श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 858, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहला अध्याय 1/13-23 ] अनुवाद—श्रीव्यासदेवके अवतार श्रीवृन्दावनदास ही चैतन्यलीलाके अधिकारी रचियता हैं, मैं तो उनकी आज्ञासे उनके उच्छिष्टको चबानेकी चेष्टा कर रहा हूँ। भक्ति-भावसे उनके चरणोंको अपने शीशपर रखकर अब मैं शेषलीलाका सूत्ररूपमें वर्णन कर रहा हूँ॥ 13-14 ॥ अनुभाष्य—'चैतन्यलीलाके व्यास'—भगवान्के अवतारों और श्रीकृष्णकी लीलाओंके लेखक श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासदेव हैं। श्रीचैतन्यलीलाके लेखक श्रीवृन्दावनदास ठाकुर श्रीव्यास-स्वरूप अर्थात् उनके ही अवतार हैं। श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने जिन श्रीचैतन्य-लीलाओंका वर्णन नहीं किया है, उन्हीं बची हुई लीलाओंको उनके आनुगत्यमें ही उनके दास और पाल्य श्रीकृष्णदास लिख रहे हैं॥ 13॥ शेषलीलाका सूत्र-वर्णन आरम्भ; प्रथम चौबीस वर्ष गृहस्थ-अभिनयसे आदिलीला :- चब्बिंश वत्सर प्रभुर गृहे अवस्थान। ताहाँ ये करिला लीला—'आदि-लीला' नाम ॥ 15 ॥ अनुवाद—प्रथम चौबीस वर्ष महाप्रभु गृहमें रहे और उन्होंने वहाँ जो-जो लीलाएँ कीं, वे 'आदिलीला'के नामसे कही जाती हैं॥ 15 ॥ शेष चौबीस वर्षोंकी संन्यासीके अभिनयसे 'शेषलीला' :- चब्बिंश वत्सर शेष येइ माघमास। तार शुक्लपक्षे प्रभु करिला संन्यास ॥ 16 ॥ संन्यास करिया चब्बिंश वत्सर अवस्थान। ताहाँ येइ लीला, तार 'शेषलीला' नाम ॥ 17 ॥ अनुवाद—चौबीसवें वर्षके अन्तमें माघमासके शुक्लपक्षमें महाप्रभुने संन्यास ग्रहण किया। संन्यास ग्रहण करनेके पश्चात् महाप्रभुने चौबीस वर्षों तक इस जगत्में रहकर जो लीलाएँ कीं, उन्हें 'शेषलीला' कहा जाता है॥ 16-17॥ मध्य और अन्त्य-भेदसे शेषलीला :- शेषलीलार 'मध्य' 'अन्त्य',—दुइ नाम हय। लीलाभेदे वैष्णव सब नाम-भेद कय ॥ 18 ॥ अनुवाद—शेषलीलाके 'मध्य' और 'अन्त्य'—ये दो नाम हैं। लीलाके भेदानुसार सब वैष्णव इनका इन दो नामोंसे उल्लेख करते हैं॥ 18 ॥ शेष चौबीस वर्षोंके प्रथम छह वर्ष समस्त भारतमें प्रचाररूप मध्यलीला :- तार मध्ये छय वत्सर—गमनागमन। नीलाचल-गौड़-सेतुबन्ध-वृन्दावन ॥ 19 ॥ अन्तिम अठारह वर्षोंकी आस्वादनरूप अन्त्यलीला :- ताहाँ येइ लीला, तार 'मध्यलीला' नाम। तार पाछे लीला—'अन्त्यलीला' अभिधान ॥ 20 ॥ 'आदिलीला', 'मध्यलीला', 'अन्त्यलीला' आर। एबे 'मध्यलीला' किछु करिये विस्तार ॥ 21 ॥ अनुवाद—(संन्यासके पश्चात्) पहले छह वर्ष महाप्रभुने यात्रामें बिताये। उन्होंने पुरीसे बङ्गाल और कन्याकुमारीसे वृन्दावन तक लगभग सम्पूर्ण भारतकी यात्रा की। इन छह वर्षोंमें उन्होंने जो लीलाएँ कीं, उनका नाम 'मध्यलीला' है और अन्तिम अठारह वर्षकी लीलाओंको 'अन्त्यलीला' कहा जाता है। महाप्रभुकी लीलाएँ समयके भेदसे 'आदि', 'मध्य' और 'अन्त्य' लीला कही जाती हैं। अब मैं मध्यलीलाको कुछ विस्तारसे कहूँगा॥ 19-21 ॥ बाकी अठारह वर्षोंमें पहले छह वर्ष भक्तसङ्गमें वास और पुरीमें आचार्यत्व :- अष्टादशवर्ष केवल नीलाचले स्थिति। आपनि आचरि' जीवे शिखाइला भक्ति ॥ 22 ॥ तार मध्ये छय वत्सर भक्तगण-सङ्गे। प्रेमभक्ति प्रवर्त्ताइला नृत्यगीतरङ्गे ॥ 23 ॥ अनुवाद—महाप्रभु अन्तिम अठारह वर्ष केवल नीलाचल (श्रीजगन्नाथपुरी) में रहे और अपने आचरणसे उन्होंने जीवोंको भक्तिकी शिक्षा दी। इसमें छह वर्षोंतक अपने भक्तोंके सङ्ग महाप्रभुने नृत्य और गीतके माध्यमसे प्रेमाभक्तिकी शिक्षा दी॥ 22-23 ॥ । 5