भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 797

17/276–283 ] 'स्त्री' हेन नाम प्रभु एइ अवतारे। श्रवणो ना करिला-विदित संसारे॥29॥ अतएव यत महामहिम सकले। 'गौराङ्ग-नागर' हेन स्तव नाहि बले॥30॥ यद्यपि सकल स्तव सम्भव ताहाने। तथापिह स्वभावे से गाय बुधगणे॥31॥" "सबके साथ परिहास करनेपर भी महाप्रभु पर-स्त्रीके साथ कभी परिहास नहीं करते थे, स्त्रीको देखकर वे दूरसे ही एक ओर हट जाते थे। इस प्रकार महाप्रभु सबके साथ चपलता करते रहते, किन्तु किसी भी स्त्रीकी ओर आँख उठाकर भी नहीं देखते थे। संसारमें प्रसिद्ध है कि इस अवतारमें महाप्रभुने 'स्त्री' नामका भी श्रवण नहीं किया। इसलिये जितने भी महिमाशाली महापुरुष हैं, उनमेंसे किसीने भी महाप्रभुकी स्तुति 'गौराङ्ग-नागर' कहकर नहीं की है। यद्यपि महाप्रभुके लिये सभी प्रकारकी स्तुति सम्भव है, तथापि विद्वान लोग महाप्रभुके तत्त्वके अनुकूल ही उनकी लीलाका कीर्तन करते हैं।" इन तीन पद्योंमें सुस्पष्ट रूपसे भक्तिसिद्धान्त विरोधी दुराचार-पुष्ट कल्पित 'गौराङ्गनागरीवाद' का खण्डन हुआ है।॥276-278॥ स्वयंरूप श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य रूपोंमें गोपियोंकी प्रीति नहीं :- श्यामसुन्दर, शिखिपिच्छ-गुञ्जा-विभूषण। गोप-वेश, त्रिभङ्गिम, मुरली-वदन॥279॥ इहा छाड़ि' कृष्ण यदि हय अन्याकार। गोपिकार भाव नाहि याय निकट ताहार॥280॥ अनुवाद-जिनका परम सुन्दर रूप श्याम वर्णका है, सिरपर मयूर-पंख है, गलेमें गुञ्जाकी माला है, गोप-वेश है और अधरोंपर मुरली धारणकर त्रिभङ्ग ललित मुद्रामें खड़े हैं-ऐसे रूपको छोड़कर श्रीकृष्णका यदि कोई अन्य आकार हो, तो गोपियोंका उनके प्रति कान्त-भाव स्फुरित नहीं होता॥279-280॥ ललितमाधव (6/14)- गोपीनां पशुपेन्द्रनन्दनजुषो भावस्य कस्तां कृती विज्ञातुं क्षमते दुरूहपदवीसञ्चारिणः प्रक्रियाम्। आविष्कुर्वति वैष्णवीमपि तनुं तस्मिन् भुजैर्जिष्णुभि- र्यासां हन्त चतुर्भिरद्भुतरुचिं रागोदयः कुञ्चति॥281॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥281॥ अमृतप्रवाह भाष्य-किसी समय श्रीकृष्णने कौतुकवशतः अद्भुत-रुचियुक्त चतुर्भुज नारायणरूप प्रकाश किया, जिसे देखकर गोपियोंके रागका उदय सङ्कुचित हो गया। इसलिये नन्दनन्दनमें अनन्य-भजनशील दुर्गम-पारकीय- पथका अवलम्बन करनेवाली गोपियोंकी भाव-क्रियाको कौन पण्डित समझ सकता है?॥281॥ अनुभाष्य-सूर्यपत्नी सवर्णाके प्रति विशाखाके वचन,- गोपीनां दुरूहपदवीसञ्चारिणः (दुरूहायां पदव्यां सञ्चरितुं शीलं यस्य तस्य) पशुपेन्द्र-नन्दनजुषः (पशुपेन्द्रस्य गोपराजस्य नन्दस्य नन्दनं सूनुं जुषते सेवते यस्तस्य कृष्णसेवापरस्य) भावस्य तां प्रक्रियां विज्ञातुं (बोद्धुं) कः कृति क्षमते (समर्थवान् भवति)? [यतः] हन्त! जिष्णुभिः (जयशीलैः) चतुर्भिः भुजैः (धृतनारायण विग्रहैः) अद्भुतरुचिं (अद्भुत-रुचिः शोभा यस्याः ताम् अलौकिकीं कान्तिमयीं) वैष्णवीं तनुं आविष्कुर्वति (प्रकटयति सति) तस्मिन् (कृष्णे) अपि यासां (गोपीनां) रागोदयः कुञ्चति (विकाशं न लभते)। श्लोक भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥281॥ रासके समय आत्मगोपनकी इच्छासे श्रीकृष्णके द्वारा गोपियोंको चतुर्भुज प्रदर्शन और संरक्षण :- वसन्तकाले रासलीला करे गोवर्धने। अन्तर्धान कैला सङ्केत करि' राधा-सने॥282॥ निभृतनिकुञ्जे बसि' देखे राधार बाट। अन्वेषिते आइला ताहाँ गोपिकार ठाट॥283॥ अनुवाद-वसन्त ऋतुमें गोवर्धनमें रासके मध्य श्रीकृष्ण श्रीमती राधिकाके साथमें एकान्तमें विहारकी इच्छासे उन्हें सङ्केत करके अन्तर्धान हो गये। श्रीकृष्ण सतरहवाँ अध्याय | 261