श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 796, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 17/273–278 महाप्रभुके संन्यासके समय निताइ, आचार्यरत्न और मुकुन्द :— सङ्गे नित्यानन्द, चन्द्रशेखर आचार्य। मुकुन्ददत्त,—एइ तिन कैल सर्व कार्य॥ 273 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीचन्द्रशेखर आचार्य और श्रीमुकुन्ददत्त, इन तीनोंने संन्यास ग्रहण करनेके सभी अनुष्ठानादि आवश्यक कार्योंको किया॥ 273 ॥ एइ आदिलीलार कैल सूत्र गणन। विस्तारि वर्णिला इहा दास वृन्दावन॥ 274 ॥ अनुवाद—यहाँ तक आदि-लीलाकी सूत्ररूपमें मैंने गणना की है। इन समस्त लीलाओंका श्रीवृन्दावनदासने विस्तारपूर्वक वर्णन किया है॥ 274 ॥ अनुभाष्य—चैःभाः मध्यखण्ड, अठाइसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥ 274 ॥ महाप्रभुकी शान्तको छोड़कर दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर भावमें उक्त चित्तवृत्ति :— यशोदानन्दन हैला शचीर नन्दन। चतुर्विध भक्त-भाव करे आस्वादन॥ 275 ॥ अनुवाद—श्रीयशोदानन्दन अब श्रीशचीनन्दनके रूपमें अवतीर्ण हुये हैं और उन्होंने चार प्रकारके भक्तोंके भावोंका आस्वादन किया॥ 275 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'चतुर्विध भक्त-भाव'—दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर रसके आश्रित चार प्रकारके भक्तोंके भाव॥ 275 ॥ आश्रयजातीय भावमय विषयविग्रह ही गौरसुन्दर— “गौरनागरी”-वादका खण्डन :— माधुर्य राधा-प्रेमरस आस्वादिते। राधाभाव अङ्गीकार करियाछे भालमते॥ 276 ॥ अनुवाद—अपने माधुर्य और राधाके प्रेम रसका आस्वादन करनेके लिये श्रीकृष्ण श्रीराधाके भाव और अङ्गकान्तिको अङ्गीकार करके श्रीगौरसुन्दरके रूपमें अवतीर्ण हुए॥ 276 ॥ गोपी-भाव याते प्रभु करियाछे एकान्त। व्रजेन्द्रनन्दने माने आपनार कान्त॥ 277 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने ऐकान्तिक रूपसे गोपीभावको ग्रहण किया है, इसलिये वे श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णको अपने कान्तके रूपमें मानते हैं॥ 277 ॥ गोपिका-भावेर एइ सुदृढ़ निश्चय। व्रजेन्द्रनन्दन बिना अन्यत्र ना जानय॥ 278 ॥ अनुवाद—गोपी-भावका यही सुदृढ़ निश्चय है कि व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण ही उनके एकमात्र प्राण-प्रियतम हैं और वे उनके अतिरिक्त किसी औरको नहीं जानती हैं॥ 278 ॥ अनुभाष्य—'श्रीगौरसुन्दर'—श्रीराधाभावद्युति-सुवलित श्रीकृष्ण हैं, इसलिये श्रीकृष्णकी सेवाके लिये आश्रय-जातीय श्रीमती राधिकादि गोपियोंके हृदयमें जो भाव है, महाप्रभु सदा उसी भावमें ही स्थित रहते थे। उसे त्यागकर कभी भी उन्होंने स्वयं श्रीकृष्णके समान विषय-जातीय चेष्टाएँ अर्थात् भोक्ताके अभिमानसे परस्त्री-दर्शनादिके द्वारा 'लम्पट नागर' की वृत्तिका परिचय नहीं दिया। परन्तु प्राकृत कामुक परस्त्री लम्पट सहजिया-सम्प्रदायके लोग निज-निज घृणित काम-पिपासा और व्यभिचारको जगद्गुरु आचार्यकी लीलाका प्रदर्शन करने वाले श्रीगौरसुन्दरके कन्धेपर आरोपित करके वैष्णवाचार्य शिरोमणि श्रीस्वरूप-दामोदर और ठाकुर वृन्दावनदासके श्रीचरणोंमें केवलमात्र अपराधकी ही वृद्धि करते हैं। चैःभाः पन्द्रहवाँ अध्याय— “सबे पर-स्त्री प्रति नाहि परिहास। स्त्री देखिले दूरे प्रभु हन एकपाश॥ 27 ॥ एइमत चापल्य करेन सबा-सने। सबे स्त्री-मात्र नाहि देखेन दृष्टिकोणे॥ 28 ॥ 260 | श्रीचैतन्यचरितामृत