श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें17/265-272 ] करेंगे—यही श्रीमन्महाप्रभुकी धारणा थी; उस समयमें सदाचार भी ऐसा ही था। इस समय जो इन सभी नाम मात्रके ब्राह्मणोंकी अपेक्षा और भी अधिक दाम्भिकता दिखाते हुए वैष्णव-संन्यासीको दण्डवत् प्रणाम नहीं करते, उनके सम्बन्धमें शास्त्रोंकी विधि,— “देवता-प्रतिमां दृष्ट्वा यतिञ्चैव त्रिदण्डिनम्। नमस्कारं न कुर्याद् यः प्रायश्चित्तीयते नरः॥” (पाठान्तरमें, नमस्कारं न कुर्याच्चेदुपवासेन शुद्धयति॥”) “परमदेवता श्रीविष्णुके विग्रह और वैष्णव-त्रिदण्डी-संन्यासीको देखकर यदि कोई ब्राह्मण (चाहे वह नाम मात्रका ब्राह्मण हो) प्रणाम न करे, तो इस दोषके कारण उसे प्रायश्चित करना पड़ता है, अथवा उपवास करके शुद्ध होना पड़ता है॥” 265-266॥ एसब पाषण्डी तबे हइबे निस्तार। आर कोन उपाय नाहि, एइ युक्ति सार॥'267॥ अनुवाद—यही युक्ति ठीक है, क्योंकि इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है, तभी इन सब पाषण्डियोंका उद्धार होगा॥'267॥ उसी समय केशव भारतीका नवद्वीपमें महाप्रभुके घरमें भिक्षा ग्रहण :- एइ दृढ़ युक्ति करि' प्रभु आछे घरे। केशव भारती आइला नदिया-नगरे॥268॥ अनुवाद—ऐसा दृढ़ निश्चय कर जब महाप्रभु घरमें विराजमान थे, तभी श्रीकेशव भारती नदिया-नगरमें पधारे॥268॥ प्रभु ताँरे नमस्करि' कैल निमन्त्रण। भिक्षा कराइया ताँरे कैल निवेदन॥269॥ भारतीके निकट महाप्रभुका निवेदन :- “तुमि त' ईश्वर वट,—साक्षात् नारायण। कृपा करि' कर मोर संसार-मोचन ॥” 270 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने जाकर उन्हें नमस्कार करके अपने घर निमन्त्रित किया और भिक्षा करानेके उपरान्त उनसे निवेदन किया,—“आप कृपा करके मेरे संसार-बन्धनको काट दीजिये, आप यह करनेमें समर्थ हैं। आप ईश्वर हैं, साक्षात् नारायण ही हैं॥”269-270॥ भारतीकी उक्ति :- भारती कहेन,—“तुमि ईश्वर, अन्तर्यामी। ये कहे, से करिब,—स्वतन्त्र नहि आमि॥” 271 ॥ अनुवाद—श्रीकेशव भारतीने कहा,—“आप तो ईश्वर हो, अन्तर्यामी हो। आप जो कहेंगे, मैं वही करूँगा, क्योंकि मैं स्वतन्त्र नहीं, आपके परतन्त्र हूँ॥”271॥ भारतीका काटोया लौटकर आना और महाप्रभुका उनसे संन्यास ग्रहण :- एत बलि' भारती गोसाञि काटोयाते गेला। महाप्रभु ताहा याइ' संन्यास करिला ॥ 272 ॥ अनुवाद—यह कहकर श्रीकेशव भारती कटोया चले गये। महाप्रभुने वहीं जाकर उनसे संन्यास ग्रहण किया॥272॥ अमृतप्रवाह भाष्य—महाप्रभुकी चौबीस वर्षकी आयुके अन्तमें जो माघी शुक्लपक्ष पड़ा, उस उत्तरायणके समय संक्रमणके दिन महाप्रभुने रात्रिके अन्तमें श्रीनवद्वीपको त्यागकर ‘नदियार घाट’से तैरते हुये गङ्गा पारकर कण्टकनगर या कटोया-ग्राममें पहुँचकर श्रीकेशव भारतीसे (एक) दण्ड ग्रहण किया। चन्द्रशेखर आचार्य रत्नने महाप्रभुकी आज्ञानुसार संन्यासके सभी कृत्योंका अनुष्ठान किया। सारा दिन कीर्त्तन करते-करते लगभग सन्ध्याके समय क्षौरकार्य (मुण्डन) समाप्त हुआ। अगले दिन प्रातःकाल दण्डधारी संन्यासीका वेश धारण किये हुये श्रीकृष्णचैतन्यने राढ़देशमें भ्रमण करना आरम्भ किया। श्रीकेशवभारती भी कुछ दूरी तक उनके साथ-साथ गये थे॥272॥ सतरहवाँ अध्याय | 259