श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 829, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रजेन्द्र-श्लोकेर ] ब्रजेन्द्रनन्दने कहे 'प्राणनाथ' 17/303 शास्त्रदृष्टे कैल लुप्ततीर्थेर 10/90 शुनिया पड़ुया ताहाँ अर्थवाद 17/72 ब्रजेन्द्रनन्दने माने आपनार 17/277 “शास्त्रेर विचार भाल-मन्द 16/94 शुनिया प्रभुर चित्ते आनन्द 17/235 शिरे धरि वन्दों, नित्य 17/336 शुनिया प्रभुर दण्ड आचार्य 12/37 शिवपत्नीर भर्त्ता'—इहा 16/64 शुनिया प्रभुर मन प्रसन्न 12/48 शिवाइ, नन्दाइ, अवधूत 11/49 शुनिया प्रभुर वाक्य दिग्विजयी 16/87 श शिवानन्द-सम्बन्धे प्रभुर 10/63 शुनिया पाइला आचार्य 12/17 शिवानन्द सेन—प्रभुर भृत्य 10/54 शुनिया ब्राह्मण गर्वे वर्णिते 16/36 शङ्कर, मुकुन्द, ज्ञानदास 11/52 शिवानन्देर उपशाखा—ताँर 10/61 शुनिया मुरारि श्लोक कहिते 17/77 शङ्करारण्य-आचार्य-वृक्षेर 10/106 शिशुगण लये पाड़ा-पड़सीर 14/40 शुनिया ये क्रु शङ्खचक्रगदापद्म-शार्ङ्ग 17/13 शिशुगणे मिलि' कैल विविध 14/23 शुनिया सकल लोक विस्मित 14/92 शची आसि' कहे,—“केने 14/74 शिशुद्वारे कैल मोरे एत 16/96 शुनिया सन्तुष्ट हैल पिता 15/15 शची कहे,—“आर एक 14/80 'शिशुद्वारे देवी मोरे करिल 16/95 शुनिलुँ फाँकिते तोमार 16/32 शची कहे,—“ना खाइब 15/10 शिशुर शून्यपदे केने नूपूरेर 14/79 शुनि' शची पुत्रे किछु 14/41 शची कहे,—“मुञि देखों 13/83 शिशुसब शची-स्थाने कैल 14/41 शुनि' शची-मिश्रेर दुःखी 15/13 शचीके प्रेमदान, तबे अद्वैत 17/10 शिष्यगण पड़ाइते करिला 16/4 शुनि' शची-मिश्रेर मने 14/20 शची-जगन्नाथे देखि' देन 14/71 शिष्यगण लज्जा पुनः विद्यार 16/24 शुनि' सब म्लेच्छ आसि' 17/192 शची बले,—“याह, पुत्र 14/77 शिष्य, प्रशिष्य, आर उपशिष्य 9/24 शुनि' सब लोक तबे 16/39 शची-मिश्रेर पूजा लञा 13/118 शिष्येते ना बुझे, आमि 16/33 शुनि' स्तब्ध हैल काजी 17/168 शचीर इङ्गिते सम्बन्ध करिल 15/30 शिष्येर प्रतीत हय 13/29 शुद्ध वात्सल्य मिश्रेर, नाहि 14/90 शत दुइ फल प्रभु शीघ्र 17/82 शिष्येर समान मुञि ना 16/103 शूकर चराय डोम, सेइ 10/83 शत शत पड़ुया आसि 16/9 शुकाइया मरे, तबु जल 17/28 शेष अष्टादश वर्ष 13/37 शत शत शिष्यसङ्गे सदा 16/5 शुक्लाम्वर-ब्रह्मचारी बड़ 10/38 शेष-लीला शुनिते सबार 8/71 शत-श्लोकेर एक श्लोक 16/40 शुन, गौरहरि, एइ प्रश्नेर 17/176 शेषे अवतीर्ण हैला 13/62 शब्द शुनिलेइ हय द्वितीय 16/65 शुनि' क्रु शैशव-चापल्य किछु ना 16/103 शब्दालङ्कारे—तिनपदे आछे 16/73 शुनि' क्रोध कैल सब 17/254 श्याम-अङ्ग पीतवस्त्र 17/15 शयने आमार उपर लाफ 17/180 शुनि' चमकित हैल पिता 14/78 श्यामसुन्दर, शिखिपिच्छ 17/279 शाखार उपरे हैल वृक्ष-दुइ 9/21 शुनि' देखि' सर्वलोक 17/187 श्लोक पड़ि' ताँर भाव 14/68 शाखार उपशाखा, तार 12/77 शुनि' प्रभु क्रोधे कैल कृष्णे 17/250 श्लोकेर अर्थ कैल विप्र 16/45 शाखा-श्रेष्ठ ध्रुवानन्द, श्रीधर 12/79 शुनि' प्रभु 'बल' 'बल' 17/234 शाप शुनि' महाप्रभुर हइल 17/63 शुनि प्रभु 'हरि' बलि' उठिला 17/223 “शापिब तोमारे मुञि 17/62 शुनिब तोमार मुखे शास्त्रेर 16/104 शालग्राम सेवा करे 13/86 शुनिया आविष्ट हैला प्रभु 17/91 शास्त्र-आज्ञाय वध कैले 17/157 शुनिया कहिल प्रभु बहुत 16/37 पद्य सूची | 293