भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 853

मिलन और श्रीरायके मुखसे साध्य-साधन तत्त्वकी अन्तिम सीमातक श्रवण, श्रीरायको महाप्रभुका रसराज-महाभाव रूपका प्रदर्शन और श्रीरायको राजकार्य त्यागकर पुरी आकर मिलनेका आदेश देकर पुनः दक्षिणयात्रा।

नौवाँ अध्याय— 339-402

दक्षिण देशमें अनेक तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए अन्य अभिलाषी, ज्ञानी और पाषण्डी लोगों और अन्य साम्प्रदायिक वैष्णवोंका कृष्ण नाममें प्रवर्त्तन, सिद्ध होनेपर भी राम-नामकारी ब्राह्मणको कृष्णनाममें प्रवर्त्तन। मार्गमें तार्किक, मीमांसक, मायावादी, पाषण्डी आदि समस्त भक्ति विरोधी मतोंका खण्डन करके कृष्णभक्ति सिद्धान्तका स्थापन, बौद्ध आचार्यकी पराजय, रङ्गक्षेत्रमें वेङ्कटभट्टके घरमें चातुर्मास्य यापन और श्रीलक्ष्मीनारायण उपासक श्रीसम्प्रदायी भट्टको सपरिवार श्रीराधाकृष्णकी उपासनामें प्रवर्त्तन, ऋषभ पर्वतमें श्रीपरमानन्दपुरी गोस्वामीके साथ भेंट और पुरी गोस्वामीकी नीलाचलकी ओर यात्रा, दक्षिण मथुरामें रामसीताके भक्त ब्राह्मणको ‘अप्राकृत वैकुण्ठेश्वरी सीतादेवी प्राकृत असुर रावणके द्वारा दर्शनसे अतीत हैं’—ऐसा कहकर सान्त्वना प्रदान करना; बादमें रामेश्वरसे कूर्मपुराण-श्लोक लाकर उनको दिखाना। मालावार देशमें भट्टथारियोंके हाथोंसे सङ्गी कृष्णदासका उद्धार, पयस्विनी तटपर ब्रह्मसंहिताके पञ्चम अध्यायका संग्रह; शृङ्गेरी मठमें जाना; उडुपीमें मठाधीश मध्वाचार्यकी पराजय, पाण्डरपुरमें श्रीरङ्गपुरीके मुखसे श्रीशङ्करारण्य अर्थात् बड़े भाई श्रीविश्वरूपकी स्वधाम प्राप्ति (अप्रकट)का संवाद श्रवण। कृष्णवेन्वा नदीके तटपर ‘कृष्णकर्णामृत’का संग्रह और विद्यानगरमें पुनः लौटकर श्रीरामानन्दके साथ भेंट करके अलालनाथसे होते हुये पुरीमें वापस लौटना।

दसवाँ अध्याय— 405-431 महाप्रभुका श्रीकाशीमिश्रके घरमें अवस्थान, श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके द्वारा क्षेत्रवासी वैष्णवोंके परिचयकी प्राप्ति करना, कृष्णदासको नवद्वीपमें भेजना, गौड़ीय भक्तोंकी पुरीमें आनेकी तैयारी, श्रीपरमानन्द पुरीका नवद्वीपसे पुरीमें आगमन, श्रीदामोदर स्वरूपका काशीसे आगमन और महाप्रभुसे मिलन, श्रीईश्वरपुरीके शिष्य श्रीगोविन्दका आगमन और महाप्रभुकी सेवामें उनकी नियुक्ति, ब्रह्मानन्द भारतीसे चर्माम्बरका त्याग करवाना और उनका महाप्रभुमें श्रीकृष्ण ज्ञान; बलवान काशीश्वरका आगमन।

ग्यारहवाँ अध्याय— 433-463 श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके द्वारा प्रतापरुद्रकी महाप्रभुसे मिलन सम्पादन करनेकी चेष्टा, महाप्रभुकी अनिच्छा, राजकार्यसे मुक्त होकर श्रीरायका महाप्रभुका दर्शन और राजा प्रतापरुद्रके गुणोंका कीर्त्तन, राजाके प्रति महाप्रभुके चित्तभावका परिवर्तन, पुरुषोत्तममें अनवसर-कालमें महाप्रभुका आलालनाथमें गमन और वहाँसे लौटनेपर गौड़देशसे समागत श्रीअद्वैताचार्य आदि भक्तोंके साथ मिलन, श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके साथ श्रीगोपीनाथाचार्यके द्वारा महलके ऊपर चढ़कर राजा प्रतापरुद्रको गौड़ीय भक्तोंका परिचय-दान, राजाके द्वारा उनको रहनेके स्थान और महाप्रसादकी व्यवस्था, महाप्रभुका श्रीहरिदासको तोटामें अर्थात् एक बगीचेमें स्थान प्रदान करना और सभीके प्रसाद सेवन करनेके बाद संध्याके समय मन्दिरमें चार मण्डलियाँ बनाकर कीर्तन।

बारहवाँ अध्याय— 465-494 श्रीनित्यानन्द प्रभु आदि भक्तोंका महाप्रभुके पास प्रतापरुद्रकी आर्त्तिका ज्ञापन करना और राजाको सान्त्वना देने हेतु महाप्रभुके द्वारा व्यवहार किये गये एक बहिर्वासका खण्ड प्रदान करना, बादमें श्रीरामानन्दके आग्रहसे निकट आये राजकुमारको ‘कृष्ण’ जानकर महाप्रभुका उसे आलिङ्गन दान, उस प्रेमाविष्ट पुत्रके स्पर्शसे राजाको महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्ति और प्रेम उदय, गुण्डिचा-मन्दिर मार्जन और धुलाई, एक गौड़ीय

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