श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्लोक सूची [वर्णक्रमानुसार प्रथम और तृतीय चरण] अद्वैताऽङ्घ्यब्जभृङ्गांस्तान् 12/1 | ज्ञानतः सुलभा मुक्ति 8/17 | पौगण्ड-लीला चैतन्य 15/4 अचिन्त्याः खलु ये भावा 17/308 | तं श्रीमत्कृष्णचैतन्यदेवं 9/1 | प्रकृतिभ्यः परं यच्च 17/308 अनुवादमनुक्त्वा तु न 16/58 | तदश्मसारं हृदयं 8/25 | प्रसभं नर्त्तते चित्रं 8/1 अमानिना मानदेन 17/31 | तया हि सहितः सर्वान् 15/27 | प्राणिनामुपकाराय यदेवेह 9/43 अम्बुजमम्बुनि जातं 16/82 | तल्लीलावर्णने योग्यः सद्यः 13/1 | प्राणैरर्थैर्धिया वाचा श्रेय 9/42 अश्वमेधं गवालम्भं 17/164 | तस्य श्रीकृष्णचैतन्य 11/4 | प्रेमनाम-प्रदानैश्च गौरो 17/4 अस्त्वेवमङ्ग भजतां 8/19 | तृणादपि सुनीचेन तरोरिव 17/31 | ब्रह्मबन्धुरिति स्माहं 17/78 अहो एषां वरं जन्म 9/46 | त्रिह्रस्व-पृथु-गम्भीरो 14/15 | मयानुमोदितः सोऽसौ 14/69 आविष्कुर्वति वैष्णवीमपि 17/281 | दाता भोक्ता तत्फलानां 9/6 | महत्त्वं गङ्गायाः 16/41 ऊर्ध्वस्कन्धावधूतेन्दोः 11/4 | देवेरेण सुतोत्पत्तिं कलौ 17/164 | मालाकारः स्वयं कृष्ण 9/6 एतावज्जन्मसाफल्यं देहिना 9/42 | द्वितीय-श्रीलक्ष्मीविव 16/41 | मुरभिदि तद्विपरीतं पाद 16/82 ओतं प्रोतमिदं यस्मिन् 13/77 | न गृहं गृहमित्याहुः 15/27 | यवनाः सुमनायन्ते कृष्ण 17/1 कथञ्चन स्मृते यस्मिन् 14/1 | नत्वाखिलान् तेषु मुख्या 11/1 | यस्यां श्रीकृष्णचैतन्यो 13/19 कथञ्चिदाश्रयाद् येषां 10/1 | न विक्रियेताथ यदा 8/25 | यस्यानुकम्पया श्वापि 9/1 कर्मणा मनसा वाचा 9/43 | न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो 17/76 | यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्य 8/58 कलौ नास्त्येव नास्त्येव 17/21 | न ह्यलब्धास्पदं किञ्चित् 16/58 | रसालङ्कारवत् काव्यं 16/71 कुमनाः सुमनस्त्वं हि 15/1 | ना साधयति मां योगो 17/76 | राजन् पतिर्गुरुरलं भवतां 8/19 कृपासुधा-सरिद्व्यस्य 16/1 | नित्यानन्द-पदाम्भोज 11/1 | राधायाः प्रणयस्य हन्त 17/293 क्वाहं दरिद्रः पापीयान् 17/78 | नीचगैव सदा भाति 16/1 | रासारम्भविधौ निलीय 17/293 गोपीनां पशुपेन्द्रनन्दन 17/281 | नैतच्चित्रं भगवति 13/77 | लक्ष्म्यार्च्चितोऽथ वाग्देव्या 16/3 जीयात् कैशोर-चैतन्यो 16/3 | पञ्चदीर्घः पञ्चसूक्ष्मः 14/15 | लौकिकीमपि तामीश 14/5