श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 857, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 1/5-14 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला प्रयोजनाधिदेवताको प्रणाम :- श्रीमान्रासरसारम्भी वंशीवटतटस्थितः । कर्षन् वेणुस्वनैर्गोपीर्गोपीनाथः श्रियेऽस्तु नः ॥ ५ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ ५ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-रासरसके प्रवर्तक वंशीवटके तटपर स्थित होकर श्रीमद्गोपीनाथ वेणुध्वनिके द्वारा गोपियोंको आकर्षित कर रहे हैं; वे हमारे मङ्गलका विधान करें ॥ ५ ॥ जय जय गौरचन्द्र जय कृपासिन्धु। जय जय शचीसुत जय दीनबन्धु ॥ ६ ॥ अनुवाद-कृपासिन्धु श्रीगौरचन्द्रकी जय हो, जय हो। दीन-पतितोंके एकमात्र बन्धु शचीनन्दन सदा जययुक्त होंवे ॥ ६ ॥ जय जय नित्यानन्द जयाद्वैतचन्द्र। जय जय श्रीवासादि गौरभक्तवृन्द ॥ ७ ॥ अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैतचन्द्र प्रभु की जय हो, जय हो, श्रीवासादि गौरभक्तोंकी जय हो ॥ ७ ॥ पहले आदिलीलामें सूत्रके साथ ही मूल घटनाएँ वर्णित हुईं :- पूर्वे कहिलुँ आदिलीलार सूत्रगण। याहा विस्तारियाछेन दास-वृन्दावन ॥ ८ ॥ अतएव तार आमि सूत्र-मात्र कैलुँ। ये किछु विशेष, सूत्रमध्येइ कहिलुँ ॥ ९ ॥ अनुवाद-मैंने पहले सूत्ररूपमें आदिलीलामें उन लीलाओंका वर्णन किया जिनका श्रीवृन्दावनदासने विस्तारसे वर्णन किया है। इसलिये मैंने उन लीलाओंका सूत्ररूपमें ही वर्णन किया और उनमें भी जो कुछ विशेष लीलाएँ थीं, उन्हें भी उन सूत्रोंके बीचमें ही कहा ॥ ८-९ ॥ अब शेषलीलाका मुख्यसूत्र-वर्णनारम्भ :- एबे कहि शेषलीलार मुख्य सूत्रगण। प्रभुर अशेष लीला ना याय वर्णन ॥ १० ॥ अनुवाद-यद्यपि महाप्रभुकी असीम लीलाओंका वर्णन सम्भव नहीं है, तथापि अब उनकी मुख्य शेषलीलाओंका सूत्र रूपमें वर्णन करूँगा ॥ १० ॥ श्रीचैतन्यभागवतमें विस्तारसे वर्णित घटनाओंको सूत्ररूपमें और उसमें संक्षेपमें वर्णित मुख्य-मुख्य घटनाओंका सविस्तार वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा :- तार मध्ये येइ भाग दास-वृन्दावन। 'चैतन्यमङ्गले' विस्तारि' करिला वर्णन ॥ ११ ॥ सेइ भागेर इहाँ सूत्रमात्र लिखिब। ताहाँ ये विशेष किछु, इहाँ विस्तारिब ॥ १२ ॥ अनुवाद-जिन लीलाओंका श्रीवृन्दावनदासने 'चैतन्यमङ्गल'में विस्तारसे वर्णन किया है, उनको यहाँ सूत्र रूपमें ही लिखूँगा और उसमें जो कुछ विशेष लीलाएँ हैं, उन्हें विस्तारपूर्वक कहूँगा ॥ ११-१२ ॥ अनुभाष्य-ऐसा जाना जाता है कि चैतन्यचरितामृतके रचनाकाल तक श्रीवृन्दावनदास ठाकुरके द्वारा रचित श्रीचैतन्यभागवतका नाम 'चैतन्यमङ्गल' था। जयानन्दके 'चैतन्यमङ्गल' नामसे जो अति आधुनिक भक्तिसिद्धान्त-विरोधी ग्रन्थका उल्लेख किया जाता है, वह एक नकली ग्रन्थ है। प्राचीनकालके किसी भी ग्रन्थमें उसका या उसके रचियता जयानन्दका कोई उल्लेख नहीं मिलता है। इससे यह सहज ही जाना जाता है कि 'जयानन्द' एक कृत्रिम नाम है ॥ ११-१२ ॥ वृन्दावनदास ठाकुरकी वन्दना :- चैतन्यलीलार व्यास-दास वृन्दावन। ताँर आज्ञाय करौं ताँर उच्छिष्ट चर्वण ॥ १३ ॥ भक्ति करि' शिरे धरि ताँहार चरण। शेषलीलार सूत्र एबे करिये वर्णन ॥ १४ ॥ 4 ।