः आदिलीला, 7/10-17 संख्या द्रष्टव्य है॥296-301॥ व्रजमें मुरलीधारी गोपबालक श्यामलीला, गौड़में ब्राह्मण-संन्यासी वेशधारी कीर्तन-विग्रह गौरलीला :- तिँह श्याम,-वंशीमुख, गोपविलासी। इहँ गौर-कभु द्विज, कभु त' संन्यासी॥302॥ 264 | श्रीचैतन्यचरितामृत