श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 856, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहला अध्याय कथासार—इस अध्यायमें महाप्रभुकी सम्पूर्ण मध्यलीला और शेषलीलाके प्रथम छह वर्षोंकी लीलाका सूत्ररूपमें वर्णन हुआ है। “यः कौमारहरः” श्लोकका पाठ करते हुए महाप्रभुने जिस भावका प्रकाश किया था, उसी भावको श्रीरूप गोस्वामीने “सोऽयं कृष्णः” श्लोक रचकर स्पष्ट किया था। श्रीरूप गोस्वामीके इस श्लोकको पढ़कर महाप्रभुने उनके ऊपर विशेष कृपा की थी। इस अध्यायमें श्रीरूप, श्रीसनातन और श्रीजीव गोस्वामीके द्वारा विरचित सभी ग्रन्थोंका उल्लेख किया गया है। महाप्रभुने रामकेलि ग्राममें श्रीरूप और श्रीसनातन गोस्वामीपर कृपा की थी, इसका वर्णन भी इस अध्यायमें हुआ है। —(अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीगौर-निताइको प्रणाम :- वन्दे श्रीकृष्णचैतन्य-नित्यानन्दौ सहोदितौ। गौड़ोदये पुष्पवन्तौ चित्रौ शन्दौ तमोनुदौ॥२॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मैं श्रीकृष्णचैतन्य और श्रीनित्यानन्दकी वन्दना करता हूँ, जो सबका मङ्गल करनेके लिये तथा अज्ञानरूपी अन्धकारको दूर करनेके लिये गौड़देशरूपी क्षितिजपर एक साथ चन्द्र एवं सूर्यके समान आश्चर्यजनक रूपसे उदित हुए हैं॥२॥ सम्बन्धाधिदेवताको प्रणाम :- जयतां सुरतौ पङ्गोर्मम मन्दमतेर्गती। मत्सर्वस्वपदाम्भोजौ राधामदनमोहनौ॥३॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥३॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मैं पङ्गु और मन्दमति हूँ; जो मेरी एकमात्र गति हैं और जिनके चरणकमल ही मेरा समस्त धन हैं, वे परम कृपालु श्रीश्रीराधा-मदनमोहन जययुक्त हों॥३॥ अभिधेयाधिदेवताको प्रणाम :- दीव्यद् वृन्दावनकल्पद्रुमाधः श्रीमद्रत्नागारसिंहासनस्थौ। श्रीश्रीराधाश्रीलगोविन्ददेवौ प्रेष्ठालीभिः सेव्यमानौ स्मरामि॥४॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ज्योतिर्मय-शोभायुक्त वृन्दावनके कल्पवृक्षके नीचे रत्नमन्दिरमें स्थित सिंहासनके ऊपर विराजमान श्रीश्रीराधागोविन्दकी प्रियसखियाँ उनकी सेवा कर रही हैं; मैं उनका स्मरण करता हूँ॥४॥ श्रीगौरकृपासे अज्ञानीको भी सर्वज्ञताकी प्राप्ति :- यस्य प्रसादादज्ञोऽपि सद्यः सर्वज्ञतां व्रजेत्। स श्रीचैतन्यदेवो मे भगवान् संप्रसीदतु॥१॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अज्ञानीजन भी जिनकी कृपासे तत्क्षणात् सर्वज्ञता लाभ करते हैं, वे भगवान् श्रीचैतन्यदेव मेरे प्रति प्रसन्न हों॥१॥ अनुभाष्य— यस्य (श्रीचैतन्यदेवस्य) प्रसादात् (अनुकम्पया) अज्ञः (अनभिज्ञः) अपि सद्यः सर्वज्ञतां व्रजेत् (सर्वेषु विषयेषु पारङ्गतो विज्ञो भवति), स भगवान् श्रीचैतन्यदेवः मे (मयि) संप्रसीदतु (सम्यक् प्रसन्नो भवतु)। श्लोक-भावानुवाद—जिनकी कृपासे अनभिज्ञ व्यक्ति भी तुरन्त सभी विषयोंमें पारङ्गत हो जाते हैं, वे भगवान् श्रीचैतन्यदेव मेरे प्रति सम्पूर्ण रूपसे प्रसन्न हों॥१॥