श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 801, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें17/302-308 ] अनुवाद-व्रजमें वे (श्रीकृष्ण) श्यामवर्णके हैं, उनके मुखपर वंशी सुशोभित होती है और वे गोपबालकके रूपमें विलास करते हैं। [वे ही श्रीकृष्ण] नवद्वीपमें [महाप्रभुके रूपमें] गौर वर्णके हुए हैं, ये कभी ब्राह्मण (गृहस्थ) और कभी संन्यासीकी लीला करते हैं॥ 302 ॥ गोपीभावयुक्त श्रीकृष्णका श्रीगौररूपमें श्रीकृष्णप्रेमास्वादन :- अतएव आपने प्रभु गोपीभाव धरि'। व्रजेन्द्रनन्दने कहे 'प्राणनाथ' करि' ॥ 303 ॥ अनुवाद-इसलिये स्वयं महाप्रभुने गोपीभावको अङ्गीकार किया है और वे व्रजेन्द्रनन्दनको अपना 'प्राणनाथ' मानते हैं॥ 303 ॥ रूपानुगजनोंके आनुगत्यके बिना श्रीगौरका विप्रलम्भरस सुदुर्लभ :- सेइ कृष्ण, सेइ गोपी, - परम विरोध। अचिन्त्य चरित्र प्रभुर अति सुदुर्बोध ॥ 304 ॥ अनुवाद-वे ही श्रीकृष्ण हैं और वे ही गोपी हैं, यह तो परस्पर परम विरोधी बात है, परन्तु महाप्रभुके अचिन्त्य चरित्रको समझना अत्यन्त कठिन है॥ 304 ॥ अनुभाष्य-चैःचः आदिलीला, 17/276-278 संख्या द्रष्टव्य है॥ 303-304 ॥ श्रीगौरके परमवैचित्र्य-चमत्कारमय अचिन्त्यभाव तर्कसे अतीत :- इथे तर्क करि' केह ना कर संशय। कृष्णेर अचिन्त्यशक्ति एइ मत हय ॥ 305 ॥ अनुवाद-इसमें तर्क करके कोई संशय मत करो, क्योंकि श्रीकृष्णकी अचिन्त्यशक्तिका प्रभाव इसी प्रकार है॥ 305 ॥ अचिन्त्य, अद्भुत कृष्णचैतन्य-विहार। चित्र भाव, चित्र गुण, चित्र व्यवहार ॥ 306 ॥ तार्किककी दुर्गति- “संशयात्मा विनश्यति" :- तर्के इहा नाहि माने, येइ दुराचार। कुम्भीपाके पचे सेइ, नाहिक निस्तार ॥ 307 ॥ अनुवाद- श्रीकृष्णचैतन्यकी लीलाएँ अचिन्त्य और अद्भुत हैं। उनके भाव, गुण और व्यवहार सभी आश्चर्यजनक हैं। जो दुराचारी कुतर्कसे इसको नहीं मानता, वह कुम्भीपाक नरकमें यातना भोगता है और वहाँसे उसका उद्धार नहीं होता है॥ 306-307 ॥ अनुभाष्य-'कुम्भीपाक'- एक विशेष प्रकारका नरक। पापी व्यक्तिको 'कुम्भी' नामके एक विशेषपात्र में पकाया जाता है। (भाः 5/26/13)- “यस्तिह वा उग्रः पशून् पक्षिणो वा प्राणत उपरन्धयति तमपकरुणं पुरुषादैरपि विगर्हितममुत्र यमानुचराः कुम्भीपाके तप्ततैल उपरन्धयन्ति ॥" “प्राणियोंका वध करनेवाले जीवको यमराज दण्डके रूपमें कुम्भीपाक नरकमें तप्त तेलमें राँधते हैं॥"307॥ महाभारतमें भीष्मपर्वमें (5/12)- अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्। प्रकृतिभ्यः परं यच्च तदचिन्त्यस्य लक्षणम् ॥ 308 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 308 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-प्रकृतिसे अतीत जो तत्त्व है, उसका लक्षण ही [प्राकृत इन्द्रियों, मन और बुद्धिके द्वारा वह] अचिन्त्य है। तर्क तो प्राकृत है, इसलिये वह तत्त्वको स्पर्श नहीं कर सकता। इसलिये अचिन्त्यभावोंको समझनेके लिये तर्क मत करो॥ 308 ॥ इति अमृतप्रवाह-भाष्ये सप्तदश परिच्छेद। सतरहवें अध्यायका अमृतप्रवाह-भाष्य पूर्ण हुआ। अनुभाष्य-नदी-पर्वत-वनादि भूतलपर स्थित पदार्थोंके नामोंको श्रवण करनेकी इच्छा होनेपर धृतराष्ट्र उत्तरमें सञ्जयने कहा,- ये भावाः अचिन्त्याः (प्राकृत-भोगमय-चिन्तातीताः) खलु (निश्चयं) तान् अचिन्त्यभावान् तर्केण न योजयेत् (ते हेतुभिः सतरहवाँ अध्याय | 265