भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 798, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 798

[ 17/283-293 निभृतनिकुञ्जमें बैठकर राधाजीकी बाट जोहने लगे। श्रीकृष्णको रासमें न देखकर सब गोपियाँ श्रीकृष्णको ढूँढ़ती हुई तभी वहाँ आयीं ॥ 283 ॥ अनुभाष्य—'बाट'—वर्त्म अथवा पथ। 'ठाट'—श्रेणीबद्ध सैन्य॥ 283 ॥ दूर हैते देखि' ताँरे बोले गोपीगण। “एइ देख कुञ्जेर भितर व्रजेन्द्रनन्दन ॥"284 ॥ अनुवाद—दूरसे देखकर ही गोपियोंने कहा,—“वह देखो, व्रजेन्द्रनन्दन इसी कुञ्जके भीतर हैं॥"284॥ गोपीगण देखि' कृष्णेर हइल साधवस। लुकाइते नारिल, ताहे हैला विरस ॥ 285 ॥ चतुर्भुज मूर्त्ति करि' आछेन बसिया। कृष्ण देखि' गोपी कहे निकटे आसिया ॥ 286 ॥ अनुवाद—गोपियोंको देखकर श्रीकृष्ण भयभीत हो गये और उनसे छिपना चाहते थे, परन्तु छिपनेको कोई स्थान न देखकर वे विवश हो गये। वे कहीं और जा नहीं सकते थे, इसलिये वहीं चतुर्भुजरूप धारण करके बैठ गये। उन्हें देखकर गोपियाँ उनके निकट आकर कहने लगीं ॥ 285-286॥ अनुभाष्य—'साध्वस'—भय, त्रास, शङ्का, मनका आवेग, सम्भ्रम ॥ 285 ॥ गोपियोंका नारायण-स्तव :- 'इहों कृष्ण नहे, इहों नारायण-मूर्त्ति।' एत बलि' सबे ताँरे करे नति-स्तुति ॥ 287 ॥ “नमो नारायण, देह' करह प्रसाद। कृष्णसङ्ग देह' मोरे, घुचाह विषाद ॥" 288 ॥ एत बलि नमस्करि' गेला गोपीगण। हेनकाले राधा आसि' दिला दरशन ॥ 289 ॥ अनुवाद—'अरे ! ये तो श्रीकृष्ण नहीं हैं, ये तो भगवान् नारायण हैं।' यह कहकर वे सब उन्हें प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगीं,—“हे नारायण ! आपको हम नमस्कार करती हैं। आप कृपा करें और हमें श्रीकृष्णका सङ्ग प्रदान करके हमारे हृदयकी विरह-वेदनाको दूर करें।" यह कहकर गोपियोंने उन्हें नमस्कार किया और तभी राधाजी वहाँ उपस्थित हुईं ॥ 287-289 ॥ अनुभाष्य—'मोरे'—हमें ॥ 288 ॥ श्रीमती राधिकाके आगमन-मात्रसे ही चतुर्भुजका अन्तर्धान, द्विभुज-मूर्ति अथवा स्वयंरूप :- राधा देखि' कृष्ण ताँरे हास्य करिते। सेइ चतुर्भुज-मूर्त्ति चाहेन राखिते ॥ 290 ॥ लुकाइला दुइ भुज राधार अग्रेते। बहु यत्न कैला कृष्ण, नारिल राखिते ॥ 291 ॥ अनुवाद—राधाजीको देखकर श्रीकृष्ण अपने चतुर्भुज रूपमें रहकर उनसे परिहास करना चाहते थे, परन्तु बहुत प्रयास करनेपर भी राधाजीके सामने वे उस रूपकी रक्षा नहीं कर सके और उनकी दो भुजाएँ अन्तर्हित हो गयीं ॥ 290-291 ॥ श्रीराधाका अचिन्त्य कृष्णप्रेम :- राधार विशुद्ध-भावेर अचिन्त्य-प्रभाव। ये कृष्णेरे कराइला द्विभुज-स्वभाव ॥ 292 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके प्रति राधाजीके विशुद्ध-भावका यह अचिन्त्य प्रभाव है कि उसने श्रीकृष्णको उनके मूल द्विभुजरूपमें आनेपर विवश कर दिया ॥ 292 ॥ श्रीराधाके सामने कृष्ण-चातुर्यकी पराजय, नित्य स्वयंरूप श्यामसुन्दर :- उज्ज्वलनीलमणिमें नायिकाभेद-प्रकरणमें छठे अङ्कमें— रासारम्भाविधौ निलीयवसता कुञ्जे मृगाक्षीगणै- दृष्टं गोपयितुं स्वमुद्धुरधिया या सुष्ठु सन्दर्शिता। राधायाः प्रणयस्य हन्त महिमा यस्य श्रिया रक्षितुं सा शक्या प्रभविष्णुनापि हरिणा नासीच्चतुर्बाहुता ॥ 293 ॥ 262 | श्रीचैतन्यचरितामृत