श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 17/308-317 न हन्तव्याः इत्यर्थः); यत् च प्रकृतिभ्यः परं (भिन्नम् अतीतम् अप्राकृतमिति यावत्) तत् एव अचिन्त्यस्य लक्षणम्। श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥308॥ श्रद्धावान्को ही सेवा-प्राप्ति :- अद्भुत चैतन्यलीलाय याहार विश्वास। सेइ जन याय चैतन्येर पद-पाश॥309॥ अनुवाद—अद्भुत चैतन्यलीलामें जिसका दृढ़ विश्वास है, वही व्यक्ति श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंको प्राप्त कर सकता है॥309॥ प्रसङ्गे करिल एइ सिद्धान्तेर सार। इहा येइ शुने, शुद्धभक्ति हय तार॥310॥ अनुवाद—प्रसङ्गवश मैंने सभी सिद्धान्तोंके सारको कहा है। इसे जो श्रद्धापूर्वक सुनता है, उसके हृदयमें शुद्धभक्ति उदित होती है॥310॥ पुनरावृत्ति :- लिखित ग्रन्थेर यदि करि अनुवाद। तबे से ग्रन्थेर अर्थ पाइबे आस्वाद॥311॥ अनुवाद—लिखित ग्रन्थका यदि अन्तमें संक्षेपरूपमें वर्णन किया जाय, तो ग्रन्थके सभी विषयोंका एक साथ आस्वादन किया जा सकता है॥311॥ भागवतमें श्रीव्यास-रीतिके अनुसार अध्याय-वर्णन :- अतएव भागवते व्यासेर आचार। कथा कहि' अनुवाद करे बार बार॥312॥ अनुवाद—इसलिये श्रीमद्भागवतमें श्रीव्यासदेवका ऐसा ही आचरण देखा जाता है। उन्होंने श्रीमद्भागवतके शेषमें उसके विषयका पुनः संक्षेपमें वर्णन किया है॥312॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यासने श्रीमद्भागवतके अन्तमें बारहवें स्कन्धके बारहवें अध्यायमें बावन श्लोकोंमें प्रारम्भसे अन्त तक सम्पूर्ण भागवतको जिस प्रकार प्रतिछायारूपमें (संक्षेपमें) वर्णन करके ग्रन्थ समाप्त किया है, उन महाजनके द्वारा प्रदर्शित पथका अनुसरण करते हुये ग्रन्थकार (श्रीकृष्णदास) ने भी श्रीचैतन्य महाप्रभुकी आदिलीलाको संक्षेपरूपमें पुनः वर्णन किया है॥312॥ संक्षेपमें अध्यायोंमें वर्णित विषयोंकी पुनरावृत्ति :- ताते आदिलीलार करि परिच्छेद गणन। प्रथम परिच्छेदे कैलुँ 'मङ्गलाचरण'॥313॥ अनुवाद—इसलिये मैं भी आदिलीलाके सभी अध्यायोंके विषयोंकी सूची गणना कर रहा हूँ। पहले अध्यायमें मैंने 'मङ्गलाचरण' किया गया है॥313॥ द्वितीय परिच्छेदे 'चैतन्यतत्त्व-निरूपण'। स्वयं भगवान् येइ व्रजेन्द्रनन्दन॥314॥ तेंहो त' चैतन्य-कृष्ण-शचीर नन्दन। तृतीय परिच्छेदे जन्मेर् 'सामान्य' कारण॥315॥ तहिँ मध्ये प्रेमदान-'विशेष' कारण। युगधर्म-कृष्णनाम-प्रेम-प्रचारण॥316॥ अनुवाद—दूसरे अध्यायमें चैतन्यतत्त्वका निरूपण किया है। व्रजेन्द्रनन्दन जो स्वयं भगवान् हैं, वे ही तो शचीनन्दन श्रीकृष्णचैतन्यके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं। तीसरे अध्यायमें उनके जन्मका 'सामान्य' कारण कहा है, उसके मध्यमें प्रेमदानको विशेष कारण बतलाया है। श्रीकृष्णनाम और उसके द्वारा प्रेमका प्रचाररूपी युगधर्मका भी इस अध्यायमें वर्णन हुआ है॥314-316॥ चतुर्थे कहिलुँ जन्मेर् 'मूल' कारण। स्वमाधुर्य-प्रेमानन्दरस-आस्वादन॥317॥ अनुवाद—चौथे अध्यायमें महाप्रभुके जन्मका 'मूल' कारण अपने माधुर्य और प्रेमानन्दरसके आस्वादनको कहा है॥317॥ 266 | श्रीचैतन्यचरितामृत