भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 804, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 804

[ 17/313–334 चौथे अध्यायमें—अवतारका मूलकारण। पाँचवें अध्यायमें—श्रीनित्यानन्दतत्त्व-निरूपण। छठे अध्यायमें—श्रीअद्वैततत्त्व-निर्देश। सातवें अध्यायमें—पञ्चतत्त्व-निर्देश और प्रचार। आठवें अध्यायमें—उपक्रमणिका और नाम-महिमा। नौवें अध्यायमें—भक्तिकल्पवृक्ष-वर्णन-प्रचार। दसवें अध्यायमें—गौरगणोंकी गणना। ग्यारहवें अध्यायमें—श्रीनित्यानन्द प्रभुके गणोंकी गणना। बारहवें अध्यायमें—श्रीअद्वैताचार्य और श्रीगदाधरगणोंकी गणना। तेरहवें अध्यायमें—गौरजन्मलीला। चौदहवें अध्यायमें—बाल्यलीला। पन्द्रहवें अध्यायमें—पौगण्डलीला। सोलहवें अध्यायमें—कैशोरलीला। सतरहवें अध्यायमें—यौवनलीला ॥ 313-327 ॥ एइ सप्तदश प्रकार 'आदि-लीला'र प्रबन्ध। द्वादश प्रबन्ध, ताते ग्रन्थ-मुखबन्ध ॥ 328 ॥ अनुवाद—इस प्रकार सतरह अध्यायोंमें 'आदिलीला' का वर्णन है, इनमेंसे पहले बारह अध्यायोंमें आदिलीलाकी भूमिका है॥ 328 ॥ पञ्चप्रबन्धे पञ्चवयस चरित। संक्षेपे कहिलुँ अति,—ना कैलुँ विस्तृत ॥ 329 ॥ वृन्दावनदास इहा 'चैतन्यमङ्गले'। विस्तारि' वर्णिला नित्यानन्द-आज्ञा-बले ॥ 330 ॥ अनुवाद—शेष पाँच अध्यायोंमें महाप्रभुकी पाँच विभिन्न अवस्थाके अनुरूप (जन्म, बाल्य, पौगण्ड, कैशोर और यौवन) लीला-चरित्रका वर्णन है। मैंने आदिलीला अति संक्षेपमें कही है, इसे विस्तारमें नहीं कहा है, क्योंकि श्रीनित्यानन्द प्रभुकी आज्ञाके बलपर श्रीवृन्दावनदासने 'चैतन्यमङ्गल' में इनका विस्तारसे वर्णन किया है॥ 329-330 ॥ अनुभाष्य—आदिलीलामें सतरह अध्याय अथवा प्रबन्ध हैं, उनमेंसे पहले बारह अध्याय ग्रन्थकी भूमिका अथवा उपक्रमणिका मात्र हैं। बादके तेरहसे सतरह अध्याय तक 'जन्म', 'बाल्य', 'पौगण्ड', 'कैशोर' और 'युवा',— पाँच प्रकारकी अवस्थाकी कथा पाँच प्रबन्धोंके रूपमें पाँच अध्याय हैं॥ 329 ॥ श्रीगौरलीला अपार :— श्रीकृष्णचैतन्यलीला—अद्भुत, अनन्त। ब्रह्मा-शिव-शेष याँर नाहि पाय अन्त ॥ 331 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्यलीला तो अद्भुत-अनन्त है, जिसका ब्रह्मा-शिव-शेषादि भी अन्त नहीं पा पाते ॥ 331 ॥ अनुभाष्य—चैःचः मध्यलीला, 21/10,12 संख्या और भागवत 2/7/41 एवं 10/14/7 आदि श्लोक द्रष्टव्य हैं ॥ 331 ॥ श्रीगौरलीलाके श्रवण-कीर्तनकारीको चरम मङ्गलकी प्राप्ति :— येइ येइ अंश कहे, येइ शुने धन्य। अचिरे मिलिबे तारे श्रीकृष्णचैतन्य ॥ 332 ॥ अनुवाद—जो उस अनन्त लीलाके जिस भी अंशको कहेगा अथवा जो उसे सुनेगा, उसे अति शीघ्र ही श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुके चरणोंकी प्राप्ति होगी॥ 332 ॥ श्रीकृष्णचैतन्य, अद्वैत, नित्यानन्द। श्रीवासादि गदाधरादि यत भक्तवृन्द ॥ 333 ॥ वृन्दावनवासी भक्तोंकी वन्दना :— यत यत भक्तगण कैसे/बैसे वृन्दावने। नम्र हञा शिरे धरौँ ताँहार चरणे ॥ 334 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीअद्वैताचार्य; तथा श्रीवासादि और श्रीगदाधरादि जितने भक्त हैं तथा जो-जो भक्त वृन्दावनमें वास कर रहे हैं, अति विनीत भावसे मैं उन सबके चरणकमलोंमें अपने शीशको नत करता हूँ॥ 333-334 ॥ 268 | श्रीचैतन्यचरितामृत