श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 803, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें17/318-327 ] पञ्चमे 'श्रीनित्यानन्द'-तत्त्व निरूपण। नित्यानन्द हैला राम रोहिणीनन्दन ॥ 318 ॥ अनुवाद—पाँचवें अध्यायमें 'श्रीनित्यानन्द'-तत्त्वका निरूपण हुआ है, रोहिणीनन्दन श्रीबलराम ही अब श्रीनित्यानन्द प्रभुके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं॥ 318 ॥ षष्ठ परिच्छेदे 'अद्वैत-तत्त्वे'र विचार। अद्वैत-आचार्य-महाविष्णु-अवतार ॥ 319 ॥ अनुवाद—छठे अध्यायमें 'श्रीअद्वैत-तत्त्व' का विचार हुआ है। श्रीअद्वैताचार्य महाविष्णुके अवतार हैं॥ 319 ॥ सप्तम परिच्छेदे 'पञ्चतत्त्वे'र आख्यान। पञ्चतत्त्व मिलि' यैछे कैला प्रेमदान ॥ 320 ॥ अनुवाद—सातवें अध्यायमें 'पञ्चतत्त्व' का वर्णन है। इन पाँच-तत्त्वोंने मिलकर कैसे सर्वत्र श्रीकृष्णप्रेमका दान किया, इसका वर्णन हुआ है॥ 320 ॥ अष्टमे 'चैतन्यलीला-वर्णन'-कारण। एक कृष्णनामेर महा-महिमा-कथन ॥ 321 ॥ अनुवाद—आठवें अध्यायमें श्रीकृष्णदास गोस्वामीने श्रीचैतन्यचरितामृत लिखनेका कारण कहा है। इसी अध्यायमें श्रीकृष्णनामकी महामहिमाकी कथा भी वर्णित है॥ 321 ॥ नवमेते 'भक्तिकल्पवृक्षे'र वर्णन'। श्रीचैतन्य-माली कैला वृक्ष आरोपण ॥ 322 ॥ अनुवाद—नौवें अध्यायमें 'भक्तिकल्पवृक्ष' का वर्णन है। श्रीचैतन्य महाप्रभुरूपी मालीने इस वृक्षका आरोपण किया है॥ 322 ॥ दशमेते मूल-स्कन्धेर 'शाखादि-गणन'। सर्वशाखागणेर यैछे फल-वितरण ॥ 323 ॥ अनुवाद—दसवें अध्यायमें इस भक्तिकल्पवृक्षके मूल स्कन्धकी शाखाओं-उपशाखाओंकी गणना हुई है और उनके द्वारा प्रेमरूपी फलके वितरणका वर्णन हुआ है॥ 323 ॥ एकादशे 'नित्यानन्दशाखा-विवरण'। द्वादशे 'अद्वैतस्कन्ध शाखार वर्णन' ॥ 324 ॥ अनुवाद—ग्यारहवें अध्यायमें 'श्रीनित्यानन्दशाखा' का विवरण और बारहवें अध्यायमें 'श्रीअद्वैतस्कन्धकी शाखा' का वर्णन हुआ है॥ 324 ॥ त्रयोदशे महाप्रभुर 'जन्म-विवरण'। कृष्णनाम-सह यैछे प्रभुर जनम ॥ 325 ॥ अनुवाद—तेरहवें अध्यायमें महाप्रभुके 'जन्मका विवरण' हुआ है और कैसे सर्वत्र श्रीकृष्णनामके कीर्तनके साथ महाप्रभुका जन्म हुआ॥ 325 ॥ चतुर्दशे 'बाल्यलीला'र किछु विवरण। पञ्चदशे 'पौगण्डलीला'र सङ्क्षेपे कथन ॥ 326 ॥ अनुवाद—चौदहवें अध्यायमें कुछ 'बाल्यलीला' का वर्णन हुआ है और पन्द्रहवें अध्यायमें महाप्रभुकी 'पौगण्डलीला' का संक्षेपमें वर्णन किया है॥ 326 ॥ षोड़शे कहिलुँ 'कैशोरलीला'र उद्देश। सप्तदशे 'यौवनलीला' कहिलुँ विशेष ॥ 327 ॥ अनुवाद—सोलहवें अध्यायमें मैंने महाप्रभुकी 'कैशोरलीला' के उद्देश्यको बतलाया है। सतरहवें अध्यायमें 'यौवनलीला' का विशेष वर्णन किया है॥ 327 ॥ अनुभाष्य—313से 327पयर संख्यामें अध्यायोंकी गणना लिखी है— पहले अध्यायमें-गुरु आदिके वन्दनरूपी मङ्गलाचरण। दूसरे अध्यायमें-गौरतत्त्वनिर्देश मङ्गलाचरण। तीसरे अध्यायमें-अवतारका सामान्य कारण; प्रेमदान। सतरहवाँ अध्याय | 267