भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 794

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[ 17/260-266 [बायाँ स्तम्भ / Left Column] अभक्त व्यक्तियोंका परिचय :- 'यत अध्यापक, आर ताँर शिष्यगण। धर्मी, कर्मी, तपोनिष्ठ, निन्दक, दुर्जन॥ 260 ॥ श्रीकृष्णविद्वेष-अपराधसे मुक्त करनेके उपायकी चिन्ता :- एइ सब मोर निन्दा-अपराध हैते। आमि ना लओयाइले भक्ति, ना पारे लइते ॥ 261 ॥ निस्तारिते आइलाम आमि, हैल विपरीत। एसब दुर्जनेर कैछे हइबेक हित ॥ 262 ॥ अनुवाद—'जितने भी अध्यापक और उनके शिष्य हैं, वे सभी धर्मी-कर्मी (वर्णाश्रम धर्म और कर्मकाण्डमें रत) अथवा तपादिको मुख्य धर्म माननेवाले हैं और वैष्णवोंके निन्दक हैं, इसलिये ये दुर्जन हैं। ये सब मेरी निन्दारूपी अपराधके कारण स्वयं भक्ति नहीं कर सकते, जब तक मैं इन्हें भक्ति प्रदान न करूँ। मैं तो सभीका उद्धार करनेके लिये आया था, किन्तु सब विपरीत हो रहा है। इन सभी दुर्जनोंका कैसे कल्याण होगा ? ॥ 260-262 ॥ अनुभाष्य—गोपीभावमें आविष्ट होनेके कारण महाप्रभुका श्रीकृष्णके प्रति क्रोध और दोषारोपणको अप्राकृत न समझनेके कारण एक कर्मजड़ स्मार्त्त छात्रका महाप्रभुके साथ वादानुवाद और गोपीभावमय महाप्रभुका उसको श्रीकृष्णका पक्षपाती समझकर क्रोधित होकर उसके पीछे दौड़ना; ऐसा देखकर कर्मजड़ हरिविमुख नाम मात्रके ब्राह्मणोंके द्वारा मोहवशतः महाप्रभुको पीटनेका परामर्श; उनकी दुर्गति और दुर्दशा दूर करनेके लिये प्राकृत समाजकी दृष्टिमें श्रेष्ठ जन्म और वर्णके अभिमानी लोगोंके गुरुका संन्यास आश्रम स्वीकार करनेकी अभिलाषा— चैःभाः मध्यखण्ड, छब्बीसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है।॥ 247-262 ॥ आमाके प्रणति करे, हय पापक्षय। तबे से इहारे भक्ति लओयाइले लय ॥ 263 ॥ [दायाँ स्तम्भ / Right Column] पाषण्डियोंके उद्धारकी इच्छा :- मोरे निन्दा करे ये, ना करे नमस्कार। एसब जीवेरे अवश्य करिब उद्धार ॥ 264 ॥ अनुवाद—यदि ये मुझे नमस्कार करेंगे, तो इनके पाप नष्ट हो जायेंगे। तब मेरे द्वारा इनको भक्ति प्रदान करनेपर ये उसे धारण कर सकेंगे। जो मेरी निन्दा करते हैं, मुझे नमस्कार भी नहीं करते, तो भी मैं उन सभी जीवोंका अवश्य ही उद्धार करूँगा ॥ 263-264 ॥ लौकिक मर्यादामय संन्यास-लीलाभिनयका सङ्कल्प :- अतएव अवश्य आमि संन्यास करिब। संन्यासि-बुद्धये मोरे प्रणत हइब ॥ 265 ॥ अनुवाद—इसलिये मैं अवश्य ही संन्यास ग्रहण करूँगा। तब ये सभी मुझे संन्यासी जानकर प्रणाम करेंगे ॥ 265 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—शास्त्रोंके मतानुसार यदि कोई ब्राह्मण संन्यास ग्रहण करे, तो संन्यासी-बुद्धिसे अर्थात् संन्यासीको प्रणामके योग्य समझकर गृहस्थ और ब्राह्मणादि सभी प्रणाम करते हैं। मेरे संन्यास लेनेपर निन्दक ब्राह्मण अवश्य ही प्रणाम करके मुझसे सुबुद्धि लाभ करेंगे ॥ 265 ॥ संन्यासी जानकर महाप्रभुको नमस्कारके फलस्वरूप पाषण्ड ब्राह्मणादि उच्चजातिके व्यक्तियोंमें भी शुद्धचित्तसे सेवा-प्रवृत्तिका उदय :- प्रणतिते ह'बे इहार अपराध-क्षय। निर्मल हृदये भक्ति कराइब उदय ॥ 266 ॥ अनुवाद—मुझे प्रणाम करनेसे जब इनके अपराध नष्ट हो जायेंगे, तब इनके निर्मल हृदयमें मैं भक्ति उदय कराऊँगा ॥ 266 ॥ अनुभाष्य—पाषण्डी ब्राह्मणब्रुव अर्थात् नाम मात्रके ब्राह्मण जो ब्राह्मण जातिके विहित कर्त्तव्योंका पालन नहीं करते, वे भी वैष्णव-संन्यासीको दण्डवत् प्रणाम 258 | श्रीचैतन्यचरितामृत