श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 799, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें17/293-299 ] अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ 293 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—रासके आरम्भमें कौतुकवशतः श्रीकृष्ण कुञ्जमें छिपकर बैठे थे। मृगनयनी गोपियोंको उधर आते देखकर उन्होंने शङ्कित होकर अपना मनोहर चतुर्भुजरूप उन्हें प्रदर्शित किया। साधारण गोपियोंने केवल यही कहा, - 'ये हमारे प्रेमके विषय श्रीकृष्ण नहीं हैं।' किन्तु राधाजीके प्रेमकी आश्चर्यमयी महिमा! श्रीराधाके आगमन-मात्रसे ही श्रीकृष्ण चेष्टा करके भी उस चतुर्भुज रूपको नहीं रख पाये ॥ 293 ॥ अनुभाष्य-[गोवर्द्धनोपत्यकायां परासौलीति ख्यातानाम्नां रासस्थल्यां वसन्तकाले] रासारम्भविधौ (रासस्य आरम्भविधौ प्रवृत्तिकल्पे) कुञ्जे निलोयवसता (संलग्नावस्थितेन) हरिणा (श्रीकृष्णेन) मृगाक्षिगणैः (कुरङ्गनयनाभिः गोपीभिः) [प्रविष्टक-नामारण्ये पेठाख्ये] दृष्टं स्वम् (आत्मानं) गोपयितुं (बह्वीभिस्ताभिः सर्वतः आवृतात् तस्मात् कुञ्जात् सहसापसर्पणासम्भवात्) उद्बुद्धधिया (उत्कृष्टबुद्ध्या) या चतुर्बाहुता सुष्ठु सन्दर्शिता, यस्य (कृष्णप्रणयमहिम्नः) श्रिया प्रहविष्णुना (कृष्णेन) अपि या चतुर्बाहुता रक्षितुं न शक्या आसीत्-हन्त! (भोः!) राधायाः प्रणयस्य महिमा (माहात्म्यम्)- [एतादृगचिन्त्यम्!] (गौतमीये—'गोवर्द्धनगिरौ रम्ये स्थितं रासरसोत्सुकम्।' भगवतोऽपि प्रेमाधीनत्वात् प्रेमणोऽग्रे ऐश्वर्यं न तिष्ठतीति न शक्यते वक्तु तस्य नित्यत्वात्, किन्तु तिरोभवति)। श्लोक भावानुवाद-वसन्तकालमें गोवर्धनके प्रान्तमें रसौली नामक रास-स्थलीमें रासके आरम्भमें कौतुकवशतः श्रीकृष्ण पेठा नामक वनमें एक कुञ्जमें छिपकर बैठे थे। मृगनयनी गोपियोंको उधर आते देखकर उन्होंने शङ्कित होकर चातुर्यपूर्वक अपना मनोहर चतुर्भुजरूप उन्हें प्रदर्शित किया। साधारण गोपियोंने यही कहा,-'ये हमारे प्रेमके विषय श्रीकृष्ण नहीं हैं।' किन्तु राधाजीके प्रेमकी अचिन्त्य महिमा! श्रीराधाके आगमन-मात्रसे ही श्रीकृष्ण चेष्टा करके भी उस चतुर्भुज रूपको नहीं रख पाये। (गौतमीय-तन्त्रमें-रम्य गोवर्धनमें स्थित रासरसोत्सुक भगवान् श्रीकृष्ण भी प्रेमके अधीन हैं, प्रेमके आगे वे भी अपने नित्य ऐश्वर्यको धारण करनेमें असमर्थ हैं) ॥ 293 ॥
नन्द-जगन्नाथ मिश्र, यशोदा-शची :- सेइ व्रजेश्वर-इहाँ जगन्नाथ पिता। सेइ व्रजेश्वरी-इहाँ शचीदेवी माता ॥ 294 ॥ व्रजके कानाइ-बलाइ-गौड़के गौर-निताइ :- सेइ नन्दसुत-इहँ चैतन्य-गोसाञि। सेइ बलदेव-इहँ नित्यानन्द-भाइ ॥ 295 ॥ अनुवाद-वे व्रजेश्वर नन्द महाराज इनके (महाप्रभुके) पिता श्रीजगन्नाथ हैं और वे व्रजेश्वरी यशोदा इनकी माता शचीदेवी हैं। वे नन्दनन्दन ही ये चैतन्य-महाप्रभु हैं और वे श्रीबलदेव ही उनके भाई श्रीनित्यानन्द प्रभु हैं ॥ 294-295 ॥ मधुररसके अतिरिक्त अन्य रसोंमें श्रीनित्यानन्द-रामकी श्रीगौरकृष्णसेवा :- वात्सल्य, दास्य, सख्य-तिन भावमय। सेइ नित्यानन्द-कृष्णचैतन्य-सहाय ॥ 296 ॥ प्रेमभक्ति दिया तैं हो भासाल जगते। ताँर चरित्रचित्र लोके ना पारे बुझिते ॥ 297 ॥ अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभु वात्सल्य, दास्य और सख्य-ये तीन भाव महाप्रभुके प्रति रखते हैं और वे सदा महाप्रभुकी लीलाओंमें सहायक हैं। प्रेमाभक्ति प्रदान करके उन्होंने समस्त जगत्को उसमें डुबो दिया है। उनके अलौकिक चरित्रको साधारण लोग समझ नहीं पाते हैं ॥ 296-297 ॥ भक्तावतार श्रीअद्वैताचार्यका शुद्धभक्ति-प्रचार :- अद्वैत-आचार्य-गोसाञि भक्त-अवतार। कृष्ण अवतारिया कैला भक्तिर प्रचार ॥ 298 ॥ श्रीअद्वैताचार्यकी दो भावोंमें श्रीगौरकृष्णसेवा :- सख्य, दास्य,-दुइ भाव सहज ताँहार। कभु प्रभु करेन ताँरे गुरु-व्यवहार ॥ 299 ॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य गोसाई भक्तावतार हैं, उन्होंने श्रीकृष्णको अवतरित करवाकर जगत्में भक्तिका प्रचार सतरहवाँ अध्याय | 263